Lakshmi Pujan aur Alakshami Nisaran (Hindi)

Lakshmi Pujan aur Alakshami Nisaran (Hindi) | Dipawali

सारणी – 

१. श्री लक्ष्मीपूजन एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
   १.१ दीपावलीके कालमें आनेवाली अमावस्याका महत्त्व
   १.२ श्रीलक्ष्मी तथा कुबेर का आवाहन एवं पूजन
   १.३ श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करनेका कारण
   १.४ श्री लक्ष्मीदेवीके नैवेद्यमें समाविष्ट घटक 
   १.५ श्री लक्ष्मीके पूजन हेतु उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीसे प्राप्त लाभ
२. दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली प्रक्रिया
३. लक्ष्मी पंचायतनमें समाविष्ट देवताओंका कार्य
४. श्री लक्ष्मीपूजनके अन्य लाभ ।
५. अलक्ष्मी नि:सारण


श्री लक्ष्मीपूजन एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

विक्रम संवत अनुसार कार्तिक अमावस्याका दिन दीपावलीका एक महत्त्वपूर्ण दिन है ।
दीपावलीके कालमें आनेवाली अमावस्याका महत्त्व
सामान्यत: अमावस्याको अशुभ मानते हैं; परंतु दीपावली कालकी अमावस्या शरदपूर्णिमा अर्थात कोजागिरी पूर्णिमाके समान ही कल्याणकारी एवं समृद्धिदर्शक है ।
 इस दिन करनेयोग्य धार्मिक विधियां हैं..
१. श्री लक्ष्मीपूजन
२. अलक्ष्मी नि:सारण
दीपावलीके इस दिन धन-संपत्तिकी अधिष्ठात्रि देवी श्री महालक्ष्मीका पूजन करनेका विधान है । दीपवालीकी अमावस्याको अर्धरात्रिके समय श्री लक्ष्मी का आगमन सद्गृहस्थोंके घर होता है । घरको पूर्णत: स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित कर दीपावली मनानेसे देवी श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वहां स्थायी रूपसे निवास करती हैं । इसीलिए इस दिन श्री लक्ष्मीजीका पूजन करते हैं और दीप जलाते हैं । यथा संभव श्री लक्ष्मीपूजनकी विधि सपत्निक करते हैं ।

यह अमावस्या प्रदोषकालसे आधी रात्रितक हो, तो श्रेष्ठ होती है । आधी रात्रितक न हो, तो प्रदोषव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए । दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजनके लिए विशेष सिद्धता की जाती है ।

पूजाके आरंभमें आचमन किया जाता है । (मंत्र) उपरांत प्राणायाम ……… एवं देशकालकथन किया जाता है । तदुपरांत लक्ष्मीपूजन एवं उसके अंतर्गत आनेवाले अन्य विधियोंके लिए संकल्प किया जाता है । (मंत्र)

पूजनके आरंभमें, आचमन, प्राणायाम इत्यादि धार्मिक कृतियां करनेसे पूजककी सात्त्विकता बढ़ती है । इससे पूजकको देवतापूजनसे प्राप्त चैतन्यका आध्यात्मिक स्तरपर अधिक लाभ होता है । श्री लक्ष्मीपूजनका प्रथम चरण है, 
श्री महागणपतिपूजन –
संकल्पके उपरांत श्रीमहागणपतिपूजनके लिए ताम्रपात्रमें रखे नारियलमें श्रीमहागणपतिका आवाहन किया जाता है । आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, कर्पासवस्त्र, चंदन, पुष्प एवं दुर्वा, हलदी, कुमकुम, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचार अर्पित कर पूजन किया जाता है ।

