Bali Pratipada aur Bhaiduj (Hindi)

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा एवं कार्तिक शुक्ल द्वितीया इन दो दिनोंमें करने योग्य धार्मिक कृतियां और उनका शास्त्रीय आधार ।

सारणी –

१. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाका ऐतिहासिक महत्त्व
२. बलिप्रतिपदा
३. गोवर्धनपूजन
४. अन्नकूट
५. मार्गपाली बंधन एवं नगरप्रवेश विधि
६. यमद्वितीया अर्थात भैय्यादूज
    ६.१ कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको `यमद्वितीया’ और `भैय्यादूज’ कहनेके कारण
    ६.२ यमद्वितीयाकी तिथिपर करने योग्य धार्मिक विधियां
    ६.३ भाईदूज मनानेसे भाई और बहनको प्राप्त लाभ
    ६.४ भाईदूजके उपलक्ष्यमें आश्रमके संत प.पू. महाराजकीका संदेश
    ६.५ भाईदूजके दिन एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाका ऐतिहासिक महत्त्व

यह विक्रम संवत कालगणनाका आरंभ दिन है । ईसा पूर्व पहली शताब्दीमें शकोंने भारतपर आक्रमण किया । वर्तमान उज्जयिनी नगरीके राजा विक्रमादित्यने, मालवाके युवकोंको युद्धनिपुण बनाया । शकोंपर आक्रमण कर उन्हें देशसे निकाल भगाया एवं धर्माधिष्ठित साम्राज्य स्थापित किया । इस विजयके प्रतीकस्वरूप सम्राट विक्रमादित्यने विक्रम संवत् नामक कालगणना, आरंभ की । ईसा पूर्व सन् सत्तावनसे यह कालगणना प्रचलित है । इससे स्पष्ट होता है कि, कालगणनाकी संकल्पना भारतीय संस्कृतिमें कितनी पुरानी है । ईसा पूर्र्व कालमें संस्कृतिके वैभवकी, सर्वांगीण सभ्यताकी और एकछत्र राज्यव्यवस्थाकी यह एक निशानी है ।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा वर्षके साढेतीन प्रमुख शुभ मुहूर्तोंमेंसे आधा मुहूर्त है । इसलिए भी इस दिनका विशेष महत्त्व है । कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके दिन कुछ विशेष उद्देश्योंसे विविध धार्मिक विधियां करते हैं । प्रत्येक विधि करनेका समय भिन्न होता है ।

इनमेंसे महत्त्वपूर्ण विधियां हैं

बलिप्रतिपदा

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, बलिप्रतिपदा के रूपमें मनाई जाती है । इस दिन भगवान श्री विष्णुने दैत्यराज बलिको पातालमें भेजकर बलिकी अतिदानशीलताके कारण होनेवाली सृष्टिकी हानि रोकी । बलिराजाकी अतिउदारताके परिणामस्वरूप अपात्र लोगोंके हाथोंमे संपत्ति जानेसे सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । तब वामन अवतार लेकर भगवान श्रीविष्णुने बलिराजासे त्रिपाद भूमिका दान मांगा । उपरांत वामनदेवने विराट रूप धारण कर दो पगमेंही संपूर्ण पृथ्वी और अंतरिक्ष व्याप लिया । तब तीसरा पग रखनेके लिए बलिराजाने उन्हें अपना सिर दिया ।

वामनदेवने बलिको पातालमें भेजते समय वर मांगनेके लिए कहा । उस समय बलिने वर्षमें तीन दिन पृथ्वीपर बलिराज्य होनेका वर मांगा । वे तीन दिन हैं – नरक चतुर्दशी, दीपावलीकी अमावस्या और बलिप्रतिपदा । तबसे इन तीन दिनोंको `बलिराज्य’ कहते हैं । धर्मशास्त्र कहता है कि बलिराज्यमें `शास्त्रद्वारा बताए निषिद्ध कर्म छोड़कर, लोगोंको अपने मनानुसार आचरण करना चाहिए । शास्त्रकी दृष्टिसे अभक्ष्यभक्षण अर्थात मांसाहार सेवन, अपेयपान अर्थात निषिद्ध पेयका सेवन एवं अगम्यागमन अर्थात गमन न करने योग्य स्त्रीके साथ सहवास; ये निषिद्ध कर्म हैं । इसका योग्य भावार्थ समझकर हमें बलिप्रतिपदा मनानी चाहिए । इसीलिए पूर्वकालमें इन दिनों लोग मदिरा नहीं पीते थे ! शास्त्रोंसे स्वीकृति प्राप्त होनेके कारण परंपरानुसार लोग मनोरंजनमें समय बिताते  हैं । परंतु आज इसका अतिरेक होता हुआ दिखायी देता है । लोग इन दिनोंको स्वैराचार अर्थात स्वेच्छाचार  के दिन मानकर मनमानी करते हैं । बडी मात्रामें पटाखे जलाकर राष्ट्रकी संपत्तिकी हानि करते हैं । कुछ लोग जुआ खेलकर पैसा उडाते हैं । खान-पान, रात्रि देर तक जागने व चलचित्र, नाटक देखनेमें अधिकांश समय व्यतीत करते हैं ।

बलिप्रतिपदा मनानेकी पद्धति
बलिप्रतिपदाके दिन प्रात: अभ्यंगस्नानके उपरांत सुहागिनें अपने पतिका औक्षण करती हैं । दोपहरको भोजनमें विविध पकवान बनाए जाते हैं । इस दिन लोग नए वस्त्र धारण करते हैं एवं संपूर्ण दिन आनंदमें बिताते हैं । कुछ लोग इस दिन बलिराजाकी पत्नी विंध्यावलि सहित प्रतिमा बनाकर उनका पूजन करते हैं । इसके लिए गद्दीपर चावलसे बलिकी प्रतिमा बनाते हैं । इस पूजाका उद्देश्य है कि, बलिराजा वर्षभर अपनी शक्तिसे पृथ्वीके जीवोंको कष्ट न पहुंचाएं तथा अन्य अनिष्ट शक्तियोंको शांत रखें । इस दिन रात्रिमें खेल, गायन इत्यादि कार्यक्रम कर जागरण करते हैं ।

गोवर्धनपूजन

भगवान श्रीकृष्णद्वारा इस दिन इंद्रपूजनके स्थानपर गोवर्धनपूजन आरंभ किए जानेके स्मरणमें गोवर्धन पूजन करते हैं । इसके लिए कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी तिथिपर प्रात:काल घरके मुख्य द्वारके सामने गौके गोबरका गोवर्धन पर्वत बनाते हैं । शास्त्रमें बताया है कि, इस गोवर्धन पर्वतका शिखर बनाएं । वृक्ष-शाखादि और फूलोंसे उसे सुशोभित करें । परंतु अनेक स्थानोंपर इसे मनुष्यके रूपमें बनाते हैं और फूल इत्यादिसे सजाते  हैं ।  चंदन, फूल इत्यादिसे  उसका पूजन करते हैं और प्रार्थना करते हैं,

गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक ।
विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव ।। – धर्मसिंधु

इसका अर्थ है, पृथ्वीको धारण करनेवाले गोवर्धन ! आप गोकुलके रक्षक हैं । भगवान श्रीकृष्णने आपको भुजाओंमें उठाया था । आप मुझे करोडों गौएं प्रदान करें । गोवर्धन पूजनके उपरांत गौओं एवं बैलोंको वस्त्राभूषणों तथा मालाओंसे सजाते हैं । गौओंका पूजन करते हैं । गौमाता साक्षात धरतीमाताकी प्रतीकस्वरूपा हैं । उनमें सर्व देवतातत्त्व समाए रहते हैं । उनके द्वारा पंचरस प्राप्त होते हैं, जो जीवोंको पुष्ट और सात्त्विक बनाते हैं । ऐसी गौमाताको साक्षात श्री लक्ष्मी मानते हैं । उनका पूजन करनेके उपरांत अपने पापनाशके लिए उनसे प्रार्थना करते हैं । धर्मसिंधुमें इस श्लोकद्वारा गौमातासे  प्रार्थना की है,

लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता ।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु ।। – धर्मसिंधु

इसका अर्थ है, धेनुरूपमें विद्यमान जो लोकपालोंकी साक्षात लक्ष्मी हैं तथा जो यज्ञके लिए घी देती हैं, वह गौमाता मेरे पापोंका नाश करें । पूजनके उपरांत गौओंको विशेष भोजन खिलाते हैं । कुछ स्थानोंपर गोवर्धनके साथही भगवान श्रीकृष्ण, गोपाल, इंद्र तथा सवत्स गौओंके चित्र सजाकर उनका पूजन करते हैं और उनकी शोभायात्रा भी निकालते हैं ।

अन्नकूट

`कूट’ का अर्थ है, पहाड अथवा पर्वत । अन्नकूट उत्सवके रूपमें मनाते हैं । इस उत्सवमें भगवान श्रीविष्णुको समर्पित करनेके लिए पकवानोंके पर्वत  जैसे ढेर बनाते हैं । इसीलिए इस उत्सवको `अन्नकूट’ के नामसे जानते हैं । भागवतमें इसका वर्णन आता है । उसके अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी तिथिपर देवताके नैवेद्यमें नियमित पदार्थोंके अतिरिक्त यथाशक्ति अनेक प्रकारके व्यंजन बनाकर अर्पित करने चाहिए । इनमें दाल, भात अर्थात पके हुए चावल, कढी, साग इत्यादि `कच्चे’ व्यंजन; हलवा, पूरी, खीर इत्यादि `पके’ व्यंजन; लड्डू, पेडे, बर्फी, जलेबी इत्यादि `मीठे’ व्यंजन; केले, अनार, सीताफल इत्यादि `फल’; बैंगन, मूली, साग-पात, रायता, भूजिया  इत्यादि `सलूने’ अर्थात नमकीन, रसीले और चटनी, मुरब्बे, अचार इत्यादि `खट्टे-मीठे-चटपटे’ व्यंजनोंका समावेश होना चाहिए । तथा इनका यथाशक्ति दान भी करना चाहिए ।

प्राचीन कालमें काजवासी इंद्रपूजनमें छप्पन भोग, छत्तीसों व्यंजन बनाकर इंद्रको  निवेदित करते थे । श्रीकृष्णके बतानेपर बृजवासियोंने इंद्रपूजनके स्थानपर गोवर्धनका पूजन करना आरंभ किया । तबसे अन्नकूट गोवर्धन पूजनका ही एक भाग है । इसीके स्मरणमें गोवर्धन पूजनके उपरांत अन्नकूट उत्सव मनाते हैं । इससे भगवान श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं । बृजके साथ मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, काशी, नाथद्वारा इत्यादि स्थानोंके मंदिरों यह उत्सव बडे ही
हर्षोल्लासके साथ मनाया जाता है ।

मार्गपाली बंधन एवं नगरप्रवेश विधि

`मार्गपाली’ अर्थात मार्गपर लगा हुआ बंदनवार । मार्गपाली बंधन गांवके समस्त जीवोंके आरोग्य हेतु आवश्यक विधि है । धर्मसिंधु एवं आदित्यपुराणमें मार्गपाली के विषयमें वर्णन आता है । उसमें बताया है कि, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाके सायंकालमें कुश अथवा कांसका लंबा और पक्का रस्सा बनाकर उसमें अशोक के पत्ते गूंथकर बंदनवार बनवाएं और गांवके प्रवेश-स्थानपर उसे ऊंचे स्तंभोंपर बांध दें । गंध, फूल इत्यादि चढाकर उसका पूजन करें ।
मार्गपालि नमस्तेज्ञ्स्तु सर्वलोकसुखप्रदे ।
विधेयै: पुत्रदाराद्यै: पुनरेहि कातस्य मे ।। – धर्मसिंधु, आदित्यपुराण
 
