Bali Pratipada aur Bhaiduj (Hindi)

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा एवं कार्तिक शुक्ल द्वितीया इन दो दिनोंमें करने योग्य धार्मिक कृतियां और उनका शास्त्रीय आधार ।

सारणी –

१. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाका ऐतिहासिक महत्त्व
२. बलिप्रतिपदा
३. गोवर्धनपूजन
४. अन्नकूट
५. मार्गपाली बंधन एवं नगरप्रवेश विधि
६. यमद्वितीया अर्थात भैय्यादूज
    ६.१ कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको `यमद्वितीया’ और `भैय्यादूज’ कहनेके कारण
    ६.२ यमद्वितीयाकी तिथिपर करने योग्य धार्मिक विधियां
    ६.३ भाईदूज मनानेसे भाई और बहनको प्राप्त लाभ
    ६.४ भाईदूजके उपलक्ष्यमें आश्रमके संत प.पू. महाराजकीका संदेश
    ६.५ भाईदूजके दिन एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाका ऐतिहासिक महत्त्व

यह विक्रम संवत कालगणनाका आरंभ दिन है । ईसा पूर्व पहली शताब्दीमें शकोंने भारतपर आक्रमण किया । वर्तमान उज्जयिनी नगरीके राजा विक्रमादित्यने, मालवाके युवकोंको युद्धनिपुण बनाया । शकोंपर आक्रमण कर उन्हें देशसे निकाल भगाया एवं धर्माधिष्ठित साम्राज्य स्थापित किया । इस विजयके प्रतीकस्वरूप सम्राट विक्रमादित्यने विक्रम संवत् नामक कालगणना, आरंभ की । ईसा पूर्व सन् सत्तावनसे यह कालगणना प्रचलित है । इससे स्पष्ट होता है कि, कालगणनाकी संकल्पना भारतीय संस्कृतिमें कितनी पुरानी है । ईसा पूर्र्व कालमें संस्कृतिके वैभवकी, सर्वांगीण सभ्यताकी और एकछत्र राज्यव्यवस्थाकी यह एक निशानी है ।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा वर्षके साढेतीन प्रमुख शुभ मुहूर्तोंमेंसे आधा मुहूर्त है । इसलिए भी इस दिनका विशेष महत्त्व है । कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके दिन कुछ विशेष उद्देश्योंसे विविध धार्मिक विधियां करते हैं । प्रत्येक विधि करनेका समय भिन्न होता है ।

इनमेंसे महत्त्वपूर्ण विधियां हैं

बलिप्रतिपदा

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, बलिप्रतिपदा के रूपमें मनाई जाती है । इस दिन भगवान श्री विष्णुने दैत्यराज बलिको पातालमें भेजकर बलिकी अतिदानशीलताके कारण होनेवाली सृष्टिकी हानि रोकी । बलिराजाकी अतिउदारताके परिणामस्वरूप अपात्र लोगोंके हाथोंमे संपत्ति जानेसे सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । तब वामन अवतार लेकर भगवान श्रीविष्णुने बलिराजासे त्रिपाद भूमिका दान मांगा । उपरांत वामनदेवने विराट रूप धारण कर दो पगमेंही संपूर्ण पृथ्वी और अंतरिक्ष व्याप लिया । तब तीसरा पग रखनेके लिए बलिराजाने उन्हें अपना सिर दिया ।

