Shiv (Hindi Article)

शिव

Shiv

सारणी –


१. शिवपूजाकी विशेषताएं

हालाहल प्राशन कर विश्वको विनाशसे बचानेवाले, देव व दानव दानोंद्वारा उपास्य, सहज प्रसन्न होनेवाले, भूतोंके स्वामी, नृत्य व नाट्य कलाओंके प्रवर्तक, योगमार्गके प्रणेता इत्यादि विशेषताओंसे युक्त महादेव अर्थात् भगवान शिव जगत्पिताके गौरान्विवित किए जाते हैं । वेद, शास्त्र, पुराण तथा तंत्रग्रंथोंमें शिवजीके गौरवगान, लीला व उपदेशका वर्णन है । फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । इस व्रतके प्रधान देवता हैं, शिव । इस दिन संपूर्ण भारतवर्षमें शिवजीकी उपासना की जाती है । अधिकांश लोगोंको शिवजीसे संबंधित जो थोडी-बहुत जानकारी है, वह बचपनमें पढी या सुनी गई कहानियोंद्वारा होती है । किसी भी देवता व उनके पूजनसे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त होनेपर विश्वास बढता है । शिवभक्तोंके लिए शिवजीसे संबंधित जानकारी यहां दे रहे हैं । यदि देवतासे संबंधित जानकारीके साथ-साथ अध्यात्मशास्त्रकी जानकारी भी हो, तो साधना अधिक योग्य ढंगसे हो सकती है । इसके लिए जिज्ञासु अध्यात्मशास्त्र विषयक ग्रंथों व सत्संगोंका लाभ ले सकते हैं ।

२. महाशिवरात्रि व्रतकी पद्धति व विधि

फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको महाशिवरात्रिका व्रत रखा जाता है । इस तिथिपर एकभुक्त रहें । चतुर्दशीके दिन प्रात:काल व्रतका संकल्प करें । सायंकाल शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । शिवजीका ध्यान करें । तदुपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ (यहां भव यानी शिव) तर्पण करें । नाममंत्र जपते हुए शिवजीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर चढाए गए फूल लेकर अपने मस्तकपर रखें और शिवजीसे क्षमायाचना करें । चतुर्दशीपर रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रत्येक पूजाके मंत्र भिन्न होते हैं; मंत्रों सहित अर्घ्य दें । नृत्य, गीत, कथाश्रवण आदि करते हुए जागरण करें । प्रात:काल स्नान कर, पुन: शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए ब्राह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें ।

३. महाशिवरात्रिपर शिवजीका नामजप करनेका महत्त्व

अनेक संतोंने कहा है, कलियुगमें नामजप ही सर्वोत्तम साधना है । नामजप हम उठते-बैठते, जागते-सोते, आते-जाते भी कर सकते हैं । विश्वमें बढे हुए तमोगुणसे रक्षा होने हेतु तथा शिवरात्रिपर वातावरणमें प्रक्षेपित शिवतत्त्व आकर्षित करनेके लिए महाशिवरात्रिपर शिवजीका `ॐ नम: शिवाय’ यह नामजप अधिकाधिक करें ।

४. शिवपूजाकी विशेषताएं

पूजाके लिए कहां बैठें ?: आम तौरपर शिवमंदिरमें पूजा एवं साधना करनेवाले श्रद्धालुगण शिवजीकी तरंगोंको सीधे अपने शरीरपर नहीं लेते; क्योंकि इससे कष्ट होता है । शिवजीके मंदिरमें अरघाके स्रोतके ठीक सामने न बैठकर, एक ओर बैठते हैं; क्योंकि शिवकी तरंगें सामनेकी ओरसे न निकलकर, अरघाके स्रोतसे बाहर निकलती हैं ।