अर्थात हे सर्व प्राणिमात्रको सुख देनेवाली मार्गपाली, आपको मेरा नमस्कार है  । पुत्र, पत्नी इत्यादि द्वारा आपको पिरोया है । मेरे कातके लिए पुन: एकबार आपका आगमन हो । इस प्रकार मार्गपालीसे प्रार्थना करें । पूजनके उपरांत सर्वप्रथम उस स्थानका प्रधान पुरुष और उसके पीछे वहांके नर-नारी जयघोष करते हुए तथा हर्षोल्लासके साथ उसके नीचेसे गांवमें प्रवेश करें । तदुपरांत प्रधान पुरुष सौभाग्यवती स्त्रियोंद्वारा नीराजन अर्थात औक्षण अर्थात आरती करायें । मार्गपालीके नीचे होकर निकलनेसे, आनेवाले वर्षमें सर्व प्रकारकी सुख-शान्ति रहती है, रोग दूर होते हैं और गांवकी समस्त जनताके साथ पशु भी निरोगी एवं प्रसन्न रहते हैं।

यमद्वितीया अर्थात भैय्यादूज

असामायिक अर्थात अकालमृत्यु न आए, इसलिए यमदेवताका पूजन करनेके तीन दिनोंमेंसे कार्तिक शुक्ल द्वितीया एक है । यह दीपोत्सव पर्वका समापन दिन है । `यमद्वितीया’ एवं `भैय्यादूज’ के नामसे भी यह पर्व परिचित है ।

कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको `यमद्वितीया’ और `भैय्यादूज’ कहनेके कारण
कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर वायुमंडलमें यमतरंगोंके संचारके कारण वातावरण तप्त ऊर्जासे प्रभारित रहता है । ये तरंगें नीचेकी दिशामें प्रवाहित होती हैं । इन तरंगोंके कारण विविध कष्ट हो सकते हैं, जैसे अपमृत्यु होना, दुर्घटना होना, स्मृतिभ्रंश होनेसे अचानक पागलपनका दौरा पडना, मिरगी समान दौरे पडना अर्थात फिट्स आना अथवा हाथमें लिये हुए कार्यमें अनेक बाधाएं आना । भूलोकमें संचार करनेवाली यमतरंगोंको प्रतिबंधित करनेके लिए यमादि देवताओंका पूजन करते हैं ।
पृथ्वी यमकी बहनका रूप है । इस दिन यमतरंगें पृथ्वीकी कक्षामें आती हैं । इसलिए पृथ्वीकी कक्षामें यमतरंगोंके प्रवेशके संबंधमें कहते हैं कि, कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर यम अपने घरसे बहनके घर अर्थात पृथ्वीरूपी भूलोकमें प्रवेश करते हैं । इसलिए इस दिनको यम- द्वितीयाके नामसे जानते हैं । यमदेवताके अपनी बहनके घर जानेके प्रतीकस्वरूप प्रत्येक घरका पुरुष अपनेही घरपर पत्नी द्वारा बनाए गए  भोजनका न सेवन कर बहनके घर जाकर भोजन करता है  । बहनद्वारा यमदेवताका सम्मान करनेके प्रतीक स्वरूप यह दिन `भैय्यादूज’के नामसे भी प्रचलित है ।
यमद्वितीयाकी तिथिपर करने योग्य धार्मिक विधियां

१. भाई-बहनद्वारा यमादि देवताओंका पूजन
२. बहनद्वारा भाईका औक्षण अर्थात आरती एवं सम्मान करना
३. भाईका बहनको उपहार दिया जाना

शास्त्रकी जानकारी हो, तो कोई भी धार्मिक कृति मन:पूर्वक एवं श्रद्धापूर्वक की जाती है । परिणामत: उससे लाभ भी अधिक प्राप्त होता है ।

१. भाई-बहन द्वारा यमादि देवताओंका पूजन करनेका शास्त्रीय कारण

दीपावलीकी कालावधिमें अकालमृत्युसे रक्षा हेतु यमदेवताके उद्देश्यसे तीन दिनोंपर धार्मिक विधि करनेका विधान है । इन तीन दिनोंमेंसे यह एक दिन है । इन दिनोंमें भूलोकमें यम तरंगें अधिक मात्रामें आती हैं । इन दिनों  यमादि देवताओंके निमित्त किया गया कोई भी कर्म अल्प समयमें फलित  होता है । इसलिए कार्तिक शुक्ल द्वितीयाकी तिथिपर यमदेवका पूजन करते हैं । चौकीपर रखे चावलके तीन पुंजोंपर तीन सुपारियां रखते हैं । चौपाए पर चावलके तीन छोटे छोटे पूंजोंपर तीन सुपारियां रखी जाती हैं ।

यमादि देवताओंका पूजन करनेके लिए, भाई प्रथम आचमन, देशकालकथन और संकल्प करता है । यमादि देवताओंका पूजन करनेके लिए, अपनी दाइं ओरसे पहली सुपारीपर यमदेवताका, दुसरी सुपारीपर चित्रगुप्त देवताका एवं तिसरी सुपारीपर यमदूतका अक्षत समर्पित कर आवाहन किया जाता है ।  आसन, पाद्य, अर्घ्य इत्यादि उपचार अर्पित किए जाते हैं । कर्पास वस्त्र एवं यज्ञोपवित अर्पित किए जाते हैं । चंदन, हलदी, कुमकुम, अक्षत एवं पुष्प इत्यादि उपचार अर्पित कर पूजन किया जाता है ।

उपरांत धूप, दीप दिखाकर नैवेद्य समर्पित किया जाता है । भाईके उपरांत बहन आचमन कर इन देवताओंका पूजन करती है । असामयिक मृत्युसे भाईकी रक्षाके लिए देवताओंसे प्रार्थना करती है ।
२. भाईदूजके दिन बहनद्वारा भाईका औक्षण अर्थात आरती करना

इस दिन बहनें भाईके रूपमें यमदेवका औक्षण कर उनका आवाहन करती हैं । उनका यथोचित आदरसहित सम्मान करती हैं और भूलोकमें संचार करनेवाली यमतरंगोंपर तथा पितृलोककी अतृप्त आत्माओंको प्रतिबंधित करनेके लिए उनसे प्रार्थना करती हैं ।
बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेकी पद्धति

भोजनसे पहले बहन भाईका औक्षण करती है । इसमें वह प्रथम भाईको कुमकुम तिलक एवं अक्षत लगाती है । तीन बार आरती उतारती है । उपहार देकर भाईका सम्मान करती है ।

अब देखते हैं, बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेके सूक्ष्म-स्तरीय परिणाम –

१. औक्षण करते समय बहनमें भावका वलय निर्मित होता है ।
२. ब्रह्मांडसे चैतन्यका प्रवाह औक्षण करनेवाली बहनकी ओर आकृष्ट होता है ।
२ अ. बहनमें इस चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
२ आ. बहनके हाथोंसे चैतन्य तरंगें ताम्रपात्रकी ओर प्रवाहित होकर, उसमें फैलती हैं ।
२ इ. ईश्वरीय चैतन्यका प्रवाह भाईकी ओर आकृष्ट होता है ।
२ ई. और उसमे चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
३. औक्षण करनेके लिए उपयोगमें लाए गए तेलके दीपमें शक्तिका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
३ अ. औक्षण करते समय अर्धवर्तुलाकारमें दीप घुमानेसे दीपके चारों ओर शक्तिका कार्यरत वलय निर्मित होता है ।
३ आ. इस वलयद्वारा शक्तिकी कार्यरत तरंगें भाईकी ओर प्रक्षेपित होती हैं ।
३ इ. भाईकी सूर्यनाडी कार्यरत होती है ।
३ ई. भाईको कार्य करनेके लिए ऊर्जाशक्ति प्राप्त होती है और उसमें शक्तिका वलय निर्मित होता है ।
३ उ. भाईकी देहमें शक्तिके कणोंका संचार होता है  ।
३ ऊ. और उसके देहके चारों ओर सुरक्षाकवच निर्मित होता है ।
३ ए. बहनद्वारा भाईका औक्षण करनेके कारण वातावरण भी शक्तिके कणोंसे संचारित होता है ।
४. औक्षण करनेके कारण पाताल एवं वायुमंडलसे आक्रमण करनेवाली अनिष्ट शक्तियोंसे भाईका रक्षण होता है ।
५. भाईमें भाव जागृत होता है ।

इससे स्पष्ट होता है कि, भाईदूजके दिन बहनद्वारा भाईका औक्षण किए जानेके कारण बहन तथा भाई दोनोंको लाभ प्राप्त होता है । इसप्रकार यमादि देवताओंका पूजन करनेके उपरांत बहनद्वारा भावसहित भाईका औक्षण करनेसे,
१. परिजनोंको यम तरंगोंके कारण होनेवाले कष्ट घटते हैं ।
२. यमतरंगोंसे परिजनोंकी रक्षा होती है ।
३. वास्तुका वायुमंडल शुद्ध बनता है ।
४. पृथ्वीका वातावरण सीमित समयके लिए यातना रहित अर्थात आनंददायीी रहता है ।
औक्षणके उपरांत भाई बहनके हाथसे बना भोजन ग्रहण करता है । ऐसे बताया है, कि सगी बहन न हो, तो भाईदूजके दिन चचेरी, ममेरी किसी भी बहनके घर जाकर अथवा किसी परिचित स्त्रीको बहन मानकर उसके घर भोजन करना चाहिए ।

३. भाईका बहनको उपहार देना
भोजनके उपरांत भाई यथाशक्ति वस्त्राभूषण, द्रव्य इत्यादि उपहार देकर बहनका सम्मान करता है । यह उपहार सात्त्विक हो, तो अधिक योग्य है । जैसे साधना संबंधी, धर्मसंबंधी ग्रंथ, देवतापूजन हेतु उपयुक्त वस्त्र इत्यादि  । उपहार तामसिक न हो । उदाहरणार्थ अयोग्य चलचित्रकी ध्वनिचक्रिका इत्यादी ।

कुछ स्थानोंपर स्त्रियां सायंकालमें चंद्रमाका औक्षण कर उसके उपरांतही भाईका औक्षण करती हैं । भाई न हो, तो कुछ स्थानोंपर बहन चंद्रमाको भाई मानकर उनका औक्षण करती है । भाईदूजके दिन स्त्रियोंद्वारा चंद्रमाका औक्षण करनेके परिणाम

स्त्रीद्वारा चंद्रमाका आवाहन किये जानेसे चंद्रतरंगें कार्यरत होती हैं । ये तरंगें वायुमंडलमें प्रवेश करती हैं । इन तरंगोंकी शीतलताके कारण ऊर्जामयी यमतरंगें शांत होती हैं और वातावरणकी दाहकता घटती है । इससे यमदेवका क्षोभ भी मिटता है । इसके उपरांत वातावरण प्रसन्न अर्थात सुखद बनता है । वातावरणकी इस प्रसन्नताके कारण स्त्रियोंके अनाहत चक्रकी जागृति होती है । परिणामस्वरूप यमदेवताके उद्देश्यसे भाईके पूजनकी विधिद्वारा भाव बढनेमें सहायता मिलती है और इष्ट फलप्राप्ति होती है ।
भाईदूज मनानेसे भाई और बहनको प्राप्त लाभ

यमद्वितियाके अर्थात भाईदूजके दिन ब्रह्मांडसे आनंदकी तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । इन तरंगोंका सभी जीवोंको अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक लाभ होता है । इसलिए सर्वत्र आनंदका वातावरण रहता है ।

१. बहनमें जागृत देवीतत्त्वका लाभ भाईको मिलना
इस दिन स्त्रीमें देवीतत्त्व जागृत रहता है । इसका लाभ भाईको उसके भावानुसार मिलता है । भाई साधना करता हो, तो उसे आध्यात्मिक स्तरपर लाभ मिलता है । वह साधना न करता हो, तो उसे व्यावहारिक लाभ मिलता है । भाई कामकाज संभालते हुए साधना करता हो, तो उसे दोनों स्तरपर पचास-पचास प्रतिशत लाभ मिलता है ।
२. बहनद्वारा की गई प्रार्थनाके कारण भाई-बहनका लेन-देन घट जाना
यमद्वितियाकी तिथिपर बहन अपने भाईके कल्याणके लिए प्रार्थना करती है । इसका फल भाईको बहनके भावानुसार प्राप्त होता है । इसलिए बहनका भाईके साथ लेन-देन अंशत: घट जाता है । इसी कारण यह दिन एक अर्थसे लेन-देन घटानेके लिए होता है ।
भाईदूजके कारण बहनको प्राप्त लाभ
१. बहनका प्रारब्ध घट जाना
भाईदूजके दिन भाईमें शिवतत्त्व जागृत होता है । इससे बहनका प्रारब्ध एक सहस्त्रांश प्रतिशत घट जाता है । भाईदूजके दिन शास्त्रमें बताए अनुसार कृति करनेके लाभ हमने समझ लिए । इन सूत्रोंसे हिंदु धर्ममें बताए पर्वो उत्सवोंका महत्त्व समझमें आता है ।