वामनदेवने बलिको पातालमें भेजते समय वर मांगनेके लिए कहा । उस समय बलिने वर्षमें तीन दिन पृथ्वीपर बलिराज्य होनेका वर मांगा । वे तीन दिन हैं – नरक चतुर्दशी, दीपावलीकी अमावस्या और बलिप्रतिपदा । तबसे इन तीन दिनोंको `बलिराज्य’ कहते हैं । धर्मशास्त्र कहता है कि बलिराज्यमें `शास्त्रद्वारा बताए निषिद्ध कर्म छोड़कर, लोगोंको अपने मनानुसार आचरण करना चाहिए । शास्त्रकी दृष्टिसे अभक्ष्यभक्षण अर्थात मांसाहार सेवन, अपेयपान अर्थात निषिद्ध पेयका सेवन एवं अगम्यागमन अर्थात गमन न करने योग्य स्त्रीके साथ सहवास; ये निषिद्ध कर्म हैं । इसका योग्य भावार्थ समझकर हमें बलिप्रतिपदा मनानी चाहिए । इसीलिए पूर्वकालमें इन दिनों लोग मदिरा नहीं पीते थे ! शास्त्रोंसे स्वीकृति प्राप्त होनेके कारण परंपरानुसार लोग मनोरंजनमें समय बिताते  हैं । परंतु आज इसका अतिरेक होता हुआ दिखायी देता है । लोग इन दिनोंको स्वैराचार अर्थात स्वेच्छाचार  के दिन मानकर मनमानी करते हैं । बडी मात्रामें पटाखे जलाकर राष्ट्रकी संपत्तिकी हानि करते हैं । कुछ लोग जुआ खेलकर पैसा उडाते हैं । खान-पान, रात्रि देर तक जागने व चलचित्र, नाटक देखनेमें अधिकांश समय व्यतीत करते हैं ।

बलिप्रतिपदा मनानेकी पद्धति
बलिप्रतिपदाके दिन प्रात: अभ्यंगस्नानके उपरांत सुहागिनें अपने पतिका औक्षण करती हैं । दोपहरको भोजनमें विविध पकवान बनाए जाते हैं । इस दिन लोग नए वस्त्र धारण करते हैं एवं संपूर्ण दिन आनंदमें बिताते हैं । कुछ लोग इस दिन बलिराजाकी पत्नी विंध्यावलि सहित प्रतिमा बनाकर उनका पूजन करते हैं । इसके लिए गद्दीपर चावलसे बलिकी प्रतिमा बनाते हैं । इस पूजाका उद्देश्य है कि, बलिराजा वर्षभर अपनी शक्तिसे पृथ्वीके जीवोंको कष्ट न पहुंचाएं तथा अन्य अनिष्ट शक्तियोंको शांत रखें । इस दिन रात्रिमें खेल, गायन इत्यादि कार्यक्रम कर जागरण करते हैं ।

गोवर्धनपूजन

भगवान श्रीकृष्णद्वारा इस दिन इंद्रपूजनके स्थानपर गोवर्धनपूजन आरंभ किए जानेके स्मरणमें गोवर्धन पूजन करते हैं । इसके लिए कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी तिथिपर प्रात:काल घरके मुख्य द्वारके सामने गौके गोबरका गोवर्धन पर्वत बनाते हैं । शास्त्रमें बताया है कि, इस गोवर्धन पर्वतका शिखर बनाएं । वृक्ष-शाखादि और फूलोंसे उसे सुशोभित करें । परंतु अनेक स्थानोंपर इसे मनुष्यके रूपमें बनाते हैं और फूल इत्यादिसे सजाते  हैं ।  चंदन, फूल इत्यादिसे  उसका पूजन करते हैं और प्रार्थना करते हैं,

गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक ।
विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव ।। – धर्मसिंधु

इसका अर्थ है, पृथ्वीको धारण करनेवाले गोवर्धन ! आप गोकुलके रक्षक हैं । भगवान श्रीकृष्णने आपको भुजाओंमें उठाया था । आप मुझे करोडों गौएं प्रदान करें । गोवर्धन पूजनके उपरांत गौओं एवं बैलोंको वस्त्राभूषणों तथा मालाओंसे सजाते हैं । गौओंका पूजन करते हैं । गौमाता साक्षात धरतीमाताकी प्रतीकस्वरूपा हैं । उनमें सर्व देवतातत्त्व समाए रहते हैं । उनके द्वारा पंचरस प्राप्त होते हैं, जो जीवोंको पुष्ट और सात्त्विक बनाते हैं । ऐसी गौमाताको साक्षात श्री लक्ष्मी मानते हैं । उनका पूजन करनेके उपरांत अपने पापनाशके लिए उनसे प्रार्थना करते हैं । धर्मसिंधुमें इस श्लोकद्वारा गौमातासे  प्रार्थना की है,

लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता ।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु ।। – धर्मसिंधु