श्री गणपति दिशाओंके स्वामी हैं । इसलिए प्रथम श्री महागणपति पूजन करनेसे सर्व दिशाएं खुल जाती हैं । परिणामस्वरूप सर्व देवतातत्त्वोंकी तरंगोंको बिना किसी अवरोध पूजनविधिके स्थानपर आना सुलभ होता है । श्री महागणपति पूजनके उपरांत कलश, शंख, घंटा, दीप इन पूजाके उपकरणोंका पूजन किया जाता है । तत्पश्र्चात जल प्रोक्षण कर पूजासामग्री की शुद्धि की जाती है ।
वरुण तथा अन्य देवताओंका आवाहन और पूजन
चौपाएपर अखंड चावलका पुंज बनाकर उसपर जलसे भरा कलश रखते हैं । कलशमें भरे जलमें चंदन, आम्रपल्लव, सुपारी एवं सिक्के रखे जाते हैं ।   कलशको वस्त्र अर्पित किया जाता है । तदुपरांत कलशपर अखंड चावलसे भरा पूर्णपात्र रखा जाता है । इस पूर्णपात्रमें रखे चावलपर कुमकुमसे अष्टदल कमल बनाया होता है । कलशको अक्षत समर्पित कर उसमें वरुण देवताका आवाहन किया जाता है । चंदन, हलदी, कुमकुम, अक्षत एवं पुष्प अर्पित कर वरुणदेवताका पूजन किया जाता है ।

अष्टदल कमलके कारण उस स्थानपर शक्तिके स्पंदनोंका निर्माण होता है । ये शक्तिके स्पंदन सर्व दिशाओंमें प्रक्षेपित होते हैं । इस प्रकार पूर्णपात्रमें बना अष्टदल कमल यंत्रके समान कार्य करता है । पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर सर्व देवताओंकी स्थापना करते हैं । कलशमें श्री वरुणदेवताका आवाहन कर उनका पूजन करते हैं । तदुपरांत पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर आवाहन किए गए देवता तत्त्वोंका पूजन करते हैं ।
कलशमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका महत्त्व
वरुण जलके देवता हैं । वरुणदेवता आपतत्त्वका नियमन करते हैं और कर्मकांडके विधि करते समय आवश्यकताके अनुसार ईश्वरीय तत्त्व साकार होनेमें सहायता करते हैं । आपतत्त्वके माध्यमसे आवश्यक ईश्वरीय तत्त्व व्यक्तिमें एवं विधिके स्थानपर कार्यरत होता है । यही कारण है कि, हिंदु धर्मने विविध देवताओंके पूजन हेतु की जानेवाली विभिन्न प्रकारकी विधियोंमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका विधान बताया है ।

कलशमें वरुण देवताका आवाहन कर पूजन करनेके उपरांत चावलसे भरे पूर्णपात्र पर अक्षत अर्पित कर सर्व देवताओंका आवाहन किया जाता है। चंदन, पुष्प एवं तुलसीपत्र, हलदी, कुमकुम, धुप, दीप आदि उपचार अर्पित कर सर्व देवताओंका पूजन किया जाता है ।
श्रीलक्ष्मी तथा कुबेर का आवाहन एवं पूजन
सर्व देवताओंके पूजनके उपरांत कलशपर रखे पूर्णपात्रमें श्रीलक्ष्मीकी मूर्ति रखी जाती है । उसके निकट द्रव्यनिधि रखा जाता है । उपरांत अक्षत अर्पित कर ध्यानमंत्र बोलते हुए, मूर्तिमें श्रीलक्ष्मी तथा द्रव्यनिधि पर कुबेर का आवाहन किया जाता है । अक्षत अर्पित देवताओंको आसन दिया जाता है । उपरांत श्री लक्ष्मीकी मूर्ति एवं द्रव्यनिधि स्वरूप कुबेर को अभिषेक करने हेतु ताम्रपात्रमें रखा जाता है । अब श्रीलक्ष्मी एवं कुबेर को आचमनीसे जल छोडकर पाद्य एवं अर्घ्य दिया जाता है ।

तत्पश्र्चात दूध, दही, घी, मधु एवं शर्करासे अर्थात पंचामृत स्नान का उपचार दिया जाता है । गंधोदक एवं उष्णोदक स्नान का उपचार दिया जाता है । चंदन व पुष्प अर्पित किया जाता है । श्री लक्ष्मी व कुबेरको अभिषेक किया जाता है । उपरांत वस्त्र, गंध, पुष्प, हलदी, कुमकुम, कंकणादि सौभाग्यालंकार, पुष्पमाला अर्पित की जाती हैं । श्री लक्ष्मीके प्रत्येक अंगका उच्चारण कर अक्षत अर्पित की जाती है । इसे अंगपूजा कहते हैं ।

