Malabandhan ke parinam, Kumarika pujan aur Upavas ka Shashtra (Hindi)

Malabandhan ke parinam, Kumarika pujan aur Upavas ka Shashtra (Hindi) | Navratri

मालाबंधनके परिणाम, कुमारिका पुजन एवं उपवास का शास्त्र

नवरात्रिमें अखंड दीपप्रज्वलनके साथ कुलाचारानुसार मालाबंधन करते हैं । कुछ उपासक स्थापित घटपर माला चढाते हैं, तो कुछ देवीकी मूर्तिपर माला चढ़ाते हैं ।

१. नवरात्रिमें मालाबंधनके परिणाम :

नवरात्रिमें मालाबंधनका विशेष महत्त्व है ।

  • देवताको चढाई गई इन मालाओंमें गूंथे फूलोंके रंग एवं सुगंधके कणोंकी ओर वायुमंडलमें विद्यमान तेजतत्त्वात्मक शक्तिकी तरंगें आकृष्ट होती हैं ।
  • ये तरंगें पूजास्थलपर स्थापित की गई देवीकी मूर्तिमें शीघ्र संक्रमित होती हैं ।
  • इन तरंगोंके स्पर्शसे मूर्तिमें देवीतत्त्व अल्पावधिमें जागृत होता है ।
  • कुछ समयके उपरांत इस देवीतत्त्वका वास्तुमें प्रक्षेपण आरंभ होता है । इससे वास्तुशुद्धि होती है ।
  • साथ ही वास्तुमें आनेवाले व्यक्तियोंको उनके भावानुसार इस वातावरणमें विद्यमान देवीके चैतन्यका लाभ मिलता है । सुहागिनों और कुंवारी कन्याओंका पूजन यह देवीपूजनका एक विशेष महत्त्वपूर्ण अंग है । इसीलिए नवरात्रिके नौ दिनोंमें सुहागिनोंका एवं कुंवारी कन्याओंका पूजन करनेका विशेष महत्त्व है ।
  • सर्वप्रथम सुहागिनको आसनपर बिठाकर उसके चरण धोते हैं ।
  • तदुपरांत उसे हलदी कुमकुम लगाते हैं ।
  • यथाशक्ति साडी, चोलीवस्त्र, नारियल आदि देकर आंचल भरते हैं ।
  • उसे फल एवं दक्षिणा अर्पित करते हैं ।
  • देवीका रूप मानकर नमस्कार करते हैं ।
  • कुंवारी कन्याको आसनपर बिठाकर उसके चरण धोते हैं ।
  • उसे हलदी-कुमकुम लगाते हैं ।
  • यथाशक्ति वस्त्रालंकार देते हैं । 
  • दूध, फल एवं दक्षिणा देकर उसे नमस्कार करते हैं ।

२. नवरात्रिमें कुमारिका-पूजनका शास्त्रीय आधार :

कुमारिका, अप्रकट शक्तितत्त्वका प्रतीक है । नवरात्रिमें अन्य दिनोंकी तुलनामें शक्तितत्त्व अधिक मात्रामें कार्यरत रहता है । आदिशक्तिका रूप मानकर भावसहित कुमारिका-पूजन करनेसे कुमारिकामें विद्यमान शक्तितत्त्व जागृत होता है । इससे ब्रह्मांडमें कार्यरत तेजतत्त्वात्मक शक्तिकी तरंगें कुमारिकाकी ओर सहजतासे आकृष्ट होनेमें सहायता मिलती है । पूजकको प्रत्यक्ष चैतन्यके माध्यमसे इन शक्तितत्त्वात्मक तरंगोंका लाभ भी प्राप्त होनेमें सहायता मिलती है । कुमारिकामें संस्कार भी अल्प होते हैं । इस कारण उसके माध्यमसे देवीतत्त्वका अधिकाधिक सगुण लाभ प्राप्त करना संभव होता है । इस प्रकार नवरात्रिके नौ दिन कार्यरत देवीतत्त्वकी तरंगोंका, अपने देहमें संवर्धन करनेके लिए कुमारिका-पूजन कर उसे संतुष्ट किया जाता है ।

३. नवरात्रिकी कालावधिमें उपवास करनेका महत्त्व :

नवरात्रिके नौ दिनोंमें अधिकांश उपासक उपवास करते हैं । किसी कारण नौ दिन उपवास करना संभव न हो, तो प्रथम दिन एवं अष्टमीके दिन उपवास अवश्य करते हैं । उपवास करनेसे व्यक्तिके देहमें रज-तमकी मात्रा घटती है और देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है । ऐसा सात्त्विक देह वातावरणमें कार्यरत शक्तितत्त्वको अधिक मात्रामें ग्रहण करनेके लिए सक्षम बनता है ।

नवरात्रिमें प्रत्येक दिन उपासक भोजनमें विविध व्यंजन बनाकर देवीको नैवेद्य अर्पित करते हैं । बंगाल प्रांतमें प्रसादके रूपमें चावल एवं मूंगकी दालकी खिचडीका विशेष महत्त्व है । मीठे व्यंजन भी बनाए जाते हैं । इनमें विभिन्न प्रकारका शिरा, खीर-पूरी इत्यादिका समावेश होता है । महाराष्ट्रमें चनेकी दाल पकाकर उसे पीसकर उसमें गुड मिलाया जाता है । इसे `पूरण’ कहते हैं। इस पूरणको भरकर मीठी रोटियां विशेष रूपसे बनाई जाती हैं  । चावलके साथ खानेके लिए अरहर अर्थात तुवरकी दाल भी बनाते हैं  ।

नवरात्रिमें देवीको अर्पित नैवेद्यमें पुरणकी मीठी रोटी एवं अरहर अर्थात तुवरकी दालके समावेशका कारण चनेकी दाल एवं गुडका मिश्रण भरकर बनाई गई मीठी रोटी एवं तुवरकी दाल, इन दो व्यंजनोंमें विद्यमान रजोगुणमें ब्रह्मांडमें विद्यमान शक्तिरूपी तेज-तरंगें अल्पावधिमें आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है । इससे ये व्यंजन देवीतत्त्वसे संचारित होते हैं । इस नैवेद्यको प्रसादके रूपमें ग्रहण करनेसे व्यक्तिको शक्तिरूपी तेज-तरंगोंका लाभ मिलता है और उसके स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंकी शुद्धि होती है ।

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