इसका अर्थ है, धेनुरूपमें विद्यमान जो लोकपालोंकी साक्षात लक्ष्मी हैं तथा जो यज्ञके लिए घी देती हैं, वह गौमाता मेरे पापोंका नाश करें । पूजनके उपरांत गौओंको विशेष भोजन खिलाते हैं । कुछ स्थानोंपर गोवर्धनके साथही भगवान श्रीकृष्ण, गोपाल, इंद्र तथा सवत्स गौओंके चित्र सजाकर उनका पूजन करते हैं और उनकी शोभायात्रा भी निकालते हैं ।

अन्नकूट

`कूट’ का अर्थ है, पहाड अथवा पर्वत । अन्नकूट उत्सवके रूपमें मनाते हैं । इस उत्सवमें भगवान श्रीविष्णुको समर्पित करनेके लिए पकवानोंके पर्वत  जैसे ढेर बनाते हैं । इसीलिए इस उत्सवको `अन्नकूट’ के नामसे जानते हैं । भागवतमें इसका वर्णन आता है । उसके अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी तिथिपर देवताके नैवेद्यमें नियमित पदार्थोंके अतिरिक्त यथाशक्ति अनेक प्रकारके व्यंजन बनाकर अर्पित करने चाहिए । इनमें दाल, भात अर्थात पके हुए चावल, कढी, साग इत्यादि `कच्चे’ व्यंजन; हलवा, पूरी, खीर इत्यादि `पके’ व्यंजन; लड्डू, पेडे, बर्फी, जलेबी इत्यादि `मीठे’ व्यंजन; केले, अनार, सीताफल इत्यादि `फल’; बैंगन, मूली, साग-पात, रायता, भूजिया  इत्यादि `सलूने’ अर्थात नमकीन, रसीले और चटनी, मुरब्बे, अचार इत्यादि `खट्टे-मीठे-चटपटे’ व्यंजनोंका समावेश होना चाहिए । तथा इनका यथाशक्ति दान भी करना चाहिए ।

प्राचीन कालमें काजवासी इंद्रपूजनमें छप्पन भोग, छत्तीसों व्यंजन बनाकर इंद्रको  निवेदित करते थे । श्रीकृष्णके बतानेपर बृजवासियोंने इंद्रपूजनके स्थानपर गोवर्धनका पूजन करना आरंभ किया । तबसे अन्नकूट गोवर्धन पूजनका ही एक भाग है । इसीके स्मरणमें गोवर्धन पूजनके उपरांत अन्नकूट उत्सव मनाते हैं । इससे भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं । बृजके साथ मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, काशी, नाथद्वारा इत्यादि स्थानोंके मंदिरों यह उत्सव बडे ही
हर्षोल्लासके साथ मनाया जाता है ।

मार्गपाली बंधन एवं नगरप्रवेश विधि

`मार्गपाली’ अर्थात मार्गपर लगा हुआ बंदनवार । मार्गपाली बंधन गांवके समस्त जीवोंके आरोग्य हेतु आवश्यक विधि है । धर्मसिंधु एवं आदित्यपुराणमें मार्गपाली के विषयमें वर्णन आता है । उसमें बताया है कि, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके सायंकालमें कुश अथवा कांसका लंबा और पक्का रस्सा बनाकर उसमें अशोक के पत्ते गूंथकर बंदनवार बनवाएं और गांवके प्रवेश-स्थानपर उसे ऊंचे स्तंभोंपर बांध दें । गंध, फूल इत्यादि चढाकर उसका पूजन करें ।
मार्गपालि नमस्तेज्ञ्स्तु सर्वलोकसुखप्रदे ।
विधेयै: पुत्रदाराद्यै: पुनरेहि कातस्य मे ।। – धर्मसिंधु, आदित्यपुराण
 
अर्थात हे सर्व प्राणिमात्रको सुख देनेवाली मार्गपाली, आपको मेरा नमस्कार है  । पुत्र, पत्नी इत्यादि द्वारा आपको पिरोया है । मेरे कातके लिए पुन: एकबार आपका आगमन हो । इस प्रकार मार्गपालीसे प्रार्थना करें । पूजनके उपरांत सर्वप्रथम उस स्थानका प्रधान पुरुष और उसके पीछे वहांके नर-नारी जयघोष करते हुए तथा हर्षोल्लासके साथ उसके नीचेसे गांवमें प्रवेश करें । तदुपरांत प्रधान पुरुष सौभाग्यवती स्त्रियोंद्वारा नीराजन अर्थात औक्षण अर्थात आरती करायें । मार्गपालीके नीचे होकर निकलनेसे, आनेवाले वर्षमें सर्व प्रकारकी सुख-शान्ति रहती है, रोग दूर होते हैं और गांवकी समस्त जनताके साथ पशु भी निरोगी एवं प्रसन्न रहते हैं।