श्री लक्ष्मीकी पत्रपूजा की जाती है । इसमें सोलह विभिन्न वृक्षोंके पत्र अर्पित किए जाते हैं । पत्रपूजाके उपरांत धूप, दीप आदि उपचार समर्पित किए जाते हैं ।  श्रीलक्ष्मी व कुबेरको नैवेद्य चढ़ाया जाता है । अंतमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित की जाती है । कुछ स्थानोंपर देवीको धनिया एवं लाई अर्पण करनेकी प्रथा है ।

कुछ स्थानोंपर भित्तिपर विभिन्न रंगोंद्वारा श्रीगणेश-लक्ष्मीजीके चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं । तो कुछ स्थानोंपर श्रीगणेश-लक्ष्मीजीकी मूर्तियां तथा कुछ स्थानोंपर चांदीके सिक्केपर श्री लक्ष्मीजीका चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं ।
श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करनेका कारण
किसी भी देवता पूजनमें देवताका आवाहन करनेसे देवताका निर्गुण तत्त्व कार्यरत होता है और पूजास्थानपर आकृष्ट होता है । देवताकी मूर्ति देवताका सगुण रूप है । इस सगुण रूपको भावसहित और संभव हो, तो मंत्रसहित अभिषेक करनेसे मूर्तिमें देवताका सगुणतत्त्व कार्यरत होता है । इससे मूर्तिमें संबंधित देवताका निर्गुण तत्त्व आकृष्ट होनेमें सहायता होती है । अभिषेकद्वारा जागृत मूर्तिको उसके स्थानपर रखनेसे उस स्थानका स्पर्श मूर्तिको होता रहता है । इससे आवाहन किए गए देवतातत्त्व मूर्तिमें निरंतर संचारित होते रहते हैं । इस प्रकार देवतातत्त्वसे संचारित मूर्तिद्वारा देवतातत्त्वकी तरंगें प्रक्षेपित होने लगती हैं । जिनका लाभ पूजकके साथही वहां उपस्थित अन्य व्यक्तियोंको भी मिलता है । साथही पूजास्थानके आसपासका वातावरण भी देवतातत्त्वकी तरंगोंसे संचारित होता है । यही कारण है कि, श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करते हैं ।

श्री लक्ष्मी एवं कुबेरको नैवेद्य निवेदित करते हैं । श्री लक्ष्मीको धनिया एवं चावलकी खीलें अर्पण करते है ।
श्री लक्ष्मीदेवीके नैवेद्यमें समाविष्ट घटक 
श्री लक्ष्मीपूजनमें देवीको अर्पित करने हेतु बनाए नैवेद्यमें लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर, इन घटकोंका समावेश होता है । कुछ लोग संभव हो, तो इन घटकोंको मिलाकर बनाए खोएका उपयोग नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इन घटकोंमेंसे प्रत्येक घटकका कार्य भिन्न होता है ।
१. लौंग तमोगुणका नाश करती है ।
२. इलायची रजोगुणका नाश करती है ।  
३. दूध एवं शक्कर सत्त्वगुणमें वृद्धि करते हैं ।
यही कारण है कि, इन घटकोंको ‘त्रिगुणावतार’ कहते हैं । ये घटक व्यक्तिमें त्रिगुणोंकी मात्राको आवश्यकतानुसार अल्पाधिक करनेका महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं ।
कुछ स्थानोंपर लक्ष्मीपूजनके लिए धनिया, बताशे, चावलकी खीलें, गुड तथा लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर इत्यादिसे बनाए खोएका उपयोग भी नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इनमेंसे धनिया `धन’ वाचक शब्द है, तो चावलकी `खीलें’ समृद्धिका । मुट्ठीभर धान भूंजनेपर उससे अंजुलीभर खीलें बनती हैं । लक्ष्मीकी अर्थात धनकी समृद्धि होने हेतु श्री लक्ष्मीजीको खीलें चढाते हैं ।
श्री लक्ष्मीके पूजन हेतु उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीसे प्राप्त लाभ
१. बताशेसे सात्त्विकताका २५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
२. धानद्वारा शक्तिकी तरंगोंका २० प्रतिशत
३. चावलकी खीलोंसे चैतन्यकी तरंगोंका २५ प्रतिशत   
४. गूडसे आनंदकी तरंगोंका १५ प्रतिशत
५. धनियासे शांतिकी तरंगोंका १५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
इनका कुल योग होता है १०० प्रतिशत ।
इस सारिणीसे श्री लक्ष्मीपूजनके समय उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीका महत्त्व स्पष्ट होता है । ये सामग्री देवीको निवेदित करनेके उपरांत प्रसादके रूपमें सगेसंबंधियोंमें बांटते हैं ।

