Dassehara i.e. Vijaya Dashami (Hindi)

 

सारणी –

१. दशहरेका इतिहास
२. विजयादशमीका महत्त्व
३. दशमीको `दशहरा’ अथवा `विजयादशमी’ के नामसे संबोधित करनेका शास्त्रीय आधार
४. दशहरेका त्यौहार मनानेकी पद्धति
५. सीमोल्लंघन
६. शमीपूजन अथवा अश्मंतक वृक्षका पूजन
७. अपराजितादेवीका पूजन
८. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें क्यो देते है तथा शस्त्रपूजन के परिणाम
९. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण
१०. दशहरेके दिन शस्त्रपूजन करनेके परिणाम
११. विजयादशमीके निमित्त विशेष संदेश


।। श्री दुर्गादेव्यै नम: ।।

दशहरा अर्थात विजयादशमी

 

`दश’ का अर्थ है दस और हरा अर्थात हार गया या पराजित हुआ । आश्विन शुक्ल दशमीकी तिथिपर दशहरा मनाते हैं । दशहरेके पूर्वके नौ दिनोंमें अर्थात नवरात्रिकालमें दसों दिशाएं देवीमांकी शक्तिसे आवेशित होती हैं । दशमीकी तिथिपर ये दिशाएं देवीमांके नियंत्रणमें आ जाती हैं अर्थात् दिशाओं पर विजय प्राप्त होती है । इसी कारण इसे `दशहरा’ कहते हैं । दशमीके दिन विजयप्राप्ति होनेके कारण इस दिनको `विजयादशमी’ के नामसे भी जानते हैं ।

१. दशहरेका इतिहास

भगवान श्रीरामके पूर्वज अयोध्याके राजा रघुने विश्वजीत यज्ञ किया । सर्व संपत्ति दान कर वे एक पर्णकुटीमें रहने लगे । वहां कौत्स नामका एक ब्राह्मणपुत्र आया । उसने राजा रघुको बताया कि, उसे अपने गुरुको गुरुदक्षिणा देनेके लिए १४ करोड स्वर्ण मुद्राओंकी आवश्यकता है । तब राजा रघु कुबेरपर आक्रमण करनेके लिए सिद्ध हो गए । कुबेर राजा रघुकी शरणमें आए और उन्होंने अश्मंतक अर्थात कोविदार अथवा कचनार अर्थात ऑरकिड ट्री एवं शमी के अर्थात जांटी अथवा खेजडा वृक्षोंपर स्वर्णमुद्राआेंकी वर्षा की । उनमेंसे कौत्सने केवल १४ करोड स्वर्णमुद्राएं लीं । जो स्वर्णमुद्राए कौत्सने नहीं लीं, वह सर्व राजा रघुने बांट दीं । तभीसे दशहरेके दिन एकदूसरेको सोनेके रूपमें अश्मंतकके पत्ते लोग देते हैं ।
त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामने दशहरेके दिन बलशाली रावणका वध कर सीतामाताको असुरोंके बंधनसे मुक्त किया था । प्रभु श्रीराम ने दशहरेके दिन ही रावण वध किया था । द्वापारयुगमें अज्ञातवास समाप्त होते ही, पांडवोंने शक्तिपूजन कर शमी वृक्षकी कोटरमें रखे अपने शस्त्र पुन: हाथोंमें लिए एवं राजा विराटकी गायोंको चुरानेवाली कौरवसेनापर आक्रमण कर विजयश्री प्राप्त की । वह दिन भी दशहरेका ही था ।

२. विजयादशमीका महत्त्व

विजयादशमीके दिन सरस्वतीतत्त्व प्रथम सगुण अवस्था प्राप्त कर, तदुपरांत सुप्तावस्थामें जाता है अर्थात अप्रकट अवस्था धारण करता है । इस कारण दशमीके दिन सरस्वतीका पूजन एवं विसर्जन करते हैं । इससे पूजकमें देवीके मूर्त स्वरूपके प्रति आकर्षण बढता    है । विजयादशमी साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है । इस दिन कोई भी कार्य शुभफलदायी होता है ।

३. दशमीको `दशहरा’ अथवा `विजयादशमी’ के नामसे संबोधित करनेका शास्त्रीय आधार

सातवें पातालकी बलवान अनिष्ट शक्तियां निर्गुण स्तरकी होती हैं । उन्हें पराजित करनेके लिए ईश्वर निर्गुण स्तरकी शक्तिका उपयोग न कर आनंदका उपयोग करते हैं । इसीलिए भी यह दिन `दशहरा’ कहलाता है । 