यमद्वितीया अर्थात भैय्यादूज

असामायिक अर्थात अकालमृत्यु न आए, इसलिए यमदेवताका पूजन करनेके तीन दिनोंमेंसे कार्तिक शुक्ल द्वितीया एक है । यह दीपोत्सव पर्वका समापन दिन है । `यमद्वितीया’ एवं `भैय्यादूज’ के नामसे भी यह पर्व परिचित है ।

कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको `यमद्वितीया’ और `भैय्यादूज’ कहनेके कारण
कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर वायुमंडलमें यमतरंगोंके संचारके कारण वातावरण तप्त ऊर्जासे प्रभारित रहता है । ये तरंगें नीचेकी दिशामें प्रवाहित होती हैं । इन तरंगोंके कारण विविध कष्ट हो सकते हैं, जैसे अपमृत्यु होना, दुर्घटना होना, स्मृतिभ्रंश होनेसे अचानक पागलपनका दौरा पडना, मिरगी समान दौरे पडना अर्थात फिट्स आना अथवा हाथमें लिये हुए कार्यमें अनेक बाधाएं आना । भूलोकमें संचार करनेवाली यमतरंगोंको प्रतिबंधित करनेके लिए यमादि देवताओंका पूजन करते हैं ।
पृथ्वी यमकी बहनका रूप है । इस दिन यमतरंगें पृथ्वीकी कक्षामें आती हैं । इसलिए पृथ्वीकी कक्षामें यमतरंगोंके प्रवेशके संबंधमें कहते हैं कि, कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर यम अपने घरसे बहनके घर अर्थात पृथ्वीरूपी भूलोकमें प्रवेश करते हैं । इसलिए इस दिनको यम- द्वितीयाके नामसे जानते हैं । यमदेवताके अपनी बहनके घर जानेके प्रतीकस्वरूप प्रत्येक घरका पुरुष अपनेही घरपर पत्नी द्वारा बनाए गए  भोजनका न सेवन कर बहनके घर जाकर भोजन करता है  । बहनद्वारा यमदेवताका सम्मान करनेके प्रतीक स्वरूप यह दिन `भैय्यादूज’के नामसे भी प्रचलित है ।
यमद्वितीयाकी तिथिपर करने योग्य धार्मिक विधियां

१. भाई-बहनद्वारा यमादि देवताओंका पूजन
२. बहनद्वारा भाईका औक्षण अर्थात आरती एवं सम्मान करना
३. भाईका बहनको उपहार दिया जाना

शास्त्रकी जानकारी हो, तो कोई भी धार्मिक कृति मन:पूर्वक एवं श्रद्धापूर्वक की जाती है । परिणामत: उससे लाभ भी अधिक प्राप्त होता है ।

१. भाई-बहन द्वारा यमादि देवताओंका पूजन करनेका शास्त्रीय कारण

दीपावलीकी कालावधिमें अकालमृत्युसे रक्षा हेतु यमदेवताके उद्देश्यसे तीन दिनोंपर धार्मिक विधि करनेका विधान है । इन तीन दिनोंमेंसे यह एक दिन है । इन दिनोंमें भूलोकमें यम तरंगें अधिक मात्रामें आती हैं । इन दिनों  यमादि देवताओंके निमित्त किया गया कोई भी कर्म अल्प समयमें फलित  होता है । इसलिए कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर यमदेवका पूजन करते हैं । चौकीपर रखे चावलके तीन पुंजोंपर तीन सुपारियां रखते हैं । चौपाए पर चावलके तीन छोटे छोटे पूंजोंपर तीन सुपारियां रखी जाती हैं ।