पूजनके अंतिम चरणमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित करते हैं । श्रद्धापूर्वक नमस्कार कर पूजनके समय हुई गलतियोंके लिए देवीकी क्षमा याचना करते हैं ।

दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली प्रक्रिया

लक्ष्मीपूजन करनेके परिणाम पूजा करनेवाले पती-पत्नी दोनोंपर होता है । परंतु सुविधा हेतु चित्रमें एकही व्यक्तिपर दर्शाए है । 
१. पति-पत्नीद्वारा श्री लक्ष्मीका स्मरण कर भावसहित पूजन करनेसे उनमें भावका वलय निर्मित होता है ।
२. श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमा एवं कुबेरके प्रतीकस्वरूप स्थापित सिक्कोंमें ईश्वरीय तत्त्वका प्रवाह आकृष्ट होता है और उनमें ईश्वरीय तत्त्वका वलय निर्मित होता है ।
३.
३ अ. शक्तिका प्रवाह श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमामें आकृष्ट होता है और उसका वलय निर्मित होता है ।
३ आ. इस वलयद्वारा शक्तिके प्रवाहका वातावरणमें प्रक्षेपण होता है ।
३ इ. शक्तिके ये प्रवाह पूजककी ओर भी प्रक्षेपित होते हैं और पूजकमें उसका वलय निर्मित होता है ।
३ ई. शक्तिके कण पूजकके देहमें और वातावरणमें संचारित होते हैं ।
४.
४ अ. श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमा एवं सिक्कोंमें ईश्वरीय चैतन्यका प्रवाह आकृष्ट होता है और प्रतिमामें उनमें उसका चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
४ आ. इस वलयद्वारा वातावरणमें चैतन्यके प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं ।
४ इ.  चैतन्यका एक प्रवाह पूजककी ओर भी प्रक्षेपित होता है और पूजकमें चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
४ ई. वातावरणमें चैतन्यके कण संचारित होते हैं ।
५. पूजनके स्थानपर आनंदका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
५ अ. इस प्रवाहद्वारा आनंदके वलय निर्मित होता है और आनंदके स्पंदनोंका वातावरणमें संचार होता है ।
यह देखनेसे स्पष्ट होता है कि, दीपावलीके दिन किये गए श्री लक्ष्मीजीके पूजनद्वारा शक्ति और चैतन्यके स्पंदनोंकी निर्मिति अधिक मात्रामें होती है तथा ये स्पंदन वातावरणमें संचारित होते हैं ।  इस दिन ब्रह्मांडकी कक्षामें संपूर्ण `लक्ष्मीपंचायतन’ प्रवेश करता है । `लक्ष्मीपंचायतन’ में कुबेर, गजेंद्र, इंद्र, श्रीविष्णु एवं श्री लक्ष्मी इन देवतातत्त्वोंकी तरंगें समाविष्ट रहती हैं ।

लक्ष्मी पंचायतनमें समाविष्ट देवताओंका कार्य     

१. कुबेर संपत्ति अर्थात प्रत्यक्ष धन देते हैं, तथा उसका संग्रह भी करते हैं ।
२. गजेंद्र संपत्तिका वहन करता है ।
३. इंद्र ऐश्वर्य अर्थात संपत्तिद्वारा प्राप्त समाधान देते हैं । 
४. श्रीविष्णु सुख अर्थात समाधानमें समाहित आनंद प्रदान करते हैं ।
५. श्री लक्ष्मी ऊपर्निर्दिष्ट घटकोंको प्रत्यक्ष बल प्रदान करनेवाली शक्ति है । 
दीपावलीके दिन पूजकके साथही वहां उपस्थित अन्य व्यक्तियोंको भी इन पांचों तत्त्वोंका लाभ प्राप्त होता है । जिससे वास्तुमें सुख, ऐश्वर्य, समाधान एवं संपत्ति वास करती है । इनके साथही श्री लक्ष्मीपूजनके कुछ अन्य लाभ भी हैं ।