भाईदूजके उपलक्ष्यमें आश्रमके संत प.पू. महाराजकीका संदेश

भाईदूज मनमें बसे द्वेष एवं असूया अर्थात ईर्ष्या, शत्रुता, डाह को नष्ट कर बंधुभाव जागृत करनेका दिन है । अपने मनसे द्वेष एवं असूया मिट जानेसे सर्वत्र बंधुभावका विचार जागृत होता है । इसीलिए इस त्यौहारका प्रयोजन है । द्वितीयाका चंद्र आकर्षकता और वर्धमानता दर्शाता है । इस चंद्रसमान बंधुप्रेमका वर्धन होता रहे, यही इस त्यौहार मनानेकी भूमिका है । जिस समाज एवं राष्ट्रके पुरुष स्त्रियोंको भगिनी मानकर उनकी रक्षाका उत्तरदायित्व निभाएंगे और उन्हें अभय प्रदान करेंगे, जब समाज और राष्ट्रकी सर्व स्त्रियां निर्भय होकर समाजमें आदर और सम्मानके साथ विचरण कर पाएंगी, वही खरी यमद्वितीया होगी ।
प.पू. महाराजजीके इस संदेशके अनुसार आचरण करनेका दृढ संकल्प हमें करना चाहिए ।

भाईदूजके दिन एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

भाईदूजके दिन श्री गणपतिका सर्वप्रथम अपनी आरती उतारनेके लिए कहना और कार्यक्रम समाप्त हो जानेपर उसका कारण बताना

वर्ष २००५ में मैं आश्रममें थी । उस वर्ष दीपावलीके पहले दिनसे ही मुझे भाईदूजकी आस लगी थी । ३ नवंबर २००५ की सुबह दंतमंजन करते समय मुझे बालरूपमें श्री गणपति दिखाई दिए । वे मुझसे बोले, `तुम पहले मेरी आरती उतारोगी न !’ मैंने कहा `जी’ ।मुझे लगा, जैसे मैं सर्व देवताओंकी आरती उतार रही हूं । सुबहसे ही मुझे उत्साह एवं आनंदका अनुभव हो रहा था । नहानेके उपरांत वह और बढ़ गया । आश्रममें देवताओंको भाई मानकर उनका औक्षण कर भाईदूज मनाई जाती है । भाईदूजके कार्यक्रममें सर्व देवताओंके चित्रोंको कुमकुम लगाते समय मुझे उनके प्रति बहुत प्रेम एवं आदर प्रतीत हो रहा था । उसके उपरांत देवताओंकी आरती उतारते समय, स्थूलरूपमें मेरा हाथ चित्रके सामने घूम रहा था; परंतु प्रत्यक्षमें मुझे लग रहा था, जैसे मैं विशाल देवताओंकी आरती उतार रही हूं ।

श्रीरामके चित्रकी आरती उतारते समय, मेरा हाथ हनुमानजीके चित्रकी ओर खींचा जा रहा था । अंतमें सद्गुरु की आरती उतारते समय मुझे एक अनोखी शांतिकी अनुभूति हुई । आरती उतारनेके उपरांत मैंने सूक्ष्मरूपसे प्रत्येक देवताको प्रसाद खिलाया । उस समय सर्व देवता मुस्कराते दिखाई दिए । संपूर्ण कार्यक्रमके समय मुझे एक निराले ही आनंदकी अनुभूति हो रही थी । कार्यक्रमके उपरांत भी बहुत समयतक मुझे ध्यानमंदिरसे निकलनेकी  इच्छा नहीं हो रही थी । सर्व साधकोंमें साधकत्व व भक्तिभाव बढ़ने हेतु मुझसे सतत प्रार्थना हो रही थी । अंतमें श्री गणपतिने मुझसे कहा, `इस कार्यक्रममें किसी भी प्रकारकी अड़चनें न आएं, इसलिए तुम्हें मैंने पहले मेरी आरती उतारनेके लिए कहा । – श्रीमती शुभा.

शास्त्रमें बताए अनुसार आचरण कर आप भी भाईदूजका पुरा लाभ उठाएंगे, इसी आशा के साथ दीपावलीके उपलक्ष्यमें आपको हार्दिक शुभकामनांए ।


 

Advertisements

Lakshmi Pujan aur Alakshami Nisaran (Hindi)

Lakshmi Pujan aur Alakshami Nisaran (Hindi) | Dipawali

सारणी – 

१. श्री लक्ष्मीपूजन एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
   १.१ दीपावलीके कालमें आनेवाली अमावस्याका महत्त्व
   १.२ श्रीलक्ष्मी तथा कुबेर का आवाहन एवं पूजन
   १.३ श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करनेका कारण
   १.४ श्री लक्ष्मीदेवीके नैवेद्यमें समाविष्ट घटक 
   १.५ श्री लक्ष्मीके पूजन हेतु उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीसे प्राप्त लाभ
२. दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली प्रक्रिया
३. लक्ष्मी पंचायतनमें समाविष्ट देवताओंका कार्य
४. श्री लक्ष्मीपूजनके अन्य लाभ ।
५. अलक्ष्मी नि:सारण


श्री लक्ष्मीपूजन एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

विक्रम संवत अनुसार कार्तिक अमावस्याका दिन दीपावलीका एक महत्त्वपूर्ण दिन है ।
दीपावलीके कालमें आनेवाली अमावस्याका महत्त्व
सामान्यत: अमावस्याको अशुभ मानते हैं; परंतु दीपावली कालकी अमावस्या शरदपूर्णिमा अर्थात कोजागिरी पूर्णिमाके समान ही कल्याणकारी एवं समृद्धिदर्शक है ।
 इस दिन करनेयोग्य धार्मिक विधियां हैं..
१. श्री लक्ष्मीपूजन
२. अलक्ष्मी नि:सारण
दीपावलीके इस दिन धन-संपत्तिकी अधिष्ठात्रि देवी श्री महालक्ष्मीका पूजन करनेका विधान है । दीपवालीकी अमावस्याको अर्धरात्रिके समय श्री लक्ष्मी का आगमन सद्गृहस्थोंके घर होता है । घरको पूर्णत: स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित कर दीपावली मनानेसे देवी श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वहां स्थायी रूपसे निवास करती हैं । इसीलिए इस दिन श्री लक्ष्मीजीका पूजन करते हैं और दीप जलाते हैं । यथा संभव श्री लक्ष्मीपूजनकी विधि सपत्निक करते हैं ।

यह अमावस्या प्रदोषकालसे आधी रात्रितक हो, तो श्रेष्ठ होती है । आधी रात्रितक न हो, तो प्रदोषव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए । दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजनके लिए विशेष सिद्धता की जाती है ।

पूजाके आरंभमें आचमन किया जाता है । (मंत्र) उपरांत प्राणायाम ……… एवं देशकालकथन किया जाता है । तदुपरांत लक्ष्मीपूजन एवं उसके अंतर्गत आनेवाले अन्य विधियोंके लिए संकल्प किया जाता है । (मंत्र)

पूजनके आरंभमें, आचमन, प्राणायाम इत्यादि धार्मिक कृतियां करनेसे पूजककी सात्त्विकता बढ़ती है । इससे पूजकको देवतापूजनसे प्राप्त चैतन्यका आध्यात्मिक स्तरपर अधिक लाभ होता है । श्री लक्ष्मीपूजनका प्रथम चरण है, 
श्री महागणपतिपूजन –
संकल्पके उपरांत श्रीमहागणपतिपूजनके लिए ताम्रपात्रमें रखे नारियलमें श्रीमहागणपतिका आवाहन किया जाता है । आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, कर्पासवस्त्र, चंदन, पुष्प एवं दुर्वा, हलदी, कुमकुम, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचार अर्पित कर पूजन किया जाता है ।

श्री गणपति दिशाओंके स्वामी हैं । इसलिए प्रथम श्री महागणपति पूजन करनेसे सर्व दिशाएं खुल जाती हैं । परिणामस्वरूप सर्व देवतातत्त्वोंकी तरंगोंको बिना किसी अवरोध पूजनविधिके स्थानपर आना सुलभ होता है । श्री महागणपति पूजनके उपरांत कलश, शंख, घंटा, दीप इन पूजाके उपकरणोंका पूजन किया जाता है । तत्पश्र्चात जल प्रोक्षण कर पूजासामग्री की शुद्धि की जाती है ।
वरुण तथा अन्य देवताओंका आवाहन और पूजन
चौपाएपर अखंड चावलका पुंज बनाकर उसपर जलसे भरा कलश रखते हैं । कलशमें भरे जलमें चंदन, आम्रपल्लव, सुपारी एवं सिक्के रखे जाते हैं ।   कलशको वस्त्र अर्पित किया जाता है । तदुपरांत कलशपर अखंड चावलसे भरा पूर्णपात्र रखा जाता है । इस पूर्णपात्रमें रखे चावलपर कुमकुमसे अष्टदल कमल बनाया होता है । कलशको अक्षत समर्पित कर उसमें वरुण देवताका आवाहन किया जाता है । चंदन, हलदी, कुमकुम, अक्षत एवं पुष्प अर्पित कर वरुणदेवताका पूजन किया जाता है ।

अष्टदल कमलके कारण उस स्थानपर शक्तिके स्पंदनोंका निर्माण होता है । ये शक्तिके स्पंदन सर्व दिशाओंमें प्रक्षेपित होते हैं । इस प्रकार पूर्णपात्रमें बना अष्टदल कमल यंत्रके समान कार्य करता है । पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर सर्व देवताओंकी स्थापना करते हैं । कलशमें श्री वरुणदेवताका आवाहन कर उनका पूजन करते हैं । तदुपरांत पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर आवाहन किए गए देवता तत्त्वोंका पूजन करते हैं ।
कलशमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका महत्त्व
वरुण जलके देवता हैं । वरुणदेवता आपतत्त्वका नियमन करते हैं और कर्मकांडके विधि करते समय आवश्यकताके अनुसार ईश्वरीय तत्त्व साकार होनेमें सहायता करते हैं । आपतत्त्वके माध्यमसे आवश्यक ईश्वरीय तत्त्व व्यक्तिमें एवं विधिके स्थानपर कार्यरत होता है । यही कारण है कि, हिंदु धर्मने विविध देवताओंके पूजन हेतु की जानेवाली विभिन्न प्रकारकी विधियोंमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका विधान बताया है ।

कलशमें वरुण देवताका आवाहन कर पूजन करनेके उपरांत चावलसे भरे पूर्णपात्र पर अक्षत अर्पित कर सर्व देवताओंका आवाहन किया जाता है। चंदन, पुष्प एवं तुलसीपत्र, हलदी, कुमकुम, धुप, दीप आदि उपचार अर्पित कर सर्व देवताओंका पूजन किया जाता है ।
श्रीलक्ष्मी तथा कुबेर का आवाहन एवं पूजन
सर्व देवताओंके पूजनके उपरांत कलशपर रखे पूर्णपात्रमें श्रीलक्ष्मीकी मूर्ति रखी जाती है । उसके निकट द्रव्यनिधि रखा जाता है । उपरांत अक्षत अर्पित कर ध्यानमंत्र बोलते हुए, मूर्तिमें श्रीलक्ष्मी तथा द्रव्यनिधि पर कुबेर का आवाहन किया जाता है । अक्षत अर्पित देवताओंको आसन दिया जाता है । उपरांत श्री लक्ष्मीकी मूर्ति एवं द्रव्यनिधि स्वरूप कुबेर को अभिषेक करने हेतु ताम्रपात्रमें रखा जाता है । अब श्रीलक्ष्मी एवं कुबेर को आचमनीसे जल छोडकर पाद्य एवं अर्घ्य दिया जाता है ।