यमादि देवताओंका पूजन करनेके लिए, भाई प्रथम आचमन, देशकालकथन और संकल्प करता है । यमादि देवताओंका पूजन करनेके लिए, अपनी दाइं ओरसे पहली सुपारीपर यमदेवताका, दुसरी सुपारीपर चित्रगुप्त देवताका एवं तिसरी सुपारीपर यमदूतका अक्षत समर्पित कर आवाहन किया जाता है ।  आसन, पाद्य, अर्घ्य इत्यादि उपचार अर्पित किए जाते हैं । कर्पास वस्त्र एवं यज्ञोपवित अर्पित किए जाते हैं । चंदन, हलदी, कुमकुम, अक्षत एवं पुष्प इत्यादि उपचार अर्पित कर पूजन किया जाता है ।

उपरांत धूप, दीप दिखाकर नैवेद्य समर्पित किया जाता है । भाईके उपरांत बहन आचमन कर इन देवताओंका पूजन करती है । असामयिक मृत्युसे भाईकी रक्षाके लिए देवताओंसे प्रार्थना करती है ।
२. भाईदूजके दिन बहनद्वारा भाईका औक्षण अर्थात आरती करना

इस दिन बहनें भाईके रूपमें यमदेवका औक्षण कर उनका आवाहन करती हैं । उनका यथोचित आदरसहित सम्मान करती हैं और भूलोकमें संचार करनेवाली यमतरंगोंपर तथा पितृलोककी अतृप्त आत्माओंको प्रतिबंधित करनेके लिए उनसे प्रार्थना करती हैं ।
बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेकी पद्धति

भोजनसे पहले बहन भाईका औक्षण करती है । इसमें वह प्रथम भाईको कुमकुम तिलक एवं अक्षत लगाती है । तीन बार आरती उतारती है । उपहार देकर भाईका सम्मान करती है ।

अब देखते हैं, बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेके सूक्ष्म-स्तरीय परिणाम –

१. औक्षण करते समय बहनमें भावका वलय निर्मित होता है ।
२. ब्रह्मांडसे चैतन्यका प्रवाह औक्षण करनेवाली बहनकी ओर आकृष्ट होता है ।
२ अ. बहनमें इस चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
२ आ. बहनके हाथोंसे चैतन्य तरंगें ताम्रपात्रकी ओर प्रवाहित होकर, उसमें फैलती हैं ।
२ इ. ईश्वरीय चैतन्यका प्रवाह भाईकी ओर आकृष्ट होता है ।
२ ई. और उसमे चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
३. औक्षण करनेके लिए उपयोगमें लाए गए तेलके दीपमें शक्तिका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
३ अ. औक्षण करते समय अर्धवर्तुलाकारमें दीप घुमानेसे दीपके चारों ओर शक्तिका कार्यरत वलय निर्मित होता है ।
३ आ. इस वलयद्वारा शक्तिकी कार्यरत तरंगें भाईकी ओर प्रक्षेपित होती हैं ।
३ इ. भाईकी सूर्यनाडी कार्यरत होती है ।
३ ई. भाईको कार्य करनेके लिए ऊर्जाशक्ति प्राप्त होती है और उसमें शक्तिका वलय निर्मित होता है ।
३ उ. भाईकी देहमें शक्तिके कणोंका संचार होता है  ।
३ ऊ. और उसके देहके चारों ओर सुरक्षाकवच निर्मित होता है ।
३ ए. बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेके कारण वातावरण भी शक्तिके कणोंसे संचारित होता है ।
४. औक्षण करनेके कारण पाताल एवं वायुमंडलसे आक्रमण करनेवाली अनिष्ट शक्तियोंसे भाईका रक्षण होता है ।
५. भाईमें भाव जागृत होता है ।

इससे स्पष्ट होता है कि, भाईदूजके दिन बहनद्वारा भाईका औक्षण किए जानेके कारण बहन तथा भाई दोनोंको लाभ प्राप्त होता है । इसप्रकार यमादि देवताओंका पूजन करनेके उपरांत बहनद्वारा भावसहित भाईका औक्षण करनेसे,
१. परिजनोंको यम तरंगोंके कारण होनेवाले कष्ट घटते हैं ।
२. यमतरंगोंसे परिजनोंकी रक्षा होती है ।
३. वास्तुका वायुमंडल शुद्ध बनता है ।
४. पृथ्वीका वातावरण सीमित समयके लिए यातना रहित अर्थात आनंददायीी रहता है ।
औक्षणके उपरांत भाई बहनके हाथसे बना भोजन ग्रहण करता है । ऐसे बताया है, कि सगी बहन न हो, तो भाईदूजके दिन चचेरी, ममेरी किसी भी बहनके घर जाकर अथवा किसी परिचित स्त्रीको बहन मानकर उसके घर भोजन करना चाहिए ।

