Ghatasthapana Vidhi ke Adhyatmik Parinam (Hindi)

Ghatasthapana Vidhi ke Adhyatmik Parinam (Hindi) | Navratri


।।  श्री दुर्गादेव्यै नम: ।।

घटस्थापनाके विधीके आध्यात्मिक परिणाम

नवरात्रिके प्रथम दिन घटस्थापना करते हैं । घटस्थापना करना अर्थात नवरात्रिकी कालावधिमें ब्रह्मांडमें कार्यरत शक्तितत्त्वका घटमें आवाहन कर उसे कार्यरत करना । कार्यरत शक्तितत्त्वके कारण वास्तुमें विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं।

कलशमें डाली गई वस्तुओंसे प्राप्त लाभकी मात्रा

१. घटस्थापनाके लिए रखे कलशमें भरे जलसे २० प्रतिशत लाभ होता है,
२. फूलसे २० प्रतिशत
३. दूर्वासे १० प्रतिशत
४. अक्षतसे १० प्रतिशत
५. सुपारीसे ३० प्रतिशत एवं
६. सिक्केसे १० प्रतिशत लाभ होता है ।
इस प्रकार कलशमें ये सभी वस्तुएं रखनेसे कुल १०० प्रतिशत लाभ होता है ।
हमारे ऋषिमुनियोंने इन अध्यात्मशास्त्रीय तथ्यों का गहन अध्ययन कर हमें यह गूढ ज्ञान दिया । इससे उनकी महानताका भी बोध होता है । नवरात्रिमें घटस्थापनाके अंतर्गत वेदीपर मिटि्टमें सात प्रकारके अनाज बोते हैं ।

वेदीपर मिट्टीमें बोए जानेवाले अनाजसे प्राप्त आध्यात्मिक लाभकी मात्रा

१. जौ का उपयोग करनेसे १० प्रतिशत लाभ होता है ।
२. तिलसे १० प्रतिशत
३. चावलसे २० प्रतिशत लाभ होता है ।
४. मूंगसे१० प्रतिशत
५. कंगनीका उपयोग करनेसे २० प्रतिशत
६. चने का उपयोग करनेसे २० प्रतिशत और
७. गेहूंका उपयोग करनेसे १० प्रतिशत लाभ मिलता है ।
इस प्रकार सात प्रकारके अनाजके उपयोगसे शत प्रतिशत लाभ होता है ।
देश, काल एवं परिस्थितिके अनुरूप इन वस्तुओंमें भलेही कुछ परिवर्तन होता है, उनसे होनेवाले लाभ एक समानही होते हैं । लाभ की मात्रा व्यक्तिके भावपर निर्भर करती है । यदी पूजकका धार्मिक विधियोंके प्रति भाव अधिक हो, तो उसे प्राप्त होनेवाले लाभ भी अधिक होते हैं ।

वेदीपर सात प्रकारके अनाज बोनेके लिए ली गई मिट्टी अथवा तांबेके कलशमें रखी मिट्टी पृथ्वीतत्त्वका प्रतीकस्वरूप है ।

कुछ स्थानोंपर जौ की अपेक्षा अलसीका, चावलकी अपेक्षा सांवांका और कंगनीकी अपेक्षा चनेका उपयोग भी करते हैं । मिट्टी पृथ्वीतत्त्वका प्रतीक है ।
मिट्टीमें सप्तधान्यके रूपमें आप एवं तेजका अंश बोया जाता है ।
सात प्रकारके अनाजद्वारा आप एवं तेज तत्त्वकी तरंग प्रक्षेपित होती हैं ।   बंद घटमें उत्पन्न ऊष्ण ऊर्जाकी सहायतासे नाद निर्माण करनेवाली तरंगोंकी निर्मिति होती है । बीजद्वारा प्रक्षेपित एवं घटमें निर्मित तरंगोंकी ओर ब्रह्मांडकी तेजतत्त्वात्मक आदिशक्तिरूपी तरंगें अल्पावधिमें आकृष्ट हो जाती हैं । ये तरंगें मिट्टीमें दीर्घकालतक बनी रहती हैं ।  तांबेके कलशके कारण इन तरंगोंका वायुमंडलमें वेगसे प्रक्षेपण होता है ।  इन तरंगोंका वास्तुमें संचार होनेसे संपूर्ण वास्तु मर्यादित कालके लिए लाभान्वित होती है । घटस्थापनाके कारण शक्तितत्त्वकी तेजरूपी रजोतरंगें ब्रह्मांडमें कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंके कारण पूजकके सूक्ष्मदेहकी शुद्धि होती है ।