तत्पश्र्चात दूध, दही, घी, मधु एवं शर्करासे अर्थात पंचामृत स्नान का उपचार दिया जाता है । गंधोदक एवं उष्णोदक स्नान का उपचार दिया जाता है । चंदन व पुष्प अर्पित किया जाता है । श्री लक्ष्मी व कुबेरको अभिषेक किया जाता है । उपरांत वस्त्र, गंध, पुष्प, हलदी, कुमकुम, कंकणादि सौभाग्यालंकार, पुष्पमाला अर्पित की जाती हैं । श्री लक्ष्मीके प्रत्येक अंगका उच्चारण कर अक्षत अर्पित की जाती है । इसे अंगपूजा कहते हैं ।

श्री लक्ष्मीकी पत्रपूजा की जाती है । इसमें सोलह विभिन्न वृक्षोंके पत्र अर्पित किए जाते हैं । पत्रपूजाके उपरांत धूप, दीप आदि उपचार समर्पित किए जाते हैं ।  श्रीलक्ष्मी व कुबेरको नैवेद्य चढ़ाया जाता है । अंतमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित की जाती है । कुछ स्थानोंपर देवीको धनिया एवं लाई अर्पण करनेकी प्रथा है ।

कुछ स्थानोंपर भित्तिपर विभिन्न रंगोंद्वारा श्रीगणेश-लक्ष्मीजीके चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं । तो कुछ स्थानोंपर श्रीगणेश-लक्ष्मीजीकी मूर्तियां तथा कुछ स्थानोंपर चांदीके सिक्केपर श्री लक्ष्मीजीका चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं ।
श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करनेका कारण
किसी भी देवता पूजनमें देवताका आवाहन करनेसे देवताका निर्गुण तत्त्व कार्यरत होता है और पूजास्थानपर आकृष्ट होता है । देवताकी मूर्ति देवताका सगुण रूप है । इस सगुण रूपको भावसहित और संभव हो, तो मंत्रसहित अभिषेक करनेसे मूर्तिमें देवताका सगुणतत्त्व कार्यरत होता है । इससे मूर्तिमें संबंधित देवताका निर्गुण तत्त्व आकृष्ट होनेमें सहायता होती है । अभिषेकद्वारा जागृत मूर्तिको उसके स्थानपर रखनेसे उस स्थानका स्पर्श मूर्तिको होता रहता है । इससे आवाहन किए गए देवतातत्त्व मूर्तिमें निरंतर संचारित होते रहते हैं । इस प्रकार देवतातत्त्वसे संचारित मूर्तिद्वारा देवतातत्त्वकी तरंगें प्रक्षेपित होने लगती हैं । जिनका लाभ पूजकके साथही वहां उपस्थित अन्य व्यक्तियोंको भी मिलता है । साथही पूजास्थानके आसपासका वातावरण भी देवतातत्त्वकी तरंगोंसे संचारित होता है । यही कारण है कि, श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करते हैं ।

श्री लक्ष्मी एवं कुबेरको नैवेद्य निवेदित करते हैं । श्री लक्ष्मीको धनिया एवं चावलकी खीलें अर्पण करते है ।
श्री लक्ष्मीदेवीके नैवेद्यमें समाविष्ट घटक 
श्री लक्ष्मीपूजनमें देवीको अर्पित करने हेतु बनाए नैवेद्यमें लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर, इन घटकोंका समावेश होता है । कुछ लोग संभव हो, तो इन घटकोंको मिलाकर बनाए खोएका उपयोग नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इन घटकोंमेंसे प्रत्येक घटकका कार्य भिन्न होता है ।
१. लौंग तमोगुणका नाश करती है ।
२. इलायची रजोगुणका नाश करती है ।  
३. दूध एवं शक्कर सत्त्वगुणमें वृद्धि करते हैं ।
यही कारण है कि, इन घटकोंको ‘त्रिगुणावतार’ कहते हैं । ये घटक व्यक्तिमें त्रिगुणोंकी मात्राको आवश्यकतानुसार अल्पाधिक करनेका महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं ।
कुछ स्थानोंपर लक्ष्मीपूजनके लिए धनिया, बताशे, चावलकी खीलें, गुड तथा लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर इत्यादिसे बनाए खोएका उपयोग भी नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इनमेंसे धनिया `धन’ वाचक शब्द है, तो चावलकी `खीलें’ समृद्धिका । मुट्ठीभर धान भूंजनेपर उससे अंजुलीभर खीलें बनती हैं । लक्ष्मीकी अर्थात धनकी समृद्धि होने हेतु श्री लक्ष्मीजीको खीलें चढाते हैं ।
श्री लक्ष्मीके पूजन हेतु उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीसे प्राप्त लाभ
१. बताशेसे सात्त्विकताका २५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
२. धानद्वारा शक्तिकी तरंगोंका २० प्रतिशत
३. चावलकी खीलोंसे चैतन्यकी तरंगोंका २५ प्रतिशत   
४. गूडसे आनंदकी तरंगोंका १५ प्रतिशत
५. धनियासे शांतिकी तरंगोंका १५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
इनका कुल योग होता है १०० प्रतिशत ।
इस सारिणीसे श्री लक्ष्मीपूजनके समय उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीका महत्त्व स्पष्ट होता है । ये सामग्री देवीको निवेदित करनेके उपरांत प्रसादके रूपमें सगेसंबंधियोंमें बांटते हैं ।

पूजनके अंतिम चरणमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित करते हैं । श्रद्धापूर्वक नमस्कार कर पूजनके समय हुई गलतियोंके लिए देवीकी क्षमा याचना करते हैं ।

दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली प्रक्रिया

लक्ष्मीपूजन करनेके परिणाम पूजा करनेवाले पती-पत्नी दोनोंपर होता है । परंतु सुविधा हेतु चित्रमें एकही व्यक्तिपर दर्शाए है । 
१. पति-पत्नीद्वारा श्री लक्ष्मीका स्मरण कर भावसहित पूजन करनेसे उनमें भावका वलय निर्मित होता है ।
२. श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमा एवं कुबेरके प्रतीकस्वरूप स्थापित सिक्कोंमें ईश्वरीय तत्त्वका प्रवाह आकृष्ट होता है और उनमें ईश्वरीय तत्त्वका वलय निर्मित होता है ।
३.
३ अ. शक्तिका प्रवाह श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमामें आकृष्ट होता है और उसका वलय निर्मित होता है ।
३ आ. इस वलयद्वारा शक्तिके प्रवाहका वातावरणमें प्रक्षेपण होता है ।
३ इ. शक्तिके ये प्रवाह पूजककी ओर भी प्रक्षेपित होते हैं और पूजकमें उसका वलय निर्मित होता है ।
३ ई. शक्तिके कण पूजकके देहमें और वातावरणमें संचारित होते हैं ।
४.
४ अ. श्री लक्ष्मीजीकी प्रतिमा एवं सिक्कोंमें ईश्वरीय चैतन्यका प्रवाह आकृष्ट होता है और प्रतिमामें उनमें उसका चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
४ आ. इस वलयद्वारा वातावरणमें चैतन्यके प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं ।
४ इ.  चैतन्यका एक प्रवाह पूजककी ओर भी प्रक्षेपित होता है और पूजकमें चैतन्यका वलय निर्मित होता है ।
४ ई. वातावरणमें चैतन्यके कण संचारित होते हैं ।
५. पूजनके स्थानपर आनंदका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
५ अ. इस प्रवाहद्वारा आनंदके वलय निर्मित होता है और आनंदके स्पंदनोंका वातावरणमें संचार होता है ।
यह देखनेसे स्पष्ट होता है कि, दीपावलीके दिन किये गए श्री लक्ष्मीजीके पूजनद्वारा शक्ति और चैतन्यके स्पंदनोंकी निर्मिति अधिक मात्रामें होती है तथा ये स्पंदन वातावरणमें संचारित होते हैं ।  इस दिन ब्रह्मांडकी कक्षामें संपूर्ण `लक्ष्मीपंचायतन’ प्रवेश करता है । `लक्ष्मीपंचायतन’ में कुबेर, गजेंद्र, इंद्र, श्रीविष्णु एवं श्री लक्ष्मी इन देवतातत्त्वोंकी तरंगें समाविष्ट रहती हैं ।

लक्ष्मी पंचायतनमें समाविष्ट देवताओंका कार्य     

१. कुबेर संपत्ति अर्थात प्रत्यक्ष धन देते हैं, तथा उसका संग्रह भी करते हैं ।
२. गजेंद्र संपत्तिका वहन करता है ।
३. इंद्र ऐश्वर्य अर्थात संपत्तिद्वारा प्राप्त समाधान देते हैं । 
४. श्रीविष्णु सुख अर्थात समाधानमें समाहित आनंद प्रदान करते हैं ।
५. श्री लक्ष्मी ऊपर्निर्दिष्ट घटकोंको प्रत्यक्ष बल प्रदान करनेवाली शक्ति है । 
दीपावलीके दिन पूजकके साथही वहां उपस्थित अन्य व्यक्तियोंको भी इन पांचों तत्त्वोंका लाभ प्राप्त होता है । जिससे वास्तुमें सुख, ऐश्वर्य, समाधान एवं संपत्ति वास करती है । इनके साथही श्री लक्ष्मीपूजनके कुछ अन्य लाभ भी हैं ।

श्री लक्ष्मीपूजनके अन्य लाभ ।

१. भक्तिभाव बढना
श्री लक्ष्मीपूजनके दिन ब्रह्मांडमें श्री लक्ष्मीदेवी एवं कुबेर इन देवताओंका तत्त्व अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक मात्रामें प्रक्षेपित होता है । इस दिन इन देवताओंका पूजन करनेसे व्यक्तिका भक्तिभाव बढता है और ३ घंटोंतक बना रहता है ।   
२. सुरक्षाकवचका निर्माण होना
श्री लक्ष्मीतत्त्वकी मारक तरंगोंके स्पर्शसे व्यक्तिके देहके भीतर और उसके चारों ओर विद्यमान रज-तम कणोंका नाश होता है । व्यक्तिके देहके चारों ओर सुरक्षाकवचका निर्र्माण होता है । 
३. अनिष्ट शक्तियोंका नाश होना
श्री लक्ष्मीपूजनके दिन अमावस्याका काल होनेसे श्री लक्ष्मीका मारक तत्त्व कार्यरत रहता है । पूजकके भावके कारण पूजन करते समय श्री लक्ष्मीकी मारक तत्त्व तरंगे कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंके कारण वायुमंडलमें विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंका नाश होता है । इसके अतिरिक्त दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे पूजकको, शक्तिका २ प्रतिशत, चैतन्यका २ प्रतिशत आनंदका एक दशमलव पच्चीस प्रतिशत एवं ईश्वरीय तत्त्वका १ प्रतिशत मात्रामें लाभ मिलता है । इन लाभोंसे श्री लक्ष्मीपूजन करनेका महत्त्व समझमें आता है ।