  • शिवपिंडीको ठंडे जल, दूध अथवा पंचामृतसे स्नान करवाते हैं ।
  • शिवपूजामें हलदी-कुमकुमका प्रयोग नहीं करते; भस्म तथा श्वेत अक्षतका प्रयोग करते हैं ।
  • पिंडीके दर्शनीय भागपर भस्मकी तीन समांतर धारियां बनाते हैं या फिर समांतर धारियां खींचकर उनके मध्य एक वर्तुल बनाते हैं । उसे शिवाक्ष अथवा योगाक्ष भी कहते हैं । शिवाक्षपर चावल, क्वचित गेहूं एवं श्वेत पुष्प चढाते हैं ।
  • शिवपिंडीकी पूर्ण प्रदक्षिणा न कर, अर्धचंद्राकृति प्रदक्षिणा करते हैं । अरघेके स्रोतको लांघते नहीं, क्योंकि वहां शक्तिस्रोत होता है । उसे लांघते समय पैर फैलते हैं, जिससे वीर्यनिर्मिति व पांच अंतस्थ वायुओंपर विपरीत परिणाम होता है ।

रुद्राक्ष: भगवान शिव निरंतर समाधिमें होते हैं, इस कारण उनका कार्य सदैव सूक्ष्मसे ही जारी रहता है । यह कार्य अधिक सुव्यवस्थित हो, इसके लिए भगवान शिवने भी रुद्राक्षकी माला शरीरपर धारण की है । इसी कारण शिव-उपासनामें रुद्राक्षका असाधारण महत्त्व है ।’ किसी भी देवताका जप करने हेतु रुद्राक्षमालाका प्रयोग किया जा सकता है । रुद्राक्षमालाको गलेमें या अन्यत्र धारण कर किया गया जप, बिना रुद्राक्षमाला धारण किए गए जपसे हजार गुना लाभदायक होता है । इसी प्रकार अन्य किसी मालासे जप करनेकी तुलनामें रुद्राक्षकी मालासे जप करनेपर दस हजार गुना अधिक लाभ होता है ।

५. असली रुद्राक्ष कैसे पहचानें ?

  असली रुद्राक्ष नकली रुद्राक्ष
१. आकार मछली समान चपटा गोल
२. रंग (आकाशकी लालिमा समान) पक्‍का पानीमें धुल जाता है
३. पानीमें डालनेपर सीधे नीचे जाता है तैरता है अथवा हिलते-
डुलते नीचे जाता है
४. आर-पार छिद्र होता है सुईसे करना पडता है
५. तांबेके बर्तनमें अथवा पानीमें
     डालनेपर गोल-गोल घूमना
होता है नहीं
६. कुछ समय बाद कीट लगना नहीं लगते लगते हैं
७. मूल्‍य (सन्‌ १९९७ में) रु. ४,००० से
४०,०००
रु. २० से २००
८. कौनसी तरंगें ग्रहण करता है? सम (सत्त्‍व)       –

 

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Shriramraksha stotra ke nitya pathan se kya labh hota hai? (Hindi Article)

श्रीरामरक्षास्तोत्रके नित्‍य पठन से क्‍या लाभ होता है?

Shri Ram

सारणी –


१. श्रीरामनवमी

श्री विष्णुके सातवें अवतार श्रीरामके जन्म प्रीत्यर्थ श्री रामनवमी मनाते हैं । चैत्र शुक्ल नवमीको रामनवमी कहते हैं । इस वर्ष रामनवमी ३ अप्रैलको है । अनेक राममंदिरोंमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर नौ दिनतक यह उत्सव मनाया जाता है । रामायणके पारायण, कथाकीर्तन तथा राममूर्तिको विविध शृंगार कर, यह उत्सव मनाया जाता है । नवमीकी दोपहरको रामजन्मका कीर्तन होता है । मध्यान्हकालमें, कुंची (छोटे बच्चेके सिरपर बांधा जानेवाला एक वस्त्र । यह वस्त्र पीठतक होता है ।) धारण किया हुआ एक नारियल पालनेमें रखकर उस पालनेको हिलाते हैं व भक्तगण उसपर गुलाल तथा फूलोंका वर्षाव करते हैं । कुछ स्थानोंपर पालनेमें नारियलकी अपेक्षा श्रीरामकी मूर्ति रखी जाती है । इस प्रसंगपर श्रीरामजन्मके गीत गाए जाते हैं । उसके उपरांत प्रभु श्रीरामके मूर्तिकी पूजा करते हैं व प्रसादके रूपमें सोंठ देते हैं । कुछ स्थानोंपर महाप्रसाद भी देते हैं । इस दिन प्रभु श्रीरामका व्रत करनेसे सर्व व्रतोंका फल प्राप्त होता है तथा सर्व पापोंका क्षालन होकर अंतमें उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।