दशहरेके दिन वातावरणमें शीतलता प्रतीत होती है । ब्रह्मांडमें निर्गुण स्तरकी विष्णुतत्त्वकी आनंदतरंगें कार्यरत होती हैं । आनंदका स्तर शक्तिके स्तरसे सूक्ष्मतर है । इसलिए सातवें पातालकी बलवान आसुरी शक्तियोंको युद्ध करनेके लिए उनकी निर्गुण स्तरकी काली शक्तिका उपयोग करना पडता है । इस प्रक्रियामें उनकी शक्तिका व्यय अधिक मात्रामंे होता है । परिणामस्वरूप असुरोंका नाश कर, देवता विजयी होते हैं । यही कारण है कि, इस दिनको `विजयादशमी’ कहते हैं ।

इस दिन विष्णुतत्त्वका निर्गुण स्तरका कार्य अधिक मात्रामें होता है । इसलिए त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामजीने इसी दिन बलशाली रावणका नाश कर सीतामाताको अर्थात श्रीविष्णुजीकी शक्तिको असुरोंके बंधनसे मुक्त किया ।

४. दशहरेका त्यौहार मनानेकी पद्धति

इस दिन सीमोल्लंघन, शमीपूजन, अपराजितापूजन एवं शस्त्रपूजन, ये चार धार्मिक कृतियां की जाती हैं ।

५. सीमोल्लंघन

परंपराके अनुसार ग्रामदेवता को पालकीमे बिठाकर अपराह्न काल अर्थात दिनके तीसरे प्रहरमें दोपहर ४ के उपरांत गांवकी सीमाके बाहर ईशान्य दिशाकी ओर जाते हैं । जहां शमी और अश्मंतकका वृक्ष होता है, वहां रुक जाते हैं । विजया दशमी का दुसरा विधि है ।

६. शमीपूजन अथवा अश्मंतक वृक्षका पूजन

शमीवृक्ष यदि उपलब्ध हो, तो उसका और शमीवृक्ष यदि उपलब्ध न हो, तो अश्मंतक वृक्ष का पूजन करते हैं और शमी वृक्षसे प्रार्थना करते हैं ।

शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका ।
धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।।
करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया ।
तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते ।।

इसका अर्थ है : शमी पापोंका शमन करती है । शमीके कांटे तांबेके रंगके अर्थात लाल होते  हैं । शमी रामकी स्तुति करती है तथा अर्जुनके बाणोंको भी धारण करती हैं । हे शमी, रामने आपकी पूजा की है । मैं यथाकाल विजययात्रापर निकलूंगा । आप मेरी यात्राको निर्विघ्न एवं सुखमय बनाइए ।
प्रार्थनाके उपरांत वृक्षका पूजन करते हैं । अश्मंतक वृक्ष हो, तो उसका पूजन करते समय प्रार्थना करते हैं ।

अश्मन्तक महावृक्ष महादोषनिवारण ।
इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशनम् ।।

अर्थात हे अश्मंतक महावृक्ष, आप महादोषोंका निवारण करते हैं । मुझे मेरे मित्रोंका दर्शन करवाइए और मेरे शत्रुका नाश कीजिए । मेरी शत्रुताका विनाश किजिए तथा मेरा और मेरे शुभचिंतकोंको कल्याण किजिए ।

इस प्रकार प्रार्थनाके उपरांत वृक्षके नीचे चावल, पूगीफल अर्थात सुपारी एवं स्वर्ण अथवा तांबेकी मुद्रा अथवा सिक्के रखते हैं । तदुपरांत वृक्षकी परिक्रमा करते हैं ।

७. अपराजितादेवीका पूजन

  • पूजास्थलपर अष्टदलकी आकृति बनाते हैं । 

इस अष्टदलका मध्यबिंदु `भूगर्भबिंदु’ अर्थात देवीके `अपराजिता’ रूपकी उत्पत्तिबिंदु का प्रतीक है, तथा अष्टदलके आठबिंदु, अष्टपाल देवताओंका प्रतीक है । 

  • इस अष्टदलके मध्यबिंदुपर `अपराजिता’ देवीकी मूर्तिकी स्थापना कर उसका पूजन करते हैं ।

‘अपराजिता’ श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । पूजन करनेसे देवीका यह रूप पृथ्वीतत्त्वके आधारसे भूगर्भसे प्रकट होकर, पृथ्वीके जीवोंके लिए कार्य करता है । अष्टदलपर आरूढ हुआ यह त्रिशूलधारी रूप शिवके संयोगसे, दिक्पाल एवं ग्रामदेवताकी सहायतासे आसुरी शक्तियोंका नाश करता है ।

  • पूजनके उपरांत इस मंत्रका उच्चारण कर शत्रुनाश एवं सबके कल्याणके लिए प्रार्थना करते हैं ।
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।
अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।

