Dhantrayodashi (Hindi Article)

Dhantrayodashi (Hindi Article) | Dipawali

सारणी –


धनत्रयोदशी दिनविशेष

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात `धनत्रयोदशी’ । इसीको साधारण बोलचालकी भाषामें `धनतेरस’ कहते हैं । इस दिनके विशेष महत्त्वका कारण यह दिन देवताओंके वैद्य धन्वंतरिकी जयंतीका दिन है ।

समुद्रमंथनके समय धनत्रयोदशीके दिन अमृतकलश हाथमें लेकर देवताओंके वैद्य भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए । इसीलिए यह दिन भगवान धन्वंतरिके जन्मोत्सवके रूपमें मनाया जाता है । आयुर्वेदके विद्वान एवं वैद्य मंडली इस दिन भगवान धन्वंतरिका पूजन करते हैं और लोगोंके दीर्घ जीवन तथा आरोग्यलाभके लिए मंगलकामना करते हैं । इस दिन नीमके पत्तोंसे बना प्रसाद ग्रहण करनेका महत्त्व है । माना जाता है कि, नीमकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है और धन्वंतरि अमृतके दाता हैं । अत: इसके प्रतीकस्वरूप धन्वंतरि जयंतीके दिन नीमके पत्तोंसे बना प्रसाद बांटते हैं । इस दिनकी एक अन्य विशेषता भी है, धनत्रयोदशी कातके रूपमें भी मनाई जाती है । धनत्रयोदशी मृत्युके देवता यमदेवसे संबंधित कात है । यह कात दिनभर रखते हैं । कात रखना संभव न हो, तो सायंकालके समय यमदेवके लिए दीपदान अवश्य करते हैं ।

यमदीपदान

दीपावलीके कालमें धनत्रयोदशी, नरकचतुर्दशी एवं यमद्वितीया, इन तीन दिनोंपर यमदेवके लिए दीपदान करते हैं । इनमें धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदानका विशेष महत्त्व है, जो स्कंदपुराणके इस श्लोकसे स्पष्ट होता है । 
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।। – स्कंदपुराण

इसका अर्थ है, कार्तिक मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशीके दिन सायंकालमें घरके बाहर यमदेवके उद्देश्यसे दीप रखनेसे अपमृत्युका निवारण होता है ।
   
इस संदर्भमें एक कथा है कि, यमदेवने अपने दूतोंको आश्वासन दिया कि, धनत्रयोदशीके दिन यमदेवके लिए दीपदान करनेवालेकी अकाल मृत्यु नहीं होगी ।

धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदान करनेका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

१. दीपदानसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होना
दीप प्राणशक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है । दीपदान करनेसे व्यक्तिको तेजकी प्राप्ति होती है । इससे उसकी प्राणशक्तिमें वृद्धि होती है और उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है । 
२. यमदेवके आशीर्वाद प्राप्त करना
धनत्रयोदशीके दिन ब्रह्मांडमें यमतरंगोंके प्रवाह कार्यरत रहते हैं । इसलिए इस दिन यमदेवतासे संबंधित सर्व विधियोंके फलित होनेकी मात्रा अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक होती है । धनत्रयोदशीके दिन संकल्प कर यमदेवके लिए दीपका दान करते हैं और उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
३. यमदेवके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना
यमदेव मृत्युलोकके अधिपति हैं । धनत्रयोदशीके दिन यमदेवका नरकपर आधिपत्य होता है । साथही विविध लोकोंमें होनेवाले अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर भी उनका नियंत्रण रहता है । धनत्रयोदशीके दिन यमदेवसे प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकोंतक पहुंचती हैं । इसी कारण धनत्रयोदशीके दिन नरकमें विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं । परिणामस्वरूप पृथ्वीपर भी नरकतरंगोंकी मात्रा घटती है । इसीलिए धनत्रयोदशीके दिन यमदेवके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए उनका भावसहित पूजन एवं दीपदान करते हैं । दीपदानसे यमदेव प्रसन्न होते हैं ।

संक्षेपमें कहें तो, यमदीपदान करना अर्थात दीपके माध्यमसे यमदेवको प्रसन्न कर अपमृत्युके लिए कारणभूत कष्टदायक तरंगोंसे रक्षाके लिए उनसे प्रार्थना करना ।     

यमदीपदान की विधि

यमदीपदान विधिमें नित्य पूजाकी थालीमें घिसा हुआ चंदन, पुष्प, हलदी, कुमकुम, अक्षत अर्थात अखंड चावल इत्यादि पूजासामग्री होनी चाहिए । साथही आचमनके लिए ताम्रपात्र, पंचपात्र, आचमनी ये वस्तुएं भी आवश्यक होती हैं । यमदीपदान करनेके लिए हलदी मिलाकर गुंदे हुए गेहूंके आटेसे बने विशेष दीपका उपयोग करते हैं ।