३. भाईका बहनको उपहार देना
भोजनके उपरांत भाई यथाशक्ति वस्त्राभूषण, द्रव्य इत्यादि उपहार देकर बहनका सम्मान करता है । यह उपहार सात्त्विक हो, तो अधिक योग्य है । जैसे साधना संबंधी, धर्मसंबंधी ग्रंथ, देवतापूजन हेतु उपयुक्त वस्त्र इत्यादि  । उपहार तामसिक न हो । उदाहरणार्थ अयोग्य चलचित्रकी ध्वनिचक्रिका इत्यादी ।

कुछ स्थानोंपर स्त्रियां सायंकालमें चंद्रमाका औक्षण कर उसके उपरांतही भाईका औक्षण करती हैं । भाई न हो, तो कुछ स्थानोंपर बहन चंद्रमाको भाई मानकर उनका औक्षण करती है । भाईदूजके दिन स्त्रियोंद्वारा चंद्रमाका औक्षण करनेके परिणाम

स्त्रीद्वारा चंद्रमाका आवाहन किये जानेसे चंद्रतरंगें कार्यरत होती हैं । ये तरंगें वायुमंडलमें प्रवेश करती हैं । इन तरंगोंकी शीतलताके कारण ऊर्जामयी यमतरंगें शांत होती हैं और वातावरणकी दाहकता घटती है । इससे यमदेवका क्षोभ भी मिटता है । इसके उपरांत वातावरण प्रसन्न अर्थात सुखद बनता है । वातावरणकी इस प्रसन्नताके कारण स्त्रियोंके अनाहत चक्रकी जागृति होती है । परिणामस्वरूप यमदेवताके उद्देश्यसे भाईके पूजनकी विधिद्वारा भाव बढनेमें सहायता मिलती है और इष्ट फलप्राप्ति होती है ।
भाईदूज मनानेसे भाई और बहनको प्राप्त लाभ

यमद्वितियाके अर्थात भाईदूजके दिन ब्रह्मांडसे आनंदकी तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । इन तरंगोंका सभी जीवोंको अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक लाभ होता है । इसलिए सर्वत्र आनंदका वातावरण रहता है ।

१. बहनमें जागृत देवीतत्त्वका लाभ भाईको मिलना
इस दिन स्त्रीमें देवीतत्त्व जागृत रहता है । इसका लाभ भाईको उसके भावानुसार मिलता है । भाई साधना करता हो, तो उसे आध्यात्मिक स्तरपर लाभ मिलता है । वह साधना न करता हो, तो उसे व्यावहारिक लाभ मिलता है । भाई कामकाज संभालते हुए साधना करता हो, तो उसे दोनों स्तरपर पचास-पचास प्रतिशत लाभ मिलता है ।
२. बहनद्वारा की गई प्रार्थनाके कारण भाई-बहनका लेन-देन घट जाना
यमद्वितियाकी तिथिपर बहन अपने भाईके कल्याणके लिए प्रार्थना करती है । इसका फल भाईको बहनके भावानुसार प्राप्त होता है । इसलिए बहनका भाईके साथ लेन-देन अंशत: घट जाता है । इसी कारण यह दिन एक अर्थसे लेन-देन घटानेके लिए होता है ।
भाईदूजके कारण बहनको प्राप्त लाभ
१. बहनका प्रारब्ध घट जाना
भाईदूजके दिन भाईमें शिवतत्त्व जागृत होता है । इससे बहनका प्रारब्ध एक सहस्त्रांश प्रतिशत घट जाता है । भाईदूजके दिन शास्त्रमें बताए अनुसार कृति करनेके लाभ हमने समझ लिए । इन सूत्रोंसे हिंदु धर्ममें बताए पर्वो उत्सवोंका महत्त्व समझमें आता है ।