२. श्रीरामरक्षास्तोत्रका पाठ

जिस स्तोत्रका पाठ करनेवालोंका श्रीरामद्वारा रक्षण होता है, वह स्तोत्र है श्रीरामरक्षास्तोत्र । भगवान शंकरने बुधकौशिक ऋषिको स्वप्नमें दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षा सुनाई और प्रात:काल उठनेपर उन्होंने वह लिख ली । यह स्तोत्र संस्कृत भाषामें है । इस स्तोत्रके नित्य पाठसे घरकी सर्व पीडा व भूतबाधा भी दूर होती है । जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होगा’, ऐसी फलश्रुति इस स्तोत्रमें बताई गई है ।

इसके अतिरिक्त इस स्तोत्रमें श्रीरामचंद्रका यथार्थ वर्णन, रामायणकी रूपरेखा, रामवंदन, रामभक्त स्तुति, पूर्वजोंको वंदन व उनकी स्तुति, रामनामकी महिमा इत्यादि विषय समाविष्ट हैं ।

३. श्रीरामनवमीका आध्यात्मिक महत्त्व

किसी भी देवता व अवतारों की जयंतीपर उनका तत्त्व पृथ्वीपर अधिक मात्रामें कार्यरत होता है । श्रीरामनवमीको श्रीरामतत्त्व अन्य दिनोंकी अपेक्षा १००० गुना कार्यरत होता है । श्रीराम नवमीपर `श्रीराम जय राम जय जय राम ।’  नामजप व श्रीरामकी भावपूर्ण उपासनासे श्रीरामतत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है ।

४. रामायण

`समस्य अयनं रामायणम् ।’ अयनका अर्थ है जाना, गति, मार्ग इत्यादि । जो परब्रह्म परमात्मारूप श्रीरामकी ओर ले जाती है, उसतक पहुंचनेके लिए जो प्रोत्साहित करती है अर्थात् गति देती है, जीवनका सच्चा मार्ग दर्शाती है, वही `रामायण’ है ।

४.१ कैकेयीने एक वरसे रामके लिए चौदह वर्षका वनवास व दूसरे वरसे भरतके लिए राज्य क्यों मांगा ?

भावार्थ : श्रावणकुमारके दादा धौम्य ऋषि थे व उसके माता-पिता रत्नावली व रत्नऋषि थे । रत्नऋषि नंदिग्रामके राजा अश्वपतिके राजपुरोहित थे । अश्वपति राजाकी कन्याका नाम कैकेयी था । रत्नऋषिने कैकेयीको सभी शास्त्र सिखाए और यह बताया कि यदि दशरथकी संतान हुई, तो वह संतान राजगद्दीपर नहीं बैठ पाएगी अथवा दशरथकी मृत्युके पश्चात् यदि चौदह वर्षके दौरान राजसिंहासनपर कोई संतान बैठ भी गई, तो रघुवंश नष्ट हो जाएगा । ऐसी होनीको टालने हेतु, आगे चलकर वसिष्ठ ऋषिने कैकेयीको दशरथसे दो वर मांगनेके लिए कहा । उनमेंसे एक वरसे उन्होंने रामको चौदह वर्षतक ही वनवास भेजा व दूसरे वरसे भरतको राज्य देनेके लिए कहा । उन्हें ज्ञात था कि रामके रहते भरत राजा बनना स्वीकार नहीं करेंगे यानी राजसिंहासनपर नहीं बैठेंगे । वसिष्ठ ऋषिके कहनेपर ही भरतने सिंहासनपर रामकी प्रतिमाकी अपेक्षा उनकी चरणपादुका स्थापित की । यदि प्रतिमा स्थापित की होती, तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध एकत्रित होनेके नियमसे जो परिणाम रामके सिंहासनपर बैठनेसे होता, वही उनकी प्रतिमा स्थापित करनेसे भी होता ।