गेहूंके आटेसे बने दीपका महत्त्व
धनत्रयोदशीके दिन कालकी सूक्ष्म कक्षाएं यमतरंगोंके आगमन एवं प्रक्षेपणके लिए खुली होती हैं । इस दिन तमोगुणी ऊर्जातरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगे अधिक मात्रामें कार्यरत रहती हैं । इन तरंगोंमें जडता होती है । ये तरंगे पृथ्वीकी कक्षाके समीप होती हैं । व्यक्तिकी अपमृत्युके लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैं । गेहूंके आटेसे बने दीपमें इन तरंगोंको शांत करनेकी क्षमता रहती है । इसलिए यमदीपदान हेतु गेहूंके आटेसे बने दीपका उपयोग किया जाता है ।

यमदीपदानके उद्देश्यसे की जानेवाली पूजाके लिए दीप स्थापित करनेके लिए श्रीकृष्णयंत्रकी रंगोली बनाते है । यमदीपदान हेतु इसप्रकार कृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली बनानेका विशेष महत्त्व है ।
यमदीपदानके समय दीप रखनेके लिए कृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली बनानेका शास्त्रीय आधार
दीपकी पूजनविधिसे पूर्व श्रीविष्णुके २४ नामोंसे उनका आवाहन कर विधिका संकल्प करते हैं । `श्रीकृष्ण’ श्रीविष्णुके पूर्णावतार हैं । यमदेवमें भी श्रीकृष्णजीका तत्त्व होता है । इस कारण पूजनके पूर्व किए जानेवाले आवाहनद्वारा विधिके स्थानपर अल्प समयमेंही यमदेवका आगमन तत्त्वरूपमें होता है । मृत्युसे संबंधित जडत्वदर्शक तरंगोंसे व्यक्तिको होनेवाला कष्ट, श्रीकृष्णजीके तथा यमदेवके अधिष्ठानके फलस्वरूप घट जाता है । यही कारण है कि, धनत्रयोदशीके दिन श्रीकृष्णजीका तत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोली बनाते हैं । यमदेवमें शिवतत्त्व भी होता है । इस कारण शिवतत्त्वसे संबंधित रंगोली भी बना सकते हैं । इसका लाभ श्रीकृष्ण तत्त्वकी रंगोलीसे प्राप्त लाभ समानही होता है ।

यमदीपदान पूजनविधि और उसका शास्त्रीय आधार

प्रथम आचमन, प्राणायाम, उपरांत देशकालका उच्चारण किया जाता है । यमदीपदान के लिए संकल्प किया जाता है। संकल्प करते समय इस प्रकार उच्चारण किया जाता है ।
मम अपमृत्यु विनाशार्थम् यमदीपदानं करिष्ये । 
इसका अर्थ है, अपनी अपमृत्युके निवारण हेतु मैं यमदीपदान करता हूं ।
ताम्रपात्रमें रखा आटेका दीप प्रज्वलित किया जाता है । रंगोलीसे बनाए गए श्रीकृष्णयंत्रके मध्यबिंदुपर दीप रखा जाता है । दीपको चंदन, अक्षत, हलदी एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है । दीपको पुष्प अर्पित किया जाता है। दीपको नमस्कार किया जाता है। इसके पश्चात् यह दीप उठाकर घरके बाहर ले जानेके लिए ताम्रपात्रमें रखा जाता है । दीपको घरके बाहर ले जाते हैं । घरके बाहर दीपको दक्षिण दिशाकी ओर मुख कर रखा जाता है ।
यमदेवताको उद्देशित कर प्रार्थना की जाती है ।
मृत्युना पाशदंडाभ्यां कालेन श्यामयासह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतां मम ।। – स्कंदपुराण
इसका अर्थ है, त्रयोदशीपर यह दीप मैं सूर्यपुत्रको अर्थात् यमदेवताको अर्पित करता हूं । मृत्युके पाशसे वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें ।

जिन्हें श्लोककी जानकारी नहीं, वे अर्थको समझ कर मृत्युके पाशसे मुक्त होनेके लिए एवं अपने कल्याणके लिए प्रार्थना कर सकते हैं । प्रार्थना जितनी भावपूर्वक की जाती है, उतना ही  लाभ अधिक होता है । दीपदान हेतु जल छोडा जाता है ।