अलक्ष्मी नि:सारण

अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता, दैन्य और आपदा । नि:सारण करनेका अर्थ है बाहर निकालना । अलक्ष्मी नि:स्सारण हेतु  दीपावली कालमें लक्ष्मीपूजनके दिन नई बुहारी अर्थात झाडू घरमें लाते हैं । इस झाडूसे मध्यरात्रीमे घरका कुडा सूपमे (छाज) भरकर बाहर फेंका जाता है । मध्यान्ह रात को उसे `लक्ष्मी’ मानकर उसका पूजन करते हैं । उसकी सहायतासे घरका कूडा निकालते हैं । कूडा अलक्ष्मीका प्रतीक है । कूडा सूपमें (छाज) भरते हैं और घरके पीछेके द्वारसे उसे बाहर निकालकर दूर फेंकते हैं । कूडा बाहर फेंकनेंके उपरांत घरके कोने-कोनेमें जाकर सूप अर्थात छाज बजाते हैं । अन्य किसी भी दिन मध्यरात्रीमें कुडा नहीं निकालते ।
कूडा बाहर फेंकनेकी सूक्ष्म-स्तरीय प्रक्रिया
मध्यरात्रिमें  रज-तमात्मक तरंगोंकी सर्वाधिक निर्मिति होती है । ये तरंगें घरमें विद्यमान रज-तमात्मक कूडेकी ओर आकृष्ट होती हैं । इस रज-तमात्मक तरंगोंसे भरपूर कूडेको सूपमें (छाज) भरकर वास्तुसे बाहर फेंकनेसे वास्तुकी रज-तमात्मक तरंगें नष्ट होती हैं और वास्तु शुद्ध होती है  ।  इससे सात्त्विक तरंगें वास्तुमें सरलतासे प्रवेश कर पाती हैं । वास्तुमें श्री लक्ष्मीपूजनद्वारा आकृष्ट चैतन्यका लाभ बढता है ।  

Dhantrayodashi (Hindi Article)

Dhantrayodashi (Hindi Article) | Dipawali

सारणी –


धनत्रयोदशी दिनविशेष

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात `धनत्रयोदशी’ । इसीको साधारण बोलचालकी भाषामें `धनतेरस’ कहते हैं । इस दिनके विशेष महत्त्वका कारण यह दिन देवताओंके वैद्य धन्वंतरिकी जयंतीका दिन है ।

समुद्रमंथनके समय धनत्रयोदशीके दिन अमृतकलश हाथमें लेकर देवताओंके वैद्य भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए । इसीलिए यह दिन भगवान धन्वंतरिके जन्मोत्सवके रूपमें मनाया जाता है । आयुर्वेदके विद्वान एवं वैद्य मंडली इस दिन भगवान धन्वंतरिका पूजन करते हैं और लोगोंके दीर्घ जीवन तथा आरोग्यलाभके लिए मंगलकामना करते हैं । इस दिन नीमके पत्तोंसे बना प्रसाद ग्रहण करनेका महत्त्व है । माना जाता है कि, नीमकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है और धन्वंतरि अमृतके दाता हैं । अत: इसके प्रतीकस्वरूप धन्वंतरि जयंतीके दिन नीमके पत्तोंसे बना प्रसाद बांटते हैं । इस दिनकी एक अन्य विशेषता भी है, धनत्रयोदशी कातके रूपमें भी मनाई जाती है । धनत्रयोदशी मृत्युके देवता यमदेवसे संबंधित कात है । यह कात दिनभर रखते हैं । कात रखना संभव न हो, तो सायंकालके समय यमदेवके लिए दीपदान अवश्य करते हैं ।

यमदीपदान

दीपावलीके कालमें धनत्रयोदशी, नरकचतुर्दशी एवं यमद्वितीया, इन तीन दिनोंपर यमदेवके लिए दीपदान करते हैं । इनमें धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदानका विशेष महत्त्व है, जो स्कंदपुराणके इस श्लोकसे स्पष्ट होता है । 
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।। – स्कंदपुराण

इसका अर्थ है, कार्तिक मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशीके दिन सायंकालमें घरके बाहर यमदेवके उद्देश्यसे दीप रखनेसे अपमृत्युका निवारण होता है ।
   
इस संदर्भमें एक कथा है कि, यमदेवने अपने दूतोंको आश्वासन दिया कि, धनत्रयोदशीके दिन यमदेवके लिए दीपदान करनेवालेकी अकाल मृत्यु नहीं होगी ।

धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदान करनेका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

१. दीपदानसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होना
दीप प्राणशक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है । दीपदान करनेसे व्यक्तिको तेजकी प्राप्ति होती है । इससे उसकी प्राणशक्तिमें वृद्धि होती है और उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है । 
२. यमदेवके आशीर्वाद प्राप्त करना
धनत्रयोदशीके दिन ब्रह्मांडमें यमतरंगोंके प्रवाह कार्यरत रहते हैं । इसलिए इस दिन यमदेवतासे संबंधित सर्व विधियोंके फलित होनेकी मात्रा अन्य दिनोंकी तुलनामें ३० प्रतिशत अधिक होती है । धनत्रयोदशीके दिन संकल्प कर यमदेवके लिए दीपका दान करते हैं और उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
३. यमदेवके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना
यमदेव मृत्युलोकके अधिपति हैं । धनत्रयोदशीके दिन यमदेवका नरकपर आधिपत्य होता है । साथही विविध लोकोंमें होनेवाले अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर भी उनका नियंत्रण रहता है । धनत्रयोदशीके दिन यमदेवसे प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकोंतक पहुंचती हैं । इसी कारण धनत्रयोदशीके दिन नरकमें विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं । परिणामस्वरूप पृथ्वीपर भी नरकतरंगोंकी मात्रा घटती है । इसीलिए धनत्रयोदशीके दिन यमदेवके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए उनका भावसहित पूजन एवं दीपदान करते हैं । दीपदानसे यमदेव प्रसन्न होते हैं ।

संक्षेपमें कहें तो, यमदीपदान करना अर्थात दीपके माध्यमसे यमदेवको प्रसन्न कर अपमृत्युके लिए कारणभूत कष्टदायक तरंगोंसे रक्षाके लिए उनसे प्रार्थना करना ।     

यमदीपदान की विधि

यमदीपदान विधिमें नित्य पूजाकी थालीमें घिसा हुआ चंदन, पुष्प, हलदी, कुमकुम, अक्षत अर्थात अखंड चावल इत्यादि पूजासामग्री होनी चाहिए । साथही आचमनके लिए ताम्रपात्र, पंचपात्र, आचमनी ये वस्तुएं भी आवश्यक होती हैं । यमदीपदान करनेके लिए हलदी मिलाकर गुंदे हुए गेहूंके आटेसे बने विशेष दीपका उपयोग करते हैं ।

गेहूंके आटेसे बने दीपका महत्त्व
धनत्रयोदशीके दिन कालकी सूक्ष्म कक्षाएं यमतरंगोंके आगमन एवं प्रक्षेपणके लिए खुली होती हैं । इस दिन तमोगुणी ऊर्जातरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगे अधिक मात्रामें कार्यरत रहती हैं । इन तरंगोंमें जडता होती है । ये तरंगे पृथ्वीकी कक्षाके समीप होती हैं । व्यक्तिकी अपमृत्युके लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैं । गेहूंके आटेसे बने दीपमें इन तरंगोंको शांत करनेकी क्षमता रहती है । इसलिए यमदीपदान हेतु गेहूंके आटेसे बने दीपका उपयोग किया जाता है ।

यमदीपदानके उद्देश्यसे की जानेवाली पूजाके लिए दीप स्थापित करनेके लिए श्रीकृष्णयंत्रकी रंगोली बनाते है । यमदीपदान हेतु इसप्रकार कृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली बनानेका विशेष महत्त्व है ।
यमदीपदानके समय दीप रखनेके लिए कृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली बनानेका शास्त्रीय आधार
दीपकी पूजनविधिसे पूर्व श्रीविष्णुके २४ नामोंसे उनका आवाहन कर विधिका संकल्प करते हैं । `श्रीकृष्ण’ श्रीविष्णुके पूर्णावतार हैं । यमदेवमें भी श्रीकृष्णजीका तत्त्व होता है । इस कारण पूजनके पूर्व किए जानेवाले आवाहनद्वारा विधिके स्थानपर अल्प समयमेंही यमदेवका आगमन तत्त्वरूपमें होता है । मृत्युसे संबंधित जडत्वदर्शक तरंगोंसे व्यक्तिको होनेवाला कष्ट, श्रीकृष्णजीके तथा यमदेवके अधिष्ठानके फलस्वरूप घट जाता है । यही कारण है कि, धनत्रयोदशीके दिन श्रीकृष्णजीका तत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोली बनाते हैं । यमदेवमें शिवतत्त्व भी होता है । इस कारण शिवतत्त्वसे संबंधित रंगोली भी बना सकते हैं । इसका लाभ श्रीकृष्ण तत्त्वकी रंगोलीसे प्राप्त लाभ समानही होता है ।

यमदीपदान पूजनविधि और उसका शास्त्रीय आधार

प्रथम आचमन, प्राणायाम, उपरांत देशकालका उच्चारण किया जाता है । यमदीपदान के लिए संकल्प किया जाता है। संकल्प करते समय इस प्रकार उच्चारण किया जाता है ।
मम अपमृत्यु विनाशार्थम् यमदीपदानं करिष्ये । 
इसका अर्थ है, अपनी अपमृत्युके निवारण हेतु मैं यमदीपदान करता हूं ।
ताम्रपात्रमें रखा आटेका दीप प्रज्वलित किया जाता है । रंगोलीसे बनाए गए श्रीकृष्णयंत्रके मध्यबिंदुपर दीप रखा जाता है । दीपको चंदन, अक्षत, हलदी एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है । दीपको पुष्प अर्पित किया जाता है। दीपको नमस्कार किया जाता है। इसके पश्चात् यह दीप उठाकर घरके बाहर ले जानेके लिए ताम्रपात्रमें रखा जाता है । दीपको घरके बाहर ले जाते हैं । घरके बाहर दीपको दक्षिण दिशाकी ओर मुख कर रखा जाता है ।
यमदेवताको उद्देशित कर प्रार्थना की जाती है ।
मृत्युना पाशदंडाभ्यां कालेन श्यामयासह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतां मम ।। – स्कंदपुराण
इसका अर्थ है, त्रयोदशीपर यह दीप मैं सूर्यपुत्रको अर्थात् यमदेवताको अर्पित करता हूं । मृत्युके पाशसे वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें ।

जिन्हें श्लोककी जानकारी नहीं, वे अर्थको समझ कर मृत्युके पाशसे मुक्त होनेके लिए एवं अपने कल्याणके लिए प्रार्थना कर सकते हैं । प्रार्थना जितनी भावपूर्वक की जाती है, उतना ही  लाभ अधिक होता है । दीपदान हेतु जल छोडा जाता है ।

दीपका पूजन करनेके परिणाम

दीपको चंदन लगानेपर विष्णुतत्त्वकी नीली आनंददायी ज्योति दीपके मध्यमें विराजमान होती है । दीपको फूल अर्पण करनेपर नीली ज्योतिमें पीले बिंदुके रूपमें तेजका अस्तित्व दिखायी देता है । दीपको अक्षत अर्पित करनेपर नीली ज्योतिमें पीले बिंदुके रूपमें विद्यमान तेजतत्त्व क्रियाशील होता है । इस तेजतत्त्वद्वारा वातावरणमें तेजतत्त्वकी तरंगें वलयोंके रूपमें प्रक्षेपित होती हैं ।

पूजित दीप घरके बाहर दक्षिण दिशामें रखनेके परिणाम

दक्षिण दिशा यमतरंगोंके लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशासे यमतरंगें  अधिक मात्रामें आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं ।

दक्षिण दिशासे यमतरंगोंका प्रवाह दीपकी ओर आकृष्ट होता है । यमतरंगोंका यह प्रवाह दीपके चारों ओर वलयांकित रूपमें फैलता है । यमतरंगोंके कारण कनिष्ठ प्रकारकी अनिष्ट शक्तियां दूर हट जाती हैं । यमतरंगोंके रूपमें आए यमदेवके दर्शन हेतु स्थानदेवता एवं वास्तुदेवता भी तत्त्वरूपमें उस स्थानपर आते हैं । इन देवताओंके आगमनके कारण वायुमंडल चैतन्यमय बनता है । वास्तुमें रहनेवाले सभी सदस्योंको इसका लाभ होता है ।

इस प्रकार यमतरंगोंके निकट आनेके कारण धनत्रयोदशीके दिन दीपका पूजन कर उसका यमदेवके लिए किया दान उन्हें अल्पावधिमें एवं सहजतासे प्राप्त होता है । परिणामस्वरूप अपमृत्युके लिए कारणभूत तरंगोंसे व्यक्तिकी रक्षा होती है ।