५. रामराज्य

ऐसा नहीं कि, केवल श्रीराम ही सात्त्विक थे, अपितु प्रजा भी सात्त्विक थी; इसीलिए रामराज्यमें श्रीरामके दरबारमें एक भी शिकायत नहीं आई ।

पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, मन, चित्त, बुद्धि व अहंकारपर रामका (आत्मारामका) राज्य होना ही खरा रामराज्य है ।

६. प्रभु श्रीरामकी उपासनाके कुछ महत्त्‍वपूर्ण चरण

उपासनाकी कृति कृति कैसे करें?
१. श्रीरामपूजनसे पूर्व उपासक स्‍वयंको
    कौनसा तिलक कैसे लगाए?
विष्‍णु समान खडी दो रेखाओंका अथवा भरा
हुआ खडा तिलक मध्‍यमासे लगाए ।
२. श्रीरामको चंदन किस उंगलीसे लगाए? अनामिकासे
३. फूल चढाना  
    अ. फूल कौनसे चढाएं? जाही
    आ. संख्‍या कितनी हो? चार अथवा चार गुना
    इ. फूल चढानेकी पद्घति क्‍या हो? फूलोंका डंठल देवताकी ओर कर चढाएं ।
    ई. फूल कौनसे आकारमें चढाएं ? लंबगोलाकार (भरा हुआ अथवा खोखला)
४. उदबत्तीसे आरती उतारना  
    अ. तारक उपासनाके लिए
         किस गंधकी उदबत्ती?
चंदन, केवडा, चंपा, चमेली,
जाही व अंबर
    आ. मारक उपासनाके लिए
         किस गंधकी उदबत्ती?
हीना व दरबार
    इ. संख्‍या कितनी हो? दो
    ई. उतारनेकी पद्धति
         क्‍या हो?
दाहिने हाथकी तर्जनी व अंगूठेमें पकडकर
घडीकी सुईयोंकी दिशामें पूर्ण गोलाकार
पद्घतिसे तीन बार घुमाकर उतारें ।
५. इत्र किस गंधका अर्पण करें? जाही
६. श्रीरामकी कितनी परिक्रमा करें? कमसे कम तीन अथवा तीन गुना

 

Hanuman ko tel, sindur, ruike patte arpan kyon kiya jata hai? (Hindi Article)

हनुमानको तेल, सिंदूर, रुईके पत्ते इत्यादि अर्पण क्‍यों किया जाता है?

सारणी –


१. हनुमान जयंती

जब भी दास्यभक्तिका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देना हो, तो आज भी हनुमानकी रामभक्तिका स्मरण होता है । वे अपने प्रभुपर प्राण अर्पण करनेके लिए सदैव तैयार रहते । प्रभु रामकी सेवाकी तुलनामें शिवत्व व ब्रह्मत्वकी इच्छा भी उन्हें कौडीके मोलकी लगतीं । हनुमान सेवक व सैनिकका एक सुंदर सम्मिश्रण हैं ! हनुमान अर्थात शक्ति व भक्तिका संगम । अंजनीको भी दशरथकी रानियोंके समान तपश्चर्याद्वारा पायस (चावलकी खीर, जो यज्ञ-प्रसादके तौरपर बांटी जाती है) प्राप्त हुई थी व उसे खानेके उपरांत ही हनुमानका जन्म हुआ था । उस दिन चैत्रपूर्णिमा थी, जो `हनुमान जयंती’ के तौरपर मनाई जाती है ।

२. भक्तोंकी मन्नत पूर्ण करनेवाले

हनुमानको मन्नत पूर्ण करनेवाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत या मन्नत माननेवाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमानकी मूर्तिकी श्रद्धापूर्वक निर्धारित प्रदक्षिणा करते हैं । कई लोगोंको आश्चर्य होता है कि, जब किसी कन्याका विवाह न तय हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानकी उपासना करनेको कहा जाता है । मानसशास्त्रके आधारपर कुछ लोगोंकी यह गलतधारणा होती है कि सुंदर, बलवान पुरुषके साथ विवाह हो, इस कामनासे कन्याएं हनुमानकी उपासना करती हैं । वास्तविक कारण आगे दिए अनुसार है ।