हमने घटस्थापनाके अंतर्गत वेदीपर सप्तधान्य बोनेके सूक्ष्म-स्तरीय परिणाम समझ लिए । वेदीपर घट, नवार्णव यंत्र एवं देवीकी स्थापना करनेसे ब्रह्मांडमें विद्यमान ब्रह्मा, शिव, विष्णु, प्रजापति एवं मीनाक्षी ये पंचतत्त्व मिट्टीमें सहजतासे आकृष्ट होते हैं । इनसे उपासकको भी लाभ होता है। नवरात्रि अंतर्गत देवीपूजनमें आवाहन प्रक्रिया एवं स्थापनाका विशेष महत्त्व है । आवाहनके अंतर्गत किया जानेवाला संकल्प, शक्तितत्त्वकी तरंगोंको विशिष्ट पूजास्थानपर दीर्घकालतक कार्यरत रखनेमें सहायक होता है ।

नवार्णव यंत्रकी स्थापनाका शास्त्रीय आधार

`नवार्णव यंत्र’ देवीके विराजमान होनेके लिए पृथ्वीपर स्थापित आसनका प्रतीक है । नवार्णव यंत्रकी सहायतासे पूजास्थलपर देवीके नौ रूपोंकी मारक तरंगोंको आकृष्ट करना संभव होता है । इन सभी तरंगोंका यंत्रमें एकत्रीकरण एवं घनीकरण होता है । इस कारण इस आसनको देवीका निर्गुण अधिष्ठान मानते हैं । इस यंत्रद्वारा आवश्यकतानुसार देवीका सगुण रूप ब्रह्मांडमें कार्यरत होता है । देवीके इस रूप को प्रत्यक्ष कार्यरत तत्त्व का प्रतीक माना जाता है ।

नवार्णव यंत्रपर अष्टभुजा देवीकी मूर्ति स्थापित करनेके परिणाम

अष्टभुजा देवी शक्तितत्त्वका मारक रूप हैं । `नवरात्रि’ ज्वलंत तेजतत्त्वरूपी आदिशक्तिके अधिष्ठानका प्रतीक है । अष्टभुजा देवीके हाथोंमें विद्यमान आयुध, उनके प्रत्यक्ष मारक कार्यकी क्रियाशीलताका प्रतीक हैं । देवीके हाथोंमें ये मारकतत्त्वरूपी आयुध, अष्टदिशाओंके अष्टपालके रूपमें ब्रह्मांडका रक्षण करते हैं । ये आयुध नवरात्रिकी विशिष्ट कालावधिमें ब्रह्मांडमें अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश भी लगाते हैं और उनके कार्यकी गतिको खंडित कर पृथ्वीका रक्षण करते हैं । नवार्णव यंत्रपर देवीकी मूर्तिकी स्थापना, शक्तितत्त्वके इस कार्यको वेग प्रदान करनेमें सहायक है ।

नवरात्रिमें अखंड दीपप्रज्वलनका शास्त्रीय आधार

दीप तेजका प्रतीक है एवं नवरात्रिकी कालावधिमें वायुमंडल भी शक्तितत्त्वात्मक तेजकी तरंगोंसे आवेशित होता है । इन कार्यरत तेजाधिष्ठित शक्तिकी तरंगोंके वेग एवं कार्यमें अखंडत्व होता है । अखंड प्रज्वलित दीपकी ज्योतिमें इन तरंगोंको ग्रहण करनेकी क्षमता होती है ।
अखंड दीप प्रज्वलनके परिणाम समझ लेते हैं –

  • नवरात्रिकी कालावधिमें अखंड दीप प्रज्वलनके फलस्वरूप दीपकी ज्योतिकी ओर तेजतत्त्वात्मक तरंगें आकृष्ट होती हैं । 
  • इन तरंगोंका वास्तुमें सतत संक्रमण होता है । 
  •  इस संक्रमणसे वास्तुमें तेजका संवर्धन होता है ।

इस प्रकार अखंड दीपप्रज्वलनका लाभ वास्तुमें रहनेवाले सदस्योंको वर्षभर होता है । इस तेजको वास्तुमें बनाए रखना सदस्योंके भावपर निर्भर करता है ।

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