यमदीपदान करनेके संदर्भमें (प.पू.महाराजांचे छायाचित्र) आश्रम के संत प.पू. राम महाराजजी बताते हैं ।

यम, मृत्यु एवं धर्मके देवता हैं । हमें सतत भान होना आवश्यक है कि, प्रत्येक मनुष्यकी मृत्यु निश्चित है । ऐसे भानसे मनुष्यके हाथों कभी बुरा कर्म अथवा धनका अपव्यय नहीं होता । यमदेवके लिए दीपदान कर कहें कि, हे यमदेव, इस दीप समान हम सतर्क हैं, जागरूक हैं । जागरुकता व प्रकाशका प्रतीक दीप हम आपको अर्पित कर रहे हैं, इसका स्वीकार करें ।

प.पू. पांडे महाराजजीद्वाराद्वारा बताए अनुसार मृत्युका भान सदैव रखकर हम जीवन बिताएंगे, तो हमसे अवश्यही धर्मपालन होगा । 

व्यापारियोंद्वारा किया जानेवाला द्रव्यकोष पूजन

व्यापारी लोगोंके लिए यह दिन विशेष महत्त्वका है । व्यापारी वर्ष, एक दीवालीसे दूसरी दीवालीतक होता है । नए वर्षकी लेखा-बहियां इसी दिन लाते हैं । कुछ स्थानोंपर इस दिन व्यापारी द्रव्यकोषका अर्थात तिजोरीका पूजन करते हैं ।

पूर्वकालमें साधनाके एक अंगके रूपमेंही व्यापारी वर्ग इस दिन द्रव्यकोषका पूजन करते थे । परिणामस्वरूप उनके लिए श्री लक्ष्मीजीकी कृपासे धन अर्जन एवं उसका विनियोग उचित रूपसे करना संभव होता था । इस प्रकार वैश्यवर्णकी साधनाद्वारा परमार्थ पथपर अग्रसर होना व्यापारी जनोंके लिए संभव होता है ।

धनत्रयोदशीके दिन विशेष रूपसे स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र तथा नए वस्त्रालंकार क्रय किए जाते हैं । इससे वर्षभर घरमें धनलक्ष्मी वास करती हैं ।

धनत्रयोदशीके दिन स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र क्रय करनेका शास्त्रीय कारण

धनत्रयोदशीके दिन लक्ष्मीतत्त्व कार्यरत रहता है । इस दिन स्वर्ण अथवा चांदीके नए पात्र क्रय करनेकी कृतिद्वारा श्री लक्ष्मीके धनरूपी स्वरूपका  आवाहन किया जाता है और कार्यरत लक्ष्मीतत्त्वको गति प्रदान की जाती है । इससे द्रव्यकोषमें धनसंचय होनेमें सहायता मिलती है ।

यहां ध्यान रखनेयोग्य बात यह है कि, धनत्रयोदशीके दिन अपनी संपत्तिका लेखा-जोखा कर शेष संपत्ति ईश्वरीय अर्थात सत्कार्यके लिए अर्पित करनेसे धनलक्ष्मी अंततक रहती है ।

Malabandhan ke parinam, Kumarika pujan aur Upavas ka Shashtra (Hindi)

Malabandhan ke parinam, Kumarika pujan aur Upavas ka Shashtra (Hindi) | Navratri

मालाबंधनके परिणाम, कुमारिका पुजन एवं उपवास का शास्त्र

नवरात्रिमें अखंड दीपप्रज्वलनके साथ कुलाचारानुसार मालाबंधन करते हैं । कुछ उपासक स्थापित घटपर माला चढाते हैं, तो कुछ देवीकी मूर्तिपर माला चढ़ाते हैं ।

१. नवरात्रिमें मालाबंधनके परिणाम :

नवरात्रिमें मालाबंधनका विशेष महत्त्व है ।

  • देवताको चढाई गई इन मालाओंमें गूंथे फूलोंके रंग एवं सुगंधके कणोंकी ओर वायुमंडलमें विद्यमान तेजतत्त्वात्मक शक्तिकी तरंगें आकृष्ट होती हैं ।
  • ये तरंगें पूजास्थलपर स्थापित की गई देवीकी मूर्तिमें शीघ्र संक्रमित होती हैं ।
  • इन तरंगोंके स्पर्शसे मूर्तिमें देवीतत्त्व अल्पावधिमें जागृत होता है ।
  • कुछ समयके उपरांत इस देवीतत्त्वका वास्तुमें प्रक्षेपण आरंभ होता है । इससे वास्तुशुद्धि होती है ।
  • साथ ही वास्तुमें आनेवाले व्यक्तियोंको उनके भावानुसार इस वातावरणमें विद्यमान देवीके चैतन्यका लाभ मिलता है । सुहागिनों और कुंवारी कन्याओंका पूजन यह देवीपूजनका एक विशेष महत्त्वपूर्ण अंग है । इसीलिए नवरात्रिके नौ दिनोंमें सुहागिनोंका एवं कुंवारी कन्याओंका पूजन करनेका विशेष महत्त्व है ।
  • सर्वप्रथम सुहागिनको आसनपर बिठाकर उसके चरण धोते हैं ।
  • तदुपरांत उसे हलदी कुमकुम लगाते हैं ।
  • यथाशक्ति साडी, चोलीवस्त्र, नारियल आदि देकर आंचल भरते हैं ।
  • उसे फल एवं दक्षिणा अर्पित करते हैं ।
  • देवीका रूप मानकर नमस्कार करते हैं ।
  • कुंवारी कन्याको आसनपर बिठाकर उसके चरण धोते हैं ।
  • उसे हलदी-कुमकुम लगाते हैं ।
  • यथाशक्ति वस्त्रालंकार देते हैं । 
  • दूध, फल एवं दक्षिणा देकर उसे नमस्कार करते हैं ।

२. नवरात्रिमें कुमारिका-पूजनका शास्त्रीय आधार :

कुमारिका, अप्रकट शक्तितत्त्वका प्रतीक है । नवरात्रिमें अन्य दिनोंकी तुलनामें शक्तितत्त्व अधिक मात्रामें कार्यरत रहता है । आदिशक्तिका रूप मानकर भावसहित कुमारिका-पूजन करनेसे कुमारिकामें विद्यमान शक्तितत्त्व जागृत होता है । इससे ब्रह्मांडमें कार्यरत तेजतत्त्वात्मक शक्तिकी तरंगें कुमारिकाकी ओर सहजतासे आकृष्ट होनेमें सहायता मिलती है । पूजकको प्रत्यक्ष चैतन्यके माध्यमसे इन शक्तितत्त्वात्मक तरंगोंका लाभ भी प्राप्त होनेमें सहायता मिलती है । कुमारिकामें संस्कार भी अल्प होते हैं । इस कारण उसके माध्यमसे देवीतत्त्वका अधिकाधिक सगुण लाभ प्राप्त करना संभव होता है । इस प्रकार नवरात्रिके नौ दिन कार्यरत देवीतत्त्वकी तरंगोंका, अपने देहमें संवर्धन करनेके लिए कुमारिका-पूजन कर उसे संतुष्ट किया जाता है ।

३. नवरात्रिकी कालावधिमें उपवास करनेका महत्त्व :

नवरात्रिके नौ दिनोंमें अधिकांश उपासक उपवास करते हैं । किसी कारण नौ दिन उपवास करना संभव न हो, तो प्रथम दिन एवं अष्टमीके दिन उपवास अवश्य करते हैं । उपवास करनेसे व्यक्तिके देहमें रज-तमकी मात्रा घटती है और देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है । ऐसा सात्त्विक देह वातावरणमें कार्यरत शक्तितत्त्वको अधिक मात्रामें ग्रहण करनेके लिए सक्षम बनता है ।

नवरात्रिमें प्रत्येक दिन उपासक भोजनमें विविध व्यंजन बनाकर देवीको नैवेद्य अर्पित करते हैं । बंगाल प्रांतमें प्रसादके रूपमें चावल एवं मूंगकी दालकी खिचडीका विशेष महत्त्व है । मीठे व्यंजन भी बनाए जाते हैं । इनमें विभिन्न प्रकारका शिरा, खीर-पूरी इत्यादिका समावेश होता है । महाराष्ट्रमें चनेकी दाल पकाकर उसे पीसकर उसमें गुड मिलाया जाता है । इसे `पूरण’ कहते हैं। इस पूरणको भरकर मीठी रोटियां विशेष रूपसे बनाई जाती हैं  । चावलके साथ खानेके लिए अरहर अर्थात तुवरकी दाल भी बनाते हैं  ।

नवरात्रिमें देवीको अर्पित नैवेद्यमें पुरणकी मीठी रोटी एवं अरहर अर्थात तुवरकी दालके समावेशका कारण चनेकी दाल एवं गुडका मिश्रण भरकर बनाई गई मीठी रोटी एवं तुवरकी दाल, इन दो व्यंजनोंमें विद्यमान रजोगुणमें ब्रह्मांडमें विद्यमान शक्तिरूपी तेज-तरंगें अल्पावधिमें आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है । इससे ये व्यंजन देवीतत्त्वसे संचारित होते हैं । इस नैवेद्यको प्रसादके रूपमें ग्रहण करनेसे व्यक्तिको शक्तिरूपी तेज-तरंगोंका लाभ मिलता है और उसके स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंकी शुद्धि होती है ।

Ghatasthapana Vidhi ke Adhyatmik Parinam (Hindi)

Ghatasthapana Vidhi ke Adhyatmik Parinam (Hindi) | Navratri


।।  श्री दुर्गादेव्यै नम: ।।

घटस्थापनाके विधीके आध्यात्मिक परिणाम

नवरात्रिके प्रथम दिन घटस्थापना करते हैं । घटस्थापना करना अर्थात नवरात्रिकी कालावधिमें ब्रह्मांडमें कार्यरत शक्तितत्त्वका घटमें आवाहन कर उसे कार्यरत करना । कार्यरत शक्तितत्त्वके कारण वास्तुमें विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं।

कलशमें डाली गई वस्तुओंसे प्राप्त लाभकी मात्रा

१. घटस्थापनाके लिए रखे कलशमें भरे जलसे २० प्रतिशत लाभ होता है,
२. फूलसे २० प्रतिशत
३. दूर्वासे १० प्रतिशत
४. अक्षतसे १० प्रतिशत
५. सुपारीसे ३० प्रतिशत एवं
६. सिक्केसे १० प्रतिशत लाभ होता है ।
इस प्रकार कलशमें ये सभी वस्तुएं रखनेसे कुल १०० प्रतिशत लाभ होता है ।
हमारे ऋषिमुनियोंने इन अध्यात्मशास्त्रीय तथ्यों का गहन अध्ययन कर हमें यह गूढ ज्ञान दिया । इससे उनकी महानताका भी बोध होता है । नवरात्रिमें घटस्थापनाके अंतर्गत वेदीपर मिटि्टमें सात प्रकारके अनाज बोते हैं ।

वेदीपर मिट्टीमें बोए जानेवाले अनाजसे प्राप्त आध्यात्मिक लाभकी मात्रा

१. जौ का उपयोग करनेसे १० प्रतिशत लाभ होता है ।
२. तिलसे १० प्रतिशत
३. चावलसे २० प्रतिशत लाभ होता है ।
४. मूंगसे१० प्रतिशत
५. कंगनीका उपयोग करनेसे २० प्रतिशत
६. चने का उपयोग करनेसे २० प्रतिशत और
७. गेहूंका उपयोग करनेसे १० प्रतिशत लाभ मिलता है ।
इस प्रकार सात प्रकारके अनाजके उपयोगसे शत प्रतिशत लाभ होता है ।
देश, काल एवं परिस्थितिके अनुरूप इन वस्तुओंमें भलेही कुछ परिवर्तन होता है, उनसे होनेवाले लाभ एक समानही होते हैं । लाभ की मात्रा व्यक्तिके भावपर निर्भर करती है । यदी पूजकका धार्मिक विधियोंके प्रति भाव अधिक हो, तो उसे प्राप्त होनेवाले लाभ भी अधिक होते हैं ।