३. अनिष्ट शक्तियोंका नियंत्रण करनेवाले हनुमान

हनुमान भूतोंके स्वामी माने जाते हैं । इसलिए यदि किसीको भूतबाधा हो, तो उस व्यक्तिको हनुमानमंदिर ले जाते हैं या हनुमानस्तोत्र बोलनेके लिए कहते हैं । जागृत कुंडलिनीके मार्गमें यदि कोई बाधा आ जाए, तो उसे दूर कर कुंडलिनीको योग्य दिशा देना । लगभग ३० %  व्यक्तियोंका विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियोंके प्रभावके कारण नहीं हो पाता । हनुमानकी उपासना करनेसे ये कष्ट दूर हो जाते हैं व विवाह संभव हो जाता है । (१० % व्यक्तियोंके विवाह, भावी वधू या वरके एक-दूसरेसे अवास्तविक अपेक्षाओंके कारण नहीं हो पाते । अपेक्षाओंको कम करनेपर विवाह संभव हो जाता है । ५० %  व्यक्तियोंका विवाह प्रारब्धके कारण नहीं हो पाता । यदि प्रारब्ध मंद या मध्यम हो, तो कुलदेवताकी उपासनाद्वारा प्रारब्धजनक अडचनें नष्ट हो जाती हैं व विवाह संभव हो जाता है । यदि प्रारब्ध तीव्र हो, तो केवल किसी संतकी कृपासे ही विवाह हो सकता है । शेष १० % व्यक्तियोंका विवाह अन्य आध्यात्मिक कारणोंसे नहीं हो पाता । ऐसी परिस्थितिमें कारणानुसार उपाय करने पडते हैं ।)

४. मानसशास्त्रमें निपुण व राजनीतिमें कुशल हनुमान

अनेक प्रसंगोंमें सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, बल्कि राम भी हनुमानकी सलाह लेते थे । जब विभीषण रावणको छोडकर रामकी शरण आया, तो अन्य सेनानियोंका मत था कि उसे अपने पक्षमें नहीं लिया जाए; परंतु हनुमानकी बात मानकर रामने उसे अपने पक्षमें ले लिया । लंकामें प्रथम ही भेंटमें सीताके मनमें अपने प्रति विश्वास निर्माण करना, शत्रुपक्षके पराभवके लिए लंकादहन करना, रामके आगमनसंबंधी भरतकी भावनाएं जानने हेतु रामद्वारा उन्हींको भेजा जाना, इन सभी प्रसंगोंसे हनुमानकी बुद्धिमत्ता व मानसशास्त्रमें निपुणता स्पष्ट होती है । लंकादहन कर उन्होंने रावणकी प्रजाका, रावणके सामर्थ्यपरसे विश्वास उठा दिया ।

५. जितेंद्रिय हनुमान

सीताको ढूढने जब हनुमान रावणके अंत:पुरमें गए, तो उस समय उनकी जो मन:स्थिति थी, वह उनके उच्च चरित्रका सूचक है । इस संदर्भमें वे स्वयं कहते हैं – `सर्व रावणपत्नियोंको नि:शंक लेटे हुए मैंने देखा तो सही, परंतु देखनेसे मेरे मनमें विकार उत्पन्न नहीं हुआ ।’  अनेक संतोंने ऐसे जितेंद्रिय हनुमानकी पूजा निश्चित कर, उनका आदर्श समाजके समाने रखा ।

६. प्रचलित पूजा

चैत्रपूर्णिमाके दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है । प्राय: शनिवार व मंगलवार हनुमानके दिन माने जाते हैं । इस दिन हनुमानको सिंदूर व तेल अर्पण करनेकी प्रथा है । कुछ जगह तो नारियल चढानेकी भी रूढि है । आध्यात्मिक उन्नतिके लिए वाममुखी (जिसका मुख बाईं ओर हो) हनुमान या दासहनुमानकी मूर्तिको पूजामें रखते हैं ।