दीपका पूजन करनेके परिणाम

दीपको चंदन लगानेपर विष्णुतत्त्वकी नीली आनंददायी ज्योति दीपके मध्यमें विराजमान होती है । दीपको फूल अर्पण करनेपर नीली ज्योतिमें पीले बिंदुके रूपमें तेजका अस्तित्व दिखायी देता है । दीपको अक्षत अर्पित करनेपर नीली ज्योतिमें पीले बिंदुके रूपमें विद्यमान तेजतत्त्व क्रियाशील होता है । इस तेजतत्त्वद्वारा वातावरणमें तेजतत्त्वकी तरंगें वलयोंके रूपमें प्रक्षेपित होती हैं ।

पूजित दीप घरके बाहर दक्षिण दिशामें रखनेके परिणाम

दक्षिण दिशा यमतरंगोंके लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशासे यमतरंगें  अधिक मात्रामें आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं ।

दक्षिण दिशासे यमतरंगोंका प्रवाह दीपकी ओर आकृष्ट होता है । यमतरंगोंका यह प्रवाह दीपके चारों ओर वलयांकित रूपमें फैलता है । यमतरंगोंके कारण कनिष्ठ प्रकारकी अनिष्ट शक्तियां दूर हट जाती हैं । यमतरंगोंके रूपमें आए यमदेवके दर्शन हेतु स्थानदेवता एवं वास्तुदेवता भी तत्त्वरूपमें उस स्थानपर आते हैं । इन देवताओंके आगमनके कारण वायुमंडल चैतन्यमय बनता है । वास्तुमें रहनेवाले सभी सदस्योंको इसका लाभ होता है ।

इस प्रकार यमतरंगोंके निकट आनेके कारण धनत्रयोदशीके दिन दीपका पूजन कर उसका यमदेवके लिए किया दान उन्हें अल्पावधिमें एवं सहजतासे प्राप्त होता है । परिणामस्वरूप अपमृत्युके लिए कारणभूत तरंगोंसे व्यक्तिकी रक्षा होती है ।

यमदीपदान करनेके संदर्भमें (प.पू.महाराजांचे छायाचित्र) आश्रम के संत प.पू. राम महाराजजी बताते हैं ।

यम, मृत्यु एवं धर्मके देवता हैं । हमें सतत भान होना आवश्यक है कि, प्रत्येक मनुष्यकी मृत्यु निश्चित है । ऐसे भानसे मनुष्यके हाथों कभी बुरा कर्म अथवा धनका अपव्यय नहीं होता । यमदेवके लिए दीपदान कर कहें कि, हे यमदेव, इस दीप समान हम सतर्क हैं, जागरूक हैं । जागरुकता व प्रकाशका प्रतीक दीप हम आपको अर्पित कर रहे हैं, इसका स्वीकार करें ।

प.पू. पांडे महाराजजीद्वाराद्वारा बताए अनुसार मृत्युका भान सदैव रखकर हम जीवन बिताएंगे, तो हमसे अवश्यही धर्मपालन होगा । 

व्यापारियोंद्वारा किया जानेवाला द्रव्यकोष पूजन

व्यापारी लोगोंके लिए यह दिन विशेष महत्त्वका है । व्यापारी वर्ष, एक दीवालीसे दूसरी दीवालीतक होता है । नए वर्षकी लेखा-बहियां इसी दिन लाते हैं । कुछ स्थानोंपर इस दिन व्यापारी द्रव्यकोषका अर्थात तिजोरीका पूजन करते हैं ।

पूर्वकालमें साधनाके एक अंगके रूपमेंही व्यापारी वर्ग इस दिन द्रव्यकोषका पूजन करते थे । परिणामस्वरूप उनके लिए श्री लक्ष्मीजीकी कृपासे धन अर्जन एवं उसका विनियोग उचित रूपसे करना संभव होता था । इस प्रकार वैश्यवर्णकी साधनाद्वारा परमार्थ पथपर अग्रसर होना व्यापारी जनोंके लिए संभव होता है ।

धनत्रयोदशीके दिन विशेष रूपसे स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र तथा नए वस्त्रालंकार क्रय किए जाते हैं । इससे वर्षभर घरमें धनलक्ष्मी वास करती हैं ।

धनत्रयोदशीके दिन स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र क्रय करनेका शास्त्रीय कारण

धनत्रयोदशीके दिन लक्ष्मीतत्त्व कार्यरत रहता है । इस दिन स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र क्रय करनेकी कृतिद्वारा श्री लक्ष्मीके धनरूपी स्वरूपका  आवाहन किया जाता है और कार्यरत लक्ष्मीतत्त्वको गति प्रदान की जाती है । इससे द्रव्यकोषमें धनसंचय होनेमें सहायता मिलती है ।

यहां ध्यान रखनेयोग्य बात यह है कि, धनत्रयोदशीके दिन अपनी संपत्तिका लेखा-जोखा कर शेष संपत्ति ईश्वरीय अर्थात सत्कार्यके लिए अर्पित करनेसे धनलक्ष्मी अंततक रहती है ।

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