भाईदूजके उपलक्ष्यमें आश्रमके संत प.पू. महाराजकीका संदेश

भाईदूज मनमें बसे द्वेष एवं असूया अर्थात ईर्ष्या, शत्रुता, डाह को नष्ट कर बंधुभाव जागृत करनेका दिन है । अपने मनसे द्वेष एवं असूया मिट जानेसे सर्वत्र बंधुभावका विचार जागृत होता है । इसीलिए इस त्यौहारका प्रयोजन है । द्वितीयाका चंद्र आकर्षकता और वर्धमानता दर्शाता है । इस चंद्रसमान बंधुप्रेमका वर्धन होता रहे, यही इस त्यौहार मनानेकी भूमिका है । जिस समाज एवं राष्ट्रके पुरुष स्त्रियोंको भगिनी मानकर उनकी रक्षाका उत्तरदायित्व निभाएंगे और उन्हें अभय प्रदान करेंगे, जब समाज और राष्ट्रकी सर्व स्त्रियां निर्भय होकर समाजमें आदर और सम्मानके साथ विचरण कर पाएंगी, वही खरी यमद्वितीया होगी ।
प.पू. महाराजजीके इस संदेशके अनुसार आचरण करनेका दृढ संकल्प हमें करना चाहिए ।

भाईदूजके दिन एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

भाईदूजके दिन श्री गणपतिका सर्वप्रथम अपनी आरती उतारनेके लिए कहना और कार्यक्रम समाप्त हो जानेपर उसका कारण बताना

वर्ष २००५ में मैं आश्रममें थी । उस वर्ष दीपावलीके पहले दिनसे ही मुझे भाईदूजकी आस लगी थी । ३ नवंबर २००५ की सुबह दंतमंजन करते समय मुझे बालरूपमें श्री गणपति दिखाई दिए । वे मुझसे बोले, `तुम पहले मेरी आरती उतारोगी न !’ मैंने कहा `जी’ ।मुझे लगा, जैसे मैं सर्व देवताओंकी आरती उतार रही हूं । सुबहसे ही मुझे उत्साह एवं आनंदका अनुभव हो रहा था । नहानेके उपरांत वह और बढ़ गया । आश्रममें देवताओंको भाई मानकर उनका औक्षण कर भाईदूज मनाई जाती है । भाईदूजके कार्यक्रममें सर्व देवताओंके चित्रोंको कुमकुम लगाते समय मुझे उनके प्रति बहुत प्रेम एवं आदर प्रतीत हो रहा था । उसके उपरांत देवताओंकी आरती उतारते समय, स्थूलरूपमें मेरा हाथ चित्रके सामने घूम रहा था; परंतु प्रत्यक्षमें मुझे लग रहा था, जैसे मैं विशाल देवताओंकी आरती उतार रही हूं ।

श्रीरामके चित्रकी आरती उतारते समय, मेरा हाथ हनुमानजीके चित्रकी ओर खींचा जा रहा था । अंतमें सद्गुरु की आरती उतारते समय मुझे एक अनोखी शांतिकी अनुभूति हुई । आरती उतारनेके उपरांत मैंने सूक्ष्मरूपसे प्रत्येक देवताको प्रसाद खिलाया । उस समय सर्व देवता मुस्कराते दिखाई दिए । संपूर्ण कार्यक्रमके समय मुझे एक निराले ही आनंदकी अनुभूति हो रही थी । कार्यक्रमके उपरांत भी बहुत समयतक मुझे ध्यानमंदिरसे निकलनेकी  इच्छा नहीं हो रही थी । सर्व साधकोंमें साधकत्व व भक्तिभाव बढ़ने हेतु मुझसे सतत प्रार्थना हो रही थी । अंतमें श्री गणपतिने मुझसे कहा, `इस कार्यक्रममें किसी भी प्रकारकी अड़चनें न आएं, इसलिए तुम्हें मैंने पहले मेरी आरती उतारनेके लिए कहा । – श्रीमती शुभा.

शास्त्रमें बताए अनुसार आचरण कर आप भी भाईदूजका पुरा लाभ उठाएंगे, इसी आशा के साथ दीपावलीके उपलक्ष्यमें आपको हार्दिक शुभकामनांए ।


 

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