दासहनुमान व वीरहनुमान: ये हनुमानके दो रूप हैं । दासहनुमान रामके आगे हाथ जोडे खडे रहते हैं । उनकी पूंछ जमीनपर रहती है । वीरहनुमान योद्धा मुद्रामें होते हैं । उनकी पूंछ उत्थित रहती है व दाहिना हाथ माथेकी ओर मुडा रहता है । कभी-कभी उनके पैरों तले राक्षसकी मूर्ति भी होती है । भूतावेश, जादू-टोना इत्यादि द्वारा कष्ट दूर करनेके लिए वीरहनुमानकी उपासना करते हैं ।

दक्षिणमुखी हनुमान: इस मूर्तिका मुख दक्षिणकी ओर होता है इसलिए इसे दक्षिणमुखी हनुमान कहते हैं । जादू-टोना, मंत्र-तंत्र इत्यादि प्रयोग प्रमुखत: ऐसी मूर्तिके सम्मुख ही किए जाते हैं । ऐसी मूर्तियां महाराष्ट्रमें मुंबई, पुणे, औरंगाबाद इत्यादि क्षेत्रोंमें व कर्नाटकमें बसवगुडी क्षेत्रमें पाई जाती हैं ।

७. हनुमानको तेल, सिंदूर, रुईके पत्ते इत्यादि अर्पण करनेका कारण

पूजाके दौरान देवताओंको जो वस्तु अर्पित की जाती है, वह वस्तु उन देवताओंको प्रिय है, ऐसा बालबोध भाषामें बताया जाता है, उदा. गणपतिको लाल फूल, शिवको बेल व विष्णुको तुलसी इत्यादि । उसके पश्चात् उस वस्तुके प्रिय होनेके संदर्भमें कथा सुनाई जाती है । प्रत्यक्षमें शिव, विष्णु, गणपति जैसे उच्च देवताओंकी कोई पसंद-नापसंद नहीं होती । देवताको विशेष वस्तु अर्पित करनेका तात्पर्य आगे दिए अनुसार है ।

पूजाका एक उद्देश्य यह है कि, पूजी जानेवाली मूर्तिमें चैतन्य निर्माण हो व उसका उपयोग हमारी आध्यात्मिक उन्नतिके लिए हो । यह चैतन्य निर्माण करने हेतु देवताको जो विशेष वस्तु अर्पित की जाती है, उस वस्तुमें देवताओंके महालोकतक फैले हुए पवित्रक (उस देवताके सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण) आकर्षित करनेकी क्षमता अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा अधिक होती है । तेल, सिंदूर, रुईके पत्तोंमें हनुमानके पवित्रक आकर्षित करनेकी क्षमता सर्वाधिक है; इसी करण हनुमानको यह सामग्री अर्पित करते हैं ।

८. शनिकी साढेसाती व हनुमानकी पूजा

यदि शनिकी साढेसाती हो, तो उस प्रभावको कम करने हेतु हनुमानकी पूजा करते हैं । यह विधि इस प्रकार है – एक कटोरीमें तेल लें व उसमें काली उडदके चौदह दाने डालकर, उस तेलमें अपना चेहरा देखें । उसके उपरांत यह तेल हनुमानको चढाएं । जो व्यक्ति बीमारीके कारण हनुमान मंदिर नहीं जा सकता, वह भी इस पद्धतिनुसार हनुमानकी पूजा कर सकता है ।  खरा तेली शनिवारके दिन तेल नहीं बेचता, क्योंकि जिस शक्तिके कष्टसे छुटकारा पानेके लिए कोई मनुष्य हनुमानपर तेल चढाता है, संभवत: वह शक्ति तेलीको भी कष्ट दे सकती है । इसलिए हनुमान मंदिरके बाहर बैठे तेल बेचनेवालोंसे तेल न खरीदकर घरसे ही तेल ले जाकर चढाएं ।