इसका अर्थ है, गलेमें विचित्र हार एवं कमरपर जगमगाती स्वर्ण करधनी अर्थात मेखला धारण करनेवाली, भक्तोंके कल्याणके लिए सदैव तत्पर रहनेवाली, हे अपराजितादेवी ! मुझे विजयी कीजिए । कुछ स्थानोंपर अपराजितादेवीका पूजन सीमोल्लंघनके लिए जानेसे पूर्व भी करते हैं । शमीपत्र तेजका उत्तम संवर्धक है । इसलिए शमी वृक्षके निकट अपराजितादेवीका पूजन करनेसे शमीपत्रमें पूजनद्वारा प्रकट हुई शक्ति संजोई रहती है । शक्तितत्त्वसे शमीपत्रको घरमें रखनेसे इन तरंगोंका लाभ वर्षभर प्राप्त करना जीवोंके लिए संभव होता है । कुछ स्थानोंपर नवरात्रीकालमें रामलिलाका आयोजन किया जाता है । जिसमें प्रभु रामजीके जीवनपर आधारीत लोकनाट्य प्रस्तुत किया जाता है । दशहरेकी दिन तथा लोकनाट्यके अंतमें रावण एवं कंुभकर्णकी पटाखोंसे बनी बडी बडी प्रतिमाओंका दहन किया जाता है ।

८. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें क्यो देते है तथा शस्त्रपूजन के परिणाम

  • `अपराजिता’ शक्तितत्त्वकी उत्पत्ति पृथ्वीके भूगर्भबिंदु से होती है ।
  • अपराजिता देवीसे प्रार्थना कर देवीका आवाहन करनेपर भक्तकी प्रार्थनानुसार अष्टदलके मध्यमें स्थित भूगर्भबिंदुमें देवीतत्त्व कार्यरत होता है ।
  • उस समय उनके स्वागतके लिए अष्टपाल देवताओंका भी उस स्थानपर आगमन होता है । अपराजिताकी उत्पत्तिसे मारक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं ।
  • अष्टपालों द्वारा अष्टदलकी आठबिंदुओंसे लालिमायुक्त प्रकाश-तरंगोंके माध्यमसे ये मारक तरंगें अष्टदिशाओंमें प्रक्षेपित होती हैं ।

सर्व आठों बिंदुओंसे शक्तिकी मारक तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । ये तरंगें विशिष्ट कोनोंमें एकत्रित होकर, रज-तमात्मक शक्तिका नाश करती हैं । पृथ्वीपर सर्व जीव निर्विघ्न रूपसे जीवन जी सकें, इस हेतु वायुमंडलकी शुद्धि भी करती हैं । पूजनके उपरांत शमी अथवा अश्मंतक वृक्षोंके मूलके समीपकी कुछ मिट्टी एवं उन वृक्षोंके पत्ते घर लाते हैं ।

९. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण

विजयादशमीके दिन अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देवताको अर्पित करते हैं । आपसी प्रेमभाव निर्माण करनेके लिए अश्मंतकके पत्ते शुभचिंतकोंको सोनेके रूपमें देकर उनके कल्याणकी प्रार्थना करते हैं । तदुपरांत ज्येष्ठोंको नमस्कार कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । अश्मंतकके पत्तोंमें ईश्वरीय तत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । इन पत्तोंमें १० प्रतिशत रामतत्त्व एवं शिवतत्त्व भी विद्यमान होता है । ये पत्ते देनेसे पत्तोंद्वारा व्यक्तिको शिवकी शक्ति भी प्राप्त होती है । ये पत्ते व्यक्तिमें तेजतत्त्वकी सहायतासे क्षात्रवृत्तिका भी संवर्धन करते हैं। 
इस संदर्भमें एक बोधप्रद अनुभूति ।

ऐसा भान हुआ कि, प.पू.  महाराजजीद्वारा विजयके प्रतीकके रूपमें दिया गया अश्मंतकका पत्ता धर्मकार्यमें शक्ति प्रदान कर रहा है ।
२००८ में धर्मप्रसार अच्छे ढंगसे करने हेतु हमने एक कार्यशालाका आयोजन किया था । इस कार्यशालामें ५० सत्संगसेवक सम्मिलित हुए थे । कार्यशालाके दूसरे दिन प.पू. महाराजजीने मेरे हाथपर सनातन संस्थाके संस्थापक प.पू. डॉ. द्वारा उन्हें दिया गया अश्मंतकका पत्ता रखा और क्या अनुभव होता है, इसपर ध्यान देनेके लिए कहा । उस समय मुझे प्रतीत हुआ कि वह पत्ता धर्मकार्यके लिए शक्ति प्रदान कर रहा है । उस अश्मंतक पत्तेको देखकर कार्यशालाकी सफलताके बारेमें मैं आश्वस्त हो गई । उसके उपरांत कार्यशाला समाप्त होनेतक उस पत्तेसे सत्संगसेवकोंको शक्ति मिलती रही । तब अश्मंतकके पत्तेका महत्त्व मेरी समझमें आया एवं संतोंकी कृपा देखकर मन भर आया ।  – सौ. पिंळे