वेदीपर सात प्रकारके अनाज बोनेके लिए ली गई मिट्टी अथवा तांबेके कलशमें रखी मिट्टी पृथ्वीतत्त्वका प्रतीकस्वरूप है ।

कुछ स्थानोंपर जौ की अपेक्षा अलसीका, चावलकी अपेक्षा सांवांका और कंगनीकी अपेक्षा चनेका उपयोग भी करते हैं । मिट्टी पृथ्वीतत्त्वका प्रतीक है ।
मिट्टीमें सप्तधान्यके रूपमें आप एवं तेजका अंश बोया जाता है ।
सात प्रकारके अनाजद्वारा आप एवं तेज तत्त्वकी तरंग प्रक्षेपित होती हैं ।   बंद घटमें उत्पन्न ऊष्ण ऊर्जाकी सहायतासे नाद निर्माण करनेवाली तरंगोंकी निर्मिति होती है । बीजद्वारा प्रक्षेपित एवं घटमें निर्मित तरंगोंकी ओर ब्रह्मांडकी तेजतत्त्वात्मक आदिशक्तिरूपी तरंगें अल्पावधिमें आकृष्ट हो जाती हैं । ये तरंगें मिट्टीमें दीर्घकालतक बनी रहती हैं ।  तांबेके कलशके कारण इन तरंगोंका वायुमंडलमें वेगसे प्रक्षेपण होता है ।  इन तरंगोंका वास्तुमें संचार होनेसे संपूर्ण वास्तु मर्यादित कालके लिए लाभान्वित होती है । घटस्थापनाके कारण शक्तितत्त्वकी तेजरूपी रजोतरंगें ब्रह्मांडमें कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंके कारण पूजकके सूक्ष्मदेहकी शुद्धि होती है ।

हमने घटस्थापनाके अंतर्गत वेदीपर सप्तधान्य बोनेके सूक्ष्म-स्तरीय परिणाम समझ लिए । वेदीपर घट, नवार्णव यंत्र एवं देवीकी स्थापना करनेसे ब्रह्मांडमें विद्यमान ब्रह्मा, शिव, विष्णु, प्रजापति एवं मीनाक्षी ये पंचतत्त्व मिट्टीमें सहजतासे आकृष्ट होते हैं । इनसे उपासकको भी लाभ होता है। नवरात्रि अंतर्गत देवीपूजनमें आवाहन प्रक्रिया एवं स्थापनाका विशेष महत्त्व है । आवाहनके अंतर्गत किया जानेवाला संकल्प, शक्तितत्त्वकी तरंगोंको विशिष्ट पूजास्थानपर दीर्घकालतक कार्यरत रखनेमें सहायक होता है ।

नवार्णव यंत्रकी स्थापनाका शास्त्रीय आधार

`नवार्णव यंत्र’ देवीके विराजमान होनेके लिए पृथ्वीपर स्थापित आसनका प्रतीक है । नवार्णव यंत्रकी सहायतासे पूजास्थलपर देवीके नौ रूपोंकी मारक तरंगोंको आकृष्ट करना संभव होता है । इन सभी तरंगोंका यंत्रमें एकत्रीकरण एवं घनीकरण होता है । इस कारण इस आसनको देवीका निर्गुण अधिष्ठान मानते हैं । इस यंत्रद्वारा आवश्यकतानुसार देवीका सगुण रूप ब्रह्मांडमें कार्यरत होता है । देवीके इस रूप को प्रत्यक्ष कार्यरत तत्त्व का प्रतीक माना जाता है ।

नवार्णव यंत्रपर अष्टभुजा देवीकी मूर्ति स्थापित करनेके परिणाम

अष्टभुजा देवी शक्तितत्त्वका मारक रूप हैं । `नवरात्रि’ ज्वलंत तेजतत्त्वरूपी आदिशक्तिके अधिष्ठानका प्रतीक है । अष्टभुजा देवीके हाथोंमें विद्यमान आयुध, उनके प्रत्यक्ष मारक कार्यकी क्रियाशीलताका प्रतीक हैं । देवीके हाथोंमें ये मारकतत्त्वरूपी आयुध, अष्टदिशाओंके अष्टपालके रूपमें ब्रह्मांडका रक्षण करते हैं । ये आयुध नवरात्रिकी विशिष्ट कालावधिमें ब्रह्मांडमें अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश भी लगाते हैं और उनके कार्यकी गतिको खंडित कर पृथ्वीका रक्षण करते हैं । नवार्णव यंत्रपर देवीकी मूर्तिकी स्थापना, शक्तितत्त्वके इस कार्यको वेग प्रदान करनेमें सहायक है ।

नवरात्रिमें अखंड दीपप्रज्वलनका शास्त्रीय आधार

दीप तेजका प्रतीक है एवं नवरात्रिकी कालावधिमें वायुमंडल भी शक्तितत्त्वात्मक तेजकी तरंगोंसे आवेशित होता है । इन कार्यरत तेजाधिष्ठित शक्तिकी तरंगोंके वेग एवं कार्यमें अखंडत्व होता है । अखंड प्रज्वलित दीपकी ज्योतिमें इन तरंगोंको ग्रहण करनेकी क्षमता होती है ।
अखंड दीप प्रज्वलनके परिणाम समझ लेते हैं –

  • नवरात्रिकी कालावधिमें अखंड दीप प्रज्वलनके फलस्वरूप दीपकी ज्योतिकी ओर तेजतत्त्वात्मक तरंगें आकृष्ट होती हैं । 
  • इन तरंगोंका वास्तुमें सतत संक्रमण होता है । 
  •  इस संक्रमणसे वास्तुमें तेजका संवर्धन होता है ।

इस प्रकार अखंड दीपप्रज्वलनका लाभ वास्तुमें रहनेवाले सदस्योंको वर्षभर होता है । इस तेजको वास्तुमें बनाए रखना सदस्योंके भावपर निर्भर करता है ।

Navaratri me Garba khelana arthat Dandiya khelana (Hindi)

सारणी –

१. नवरात्रिकी कालावधिमें सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली गतिविधियां
२. नवरात्रि व्रतमें पालन करनेयोग्य आचार
३. नवरात्रिकी कालावधिमें उपवास करनेका महत्त्व
४. `जोगवा मांगना’ अर्थात देवीके नामपर भिक्षा मांगना
५. गरबा अर्थात डांडिया नृत्य
६. गराबा खेलते समय होनेवाले अनाचार
७. गरबा खेलते समय होनेवाले अनाचारोंके सूक्ष्म स्तरीय परिणाम
८. देवीकी उपासनास्वरूप परंपरागत गरबा
९. गरबामें तीन बार तालियां बजानेका कारण


।। श्री दुर्गादेव्यै नम: ।।

नवरात्रीमे गरबा खेलना अर्थात डांडिया नृत्य

नवरात्रिकी कालावधिमें सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली गतिविधियां

नवरात्रिके नौ दिनोंमें देवीतत्त्व अन्य दिनोंकी तुलनामें एक सहस्र गुना अधिक सक्रिय रहता है । इस कालावधिमें देवीतत्त्वकी अतिसूक्ष्म तरंगें धीरेधीरे क्रियाशील होती हैं और पूरे ब्रह्मांडमें संचारित होती हैं । उस समय ब्रह्मांडमें शक्तिके स्तरपर विद्यमान अनिष्ट शक्तियां नष्ट होती हैं और ब्रह्मांडकी शुद्धि होने लगती है । देवीतत्त्वकी शक्तिका स्तर प्रथम तीन दिनोंमें सगुण-निर्गुण होता है । उसके उपरांत उसमें निर्गुण तत्त्वकी मात्रा बढती है और नवरात्रिके अंतिम दिन इस निर्गुण तत्त्वकी मात्रा सर्वाधिक होती है । निर्गुण स्तरकी शक्तिके साथ सूक्ष्म स्तरपर युद्ध करनेके लिए छठे एवं सातवें पातालकी बलवान आसुरी शक्तियोंको अर्थात मांत्रिकोंको इस युद्ध में प्रत्यक्ष सहभागी होना पडता है । उस समय ये शक्तियां उनके पूरे सामर्थ्यके साथ युद्ध करती हैं ।

नवरात्रि व्रतमें पालन करनेयोग्य आचार

नवरात्रि व्रतका अधिकाधिक लाभ प्राप्त होनेके लिए शास्त्रमें बताए आचारोंका पालन करना आवश्यक होता है । परंतु देश-काल-परिस्थितिनुसार सभी आचारोंका पालन करना संभव नहीं होता । इसीलिए जो संभव हो, उन आचारोंका पालन अवश्य करें । जैसे
१. पादत्राण न पहनना
२. अनावश्यक न बोलना
३. धूम्रपान न करना
४. पलंग अथवा गद्दीपर न सोना
५. दिनके समय न सोना
६. ब्रह्मचर्यका पालन करना
७. गांवकी सीमाको न लांघना इत्यादि
नवरात्रिमें मांसाहार सेवन और मद्यपान भी नही करना चाहिए । साथही रज-तम गुण बढानेवाला आचरण, जैसे चित्रपट देखना, चित्रपट संगीत सुनना इत्यादि त्यागना चाहिए ।

नवरात्रिकी कालावधिमें उपवास करनेका महत्त्व

नवरात्रिके नौ दिनोंमें अधिकांश उपासक उपवास करते हैं । नौ दिन उपवास करना संभव न हो, तो प्रथम दिन एवं अष्टमीके दिन उपवास अवश्य करते हैं । उपवास करनेसे व्यक्तिके देहमें रज-तमकी मात्रा घटती है और देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है । ऐसा सात्त्विक देह वातावरणमें कार्यरत शक्तितत्त्वको अधिक मात्रामें ठाहण करनेके लिए सक्षम बनता है ।

देवी उपासनाके अन्य अंगोंके साथ नवरात्रीकी कालावधिमें `श्री दुर्गादेव्यै नम: ।’ यह नामजप अधिकाधिक करनेसे देवीतत्त्वका लाभ मिलनेमें सहायता होती है ।    

नवरात्रिमें विविध तिथियोंपर की जानेवाली धार्मिक कृतियां इस नामजपके साथ पूरे श्रद्धाभावसहित करनेेसे पूजक एवं परिवारके सभी सदस्योंको शक्तितत्त्वका लाभ होता है । नवरात्रिकी कालावधिमें शक्तितत्त्वसे भारित बनी वास्तुद्वारा वर्षभर इन तरंगोंका लाभ मिलता रहता है । यह लाभ निरंतर प्राप्त होनेके लिए वर्षभर भावसहित उपासना, नामजप इत्यादि करना आवश्यक होता है ।

`जोगवा मांगना’ अर्थात देवीके नामपर भिक्षा मांगना  

`जोगवा’ मांगनेका अर्थ है, देवीको अंतर्मनसे प्रार्थना कर कार्य करनेके लिए जागृत करना । यह देवीके चरणोंमें आर्ततासे की गई याचना है । इससे जोगवा मांगनेवालेका अहं देवीके चरणोंमें लीन होता है ।

यह दास्यभक्तिका प्रकार है । देवीके चरणोंकी दासी बननेके लिए पांच घरोंसे `शिधा’ अर्थात कच्चे अन्न सामग्राकी भिक्षा मांगते हैं । भिक्षामें जो मिलता है, उसीसे व्यंजन बनाकर प्रसादके रूपमें सेवन करते हैं । इस कृतिद्वारा अपना अहं घटाकर स्वयंमें वैराग्यभावकी निर्मिति करना ही जोगवा मांगनेका खरा अर्थ है ।

गरबा अर्थात डांडिया नृत्य

नवरात्रिमें विभिन्न प्रांतोंमें किए जानेवाले धार्मिक कार्यक्रमों का एक महत्त्वपूर्ण विधि है, गरबा । नवरात्रों में गुजरात में मातृशक्ति के प्रतीक अनेक छिद्रों वाले मिट्टी के कलश में रखे दीपक का पूजन करते हैं । यह `दीपगर्भ’ स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है । इस मान्यतासे नौ दिन `दीपगर्भ’ पूजा जाता   है । `दीपगर्भ’से `दीप’ शब्द का लोप होकर गर्भ-गरभो-गरबो अथवा गरबा शब्द प्रचलित हुआ ।

गराबा खेलते समय होनेवाले अनाचार

आजकल गरबा नृत्यमें मांकी स्तुतिवाले गीत न होकर हीन एवं अभिरुचिहीन गीतोंपर भद्दा नृत्य किया जाता है । उच्च स्वरोंमें गाए जानेवाले फूहड गाने एवं तीखे वाद्यवृंद ध्वनिप्रदूषण बढ़ाते हैं । मूलत: एक धार्मिक उत्सवके रूपमें मनाए जानेवाले इस कार्यक्रमको व्यायसायिक रूप प्राप्त हुआ है । इन कार्यक्रमोंमें असभ्य वर्तन भी दिखाई देता है ।

क्या धार्मिक विधिमें इस प्रकार गरबा खेलनेसे देवीमांकी कृपा हमपर हो सकती है ?