श्री लक्ष्मीपूजनके अन्य लाभ ।

१. भक्तिभाव बढना
श्री लक्ष्मीपूजनके दिन ब्रह्मांडमें श्री लक्ष्मीदेवी एवं कुबेर इन देवताओंका तत्त्व अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक मात्रामें प्रक्षेपित होता है । इस दिन इन देवताओंका पूजन करनेसे व्यक्तिका भक्तिभाव बढता है और ३ घंटोंतक बना रहता है ।   
२. सुरक्षाकवचका निर्माण होना
श्री लक्ष्मीतत्त्वकी मारक तरंगोंके स्पर्शसे व्यक्तिके देहके भीतर और उसके चारों ओर विद्यमान रज-तम कणोंका नाश होता है । व्यक्तिके देहके चारों ओर सुरक्षाकवचका निर्र्माण होता है । 
३. अनिष्ट शक्तियोंका नाश होना
श्री लक्ष्मीपूजनके दिन अमावस्याका काल होनेसे श्री लक्ष्मीका मारक तत्त्व कार्यरत रहता है । पूजकके भावके कारण पूजन करते समय श्री लक्ष्मीकी मारक तत्त्व तरंगे कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंके कारण वायुमंडलमें विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंका नाश होता है । इसके अतिरिक्त दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे पूजकको, शक्तिका २ प्रतिशत, चैतन्यका २ प्रतिशत आनंदका एक दशमलव पच्चीस प्रतिशत एवं ईश्वरीय तत्त्वका १ प्रतिशत मात्रामें लाभ मिलता है । इन लाभोंसे श्री लक्ष्मीपूजन करनेका महत्त्व समझमें आता है ।

अलक्ष्मी नि:सारण

अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता, दैन्य और आपदा । नि:सारण करनेका अर्थ है बाहर निकालना । अलक्ष्मी नि:स्सारण हेतु  दीपावली कालमें लक्ष्मीपूजनके दिन नई बुहारी अर्थात झाडू घरमें लाते हैं । इस झाडूसे मध्यरात्रीमे घरका कुडा सूपमे (छाज) भरकर बाहर फेंका जाता है । मध्यान्ह रात को उसे `लक्ष्मी’ मानकर उसका पूजन करते हैं । उसकी सहायतासे घरका कूडा निकालते हैं । कूडा अलक्ष्मीका प्रतीक है । कूडा सूपमें (छाज) भरते हैं और घरके पीछेके द्वारसे उसे बाहर निकालकर दूर फेंकते हैं । कूडा बाहर फेंकनेंके उपरांत घरके कोने-कोनेमें जाकर सूप अर्थात छाज बजाते हैं । अन्य किसी भी दिन मध्यरात्रीमें कुडा नहीं निकालते ।
कूडा बाहर फेंकनेकी सूक्ष्म-स्तरीय प्रक्रिया
मध्यरात्रिमें  रज-तमात्मक तरंगोंकी सर्वाधिक निर्मिति होती है । ये तरंगें घरमें विद्यमान रज-तमात्मक कूडेकी ओर आकृष्ट होती हैं । इस रज-तमात्मक तरंगोंसे भरपूर कूडेको सूपमें (छाज) भरकर वास्तुसे बाहर फेंकनेसे वास्तुकी रज-तमात्मक तरंगें नष्ट होती हैं और वास्तु शुद्ध होती है  ।  इससे सात्त्विक तरंगें वास्तुमें सरलतासे प्रवेश कर पाती हैं । वास्तुमें श्री लक्ष्मीपूजनद्वारा आकृष्ट चैतन्यका लाभ बढता है ।  

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