गरबा खेलते समय होनेवाले अनाचारोंके सूक्ष्म स्तरीय परिणाम

अनुचित रूपसे गरबा खेलते समय बढे रज-तमके कारण उस स्थानपर कष्टदायक तरंगें अधिक मात्रामें आकृष्ट होती हैं । अनिष्ट शक्तियां काली शक्ति प्रक्षेपित करती हैं । इस काली शक्तिका वहां उपस्थित व्यक्तियोंपर न्यूनाधिक मात्रामें परिणाम होता है । परिणामस्वरूप व्यक्ति बहिर्मुख और विषयोंके आधीन होता है ।

गरबा खेलते समय की जानेवाली कुछ अनुचित कृतियां एवं काली शक्तिकी मात्रा  
१. मद्यपान कर गरबा खेलनेसे २० प्रतिशत काली शक्ति प्रक्षेपित होती है । 
२. पादत्राण पहनकर गरबा खेलनेसे १० प्रतिशत
३. चलचित्रोंके गीतोंकी धुनपर गरबा खेलनेसे २० प्रतिशत
४. गाना गाते हुए स्वयं गरबा खेलनेसे २० प्रतिशत
५. आधुनिक तंत्रज्ञानके आधारपर भजन गानेसे २० प्रतिशत एवं
६. अन्य कृतियांेसे १० प्रतिशत काली प्रक्षेपित होती है ।
इसका कुल योग होता है १०० प्रतिशत । इससे स्पष्ट होता है की, अनुचित प्रकारसे गरबा खेलनेसे हानिही होती है ।

देवीकी उपासनास्वरूप परंपरागत गरबा

जब हम उत्कट भावसे देवताका आदर-सम्मान करेंगे, तभी उनकी कृपा प्राप्त कर पाएंगे । गरबा नृत्यमें होनेवाले अनाचारों जैसे कृत्योंसे नहीं, भावपूर्ण पूजनसे भक्तपर देवीमांकी पूर्ण कृपा होती है । इसीलिए गरबा खेलनेको हिंदु धर्ममें देवीकी उपासना मानते हैं । इसमें देवीका भक्तिरसपूर्ण गुणगान करते हैं ।

इस समय देवीके समक्ष पारंपरिक भावपूर्ण नृत्यके साथ तालियों एवं छोटे-छोटे डंडोंसे लयबद्ध ध्वनि भी करते हैं । मूल पारंपरिक गरबा नृत्यमें तीन तालियां बजाई जाती हैं । पहली ताली नीचे झुककर, दूसरी ताली खडे होकर और तीसरी ताली हाथ ऊपर उठाकर बजाई जाती है ।

इस समय देवीके समक्ष पारंपरिक भावपूर्ण नृत्य किया जाता हैं । नृत्यमे प्रत्येक स्तरपर तीन तालियां बजायी जाती है । एवं छोटे छोटे डंडोसे लयबद्ध ध्वनि भी करते हैं । गरबा खेलते समय गोल घेरा बनाते हैं । साथही देवीके गीत अथवा भजन गाते हैं ।

इस प्रकार तालियां बजाकर भजन एवं नृत्य करना एक प्रकारसे सगुण उपासना ही है । इस उपासना पद्धतिमें तालियोंके नादसे श्री दुर्गादेवीको जागृत करते हैं । और ब्रह्मांडमें कार्य करनेके लिए मारक रूप धारण करनेके लिए आवाहन करते हैं ।

गरबामें तीन बार तालियां बजानेका कारण

नवरात्रिमें देवीका मारक तत्त्व चंद्रकलासमान बढती मात्रामें जागृत होता जाता है । परमेश्वरकी ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ये तीन प्रमुख कलाएं हैं । देवीका मारक रूप इन तीनों स्तरोंपर जागृत होनेके लिए गरबा खेलते समय तीन तालियां बजाते हैं । तीन तालियां बजानेेसे ब्रह्मांडमें विद्यमान देवीकी संकल्पशक्ति कार्यरत होती है । इसलिए तीन तालियोंकी लयबद्ध क्रियाकलपोंद्वारा देवीका गुणगान करना अधिक इष्ट एवं फलदायी होता है ।
गरबा खेलतेसमय होनेवाले अनुचित प्रकार एवं अनाचारकी रोखथाम करना ही आजके समयमें देवीमांकी खरी उपासना होगी ।

इसके लिए देवीमां हमें बुद्धि एवं शक्ति प्रदान करें, यही उसके चरणोंमें प्रार्थना ।

Sri Durga Saptashati path aur Havan (Hindi)

Sri Durga Saptashati path aur Havan (Hindi) | Navratri

श्री दुर्गासप्तशती पाठ एवं हवन


नवरात्रिकी कालावधिमें देवीपूजनके साथ उपासनास्वरूप देवीके स्तोत्र, सहस्रनाम, देवीमाहात्म्य इत्यादि के यथाशक्ति पाठ और पाठसमाप्तिके दिन विशेष रूपसे हवन करते हैं । श्री दुर्गाजीका एक नाम ‘चंडी’ भी है ।

मार्कंडेय पुराणमें इसी देवीचंडीका माहात्म्य बताया है । उसमें देवीके विविध रूपों एवं पराक्रमोंका विस्तारसे वर्णन किया गया है । इसमेंसे सात सौ श्लोक एकत्रित कर देवी उपासनाके लिए `श्री दुर्गा सप्तशती’ नामक ग्रंथ बनाया गया है । सुख, लाभ, जय इत्यादि कामनाओंकी पूर्तिके लिए सप्तशतीपाठ करनेका महत्त्व बताया गया है ।

शारदीय नवरात्रिमें यह पाठ विशेष रूपसे करते हैं । कुछ घरोंमें पाठ करनेकी कुलपरंपरा ही है । पाठ करनेके उपरांत हवन भी किया जाता है । इस पूरे विधानको `चंडीविधान’ कहते हैं । संख्याके अनुसार नवचंडी, शतचंडी, सहस्रचंडी, लक्षचंडी ऐसे चंडीविधान बताए गए हैं । प्राय: लोग नवरात्रिके नौ दिनोंमें प्रतिदिन एक-एक पाठ करते हैं ।

नवरात्रिमें यथाशक्ति श्री दुर्गासप्तशतीपाठ करते हैं । पाठके उपरांत पोथीपर फूल अर्पित करते हैं ।  उसके उपरांत पोथीकी आरती करते हैं ।

श्री दुर्गासप्तशती पाठमें देवीमांके विविध रूपोंको वंदन किया गया है ।

श्री दुर्गासप्तशती पाठकरनेके परिणाम

१.  भावसहित पाठ करनेसे व्यक्तिमें भावका वलय निर्माण होता है ।

२ ईश्वरीय तत्त्वका प्रवाह श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें आकृष्ट होता है ।
२ अ. ग्रंथमें उसका वलय निर्माण होता है ।
२ आ. ईश्वरीय तत्त्वका प्रवाह पाठ करनेवाले व्यक्तिकी ओर आकृष्ट होता है ।
२ इ. व्यक्तिमें उसका वलय निर्माण होता है ।
३. संस्कृत शब्दोंके कारण चैतन्यका प्रवाह श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें आकृष्ट होता है ।
३ अ. ग्रंथमें चैतन्यका वलय निर्माण होता है ।
३ आ. चैतन्यके वलयोंसे प्रवाहका प्रक्षेपण पाठ करनेवालेकी ओर होता है ।
३ इ. व्यक्तिमें चैतन्यका वलय निर्माण होता है ।
३ ई. पाठ करनेवालेके मुखसे वातावरणमें चैतन्यके प्रवाहका प्रक्षेपण होता है ।
३ उ. चैतन्यके कण वातावरणमें फैलकर दीर्घकालतक कार्यरत रहते हैं ।
४. श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें मारक शक्तिका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
४ अ. ग्रंथमें मारक शक्तिके वलयकी निर्मिति होती है ।
४ आ. इस वलयद्वारा पाठ करनेवालेकी ओर शक्तिके प्रवाहका प्रक्षेपण होता है ।
४ इ. व्यक्तिमें मारक शक्तिका वलयका निर्माण होता है ।
४ ई. मारक शक्तिके वलयसे देहमें शक्तिके प्रवाहोंका संचार होता है ।
४ उ. शक्तिके कण देहमें फैलते हैं ।
४ ऊ. पाठ करते समय व्यक्तिके मुखसे वातावरणमें मारक शक्तिके प्रवाहका प्रक्षेपण होता है ।
४ ए. मारक शक्तिके कण वातावरणमें फैलकर अधिक समयतक कार्यरत रहते हैं ।
४ ऐ. यह पाठ नौ दिन करनेसे आदिशक्तिस्वरूप मारक शक्तिका प्रवाह व्यक्तिकी ओर आता रहता है । 
५.    मांत्रिकोंद्वारा अर्थात पातालकी बलशाली आसुरी शक्तियोंद्वारा व्यक्तिके देहपर लाया गया काली शक्तिका आवरण तथा देहमें रखी काली शक्ति नष्ट होते हैं ।

६. व्यक्तिके देहके चारों ओर सुरक्षा कवच निर्माण होता है ।

नवरात्रिमें घटपर स्थापित देवीमांका पूजन करनेकी पद्धति

नवरात्रिके प्रथम दिन घटस्थापना के साथ श्री दुर्गादेवीका आवाहन कर स्थापना करते हैं । इसके उपरांत देवीमां के नित्यपूजनके लिए पुरोहितकी आवश्यकता नहीं होती । पूजाघरमें रखे देवताओंके नित्य पूजनके साथही उनका पूजन करते हैं । देवीमांके स्नानके लिए फूलद्वारा जल प्रोक्षण करते हैं । इसके उपरांत देवीमांको अन्य उपचार अर्पित करते हैं । पूजनके उपरांत वेदीपर बोए अनाजपर जल छिडकते हैं ।

देवीमां की आरती

देवताकी आरती करना देवतापूजनका एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आरतीका अर्थ है, देवताके प्रति शरणागत होना और उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिए आर्तभावसे उनका स्तुतिगान करना! मनुष्यके लिए कलियुगमें देवताके दर्शन हेतु आरती एक सरल माध्यम है । आरतीके माध्यमसे अंत:करणसे देवताका आवाहन करनेपर देवता पूजकको अपने रूप अथवा प्रकाशके माध्यमसे दर्शन देते हैं । इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों  एवं संतोंने विभिन्न देवताओंकी आरतीकी रचना की ।
देवीमांकी कृपा प्राप्त करनेके लिए उनकी आरती करते समय कुछ सूत्रोंका ध्यान रखना लाभदायक है । ये सूत्र हैं । देवीकी आरती मध्यम वेगसे, आर्त्त स्वर में तथा भावसे गाइए । संभव हो, तो आरती करते समय शक्तियुक्त तरंगें निर्माण करनेवाले चर्मवाद्य हलके हाथसे बजाइए । देवीकी आरती दक्षिणावर्त्त अर्थात दिशामें पूर्ण गोलाकार पद्धतिसे उतारिए ।

आरती के उपरांत देवीमांकी एक अथवा नौ की संख्यामें परिक्रमा करनी चाहिए । इन सभी कृतियोंको भावसहित करनेसे पूजकको देवीतत्त्वका अधिक लाभ मिलता है ।