१०. दशहरेके दिन शस्त्रपूजन करनेके परिणाम

दशहरा व्यक्तिमें क्षात्रभावका संवर्धन करता है । शस्त्रोंका पूजन क्षात्रतेज जागृत करनेके प्रतीकस्वरूप किया जाता है इस दिन शस्त्रपूजन कर देवताओंकी मारक शक्तिका आवाहन किया जाता है । पूजनमें रखे शस्त्रोंद्वारा वायुमंडलमें क्षात्रतेजका प्रक्षेपण होकर व्यक्तिका क्षात्रभाव जागृत होता है । इस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनमें नित्य उपयोगमे लाई जानेवाली वस्तुओंका शस्त्रके रूपमें पूजन करता है ।

शस्त्रपूजनके संदर्भमें एक साधकको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

शस्त्रके रूपमें पूजे गए उपकरणोंके स्थानपर देवता दिखाई देना और वातावरणमें चैतन्य एवं प्रसन्नताका भान होना
दो अक्टूबर दो सहस्र छहको दशहरेके दिन सुबह मैंने संगणक, प्रिंटर, मोडेम एवं अन्य उपकरणोंकी भावपूर्ण स्वच्छता की । तदुपरांत शस्त्रपूजन के रूपमें उनकी पूजा की । पूजा के उपरांत मैंने सभी उपकरणोंसे प्रार्थना की, `आप हमारी साधनामें सहायक हैं अर्थात आप हमारे गुरुबंधु हैं । मैं आपके प्रति कृतज्ञ हूं । हमारी साधनामें आपका सहयोग सदैव मिलता रहे ।’ उसके उपरांत आरती करते समय उन शस्त्ररूपी उपकरणोंके स्थानपर मुझे देवता खडे दिखाई दिए । उस समय मेरा भाव जागृत हुआ । संपूर्ण वातावरणमें चैतन्य एवं प्रसन्नताका भान हो रहा था । मुझे अंदरसे शांत लग रहा था । – श्री. राजेंद्र । 

११. विजयादशमीके निमित्त विशेष संदेश

हिंदुओं, आजीवन धर्मके लिए कार्य करनेका निश्चय कीजिए !

हिंदु उत्साहसे विजयादशमी अर्थात दशहरा मनाते हैं । ऐसेमें कितने हिंदुओंको यह भान रहता है कि, यह त्यौहार शौर्य एवं पराक्रमका प्रतीक है ? इस भानके अभावके कारण ही हिंदुधर्म और हिंदुओंकी स्थिति आज इतनी दयनीय हो गई है । इस देशमें हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेकी न कोई व्यवस्था है और न ही इस बातका किसीको कोई खेद है । हिंदुधर्मको समझे बिना कोई भी इसकी निंदा करता है । अत्यंत खेदजनक है कि, अधिकांश हिंदु इस अपने धर्मपर हो रहे आघातोंसे अनभिज्ञ हैं ।
ऐसी विषम परिस्थितिमें भी धर्मके लिए कुछ करना कठिन तो अवश्य है, परंतु असंभव नहीं । हिंदु समिति और सनातन संस्था जैसी संस्थाएं समाजको साथ लेकर हिंदुओंको जागृत करनेका प्रयास कर रही हैं । धर्मजागृति सभा, राष्ट्र एवं धर्म विषयक प्रदर्शनी, `श्री शंकरा’ समान दूरचित्रवाहिनीपर नियमितरूपसे प्रसारित किए जानेवाले धर्मसत्संग, इंटरनेटपर विभिन्न संकेतस्थल तथा `प्रभात’ जैसे समाचार-पत्र, इन सर्व प्रसारमाध्यमोंद्वारा निरंतर उद्बोधन किया जा रहा है । विगत केवल सात-आठ वर्षोंमें यह कार्य अंतरराष्ट्रियस्तरपर पहुंच गया है ।

प्रत्येक हिंदु दशहरेके अवसरपर यथासंभव धर्मकार्य, धर्माचरण आरंभ करे ।  विजयादशमीके इस शुभ अवसरपर इसके लिए कृतसंकल्प होकर यदि हम कुछ करें, तब ही विजयादशमीका पर्व सार्थक होगा । अंतमें श्रीगुरुचरणोंमें यही प्रार्थना है कि, धर्महितार्थ कुछ करनेकी इच्छा रखनेवाले प्रत्येक हिंदुको दैवी शक्तियोंकी सहायता प्राप्त हो ।

आईए हम भी श्री गुरुचरणोंमें प्रार्थना करे कि, प.पू. डॉ. जीके संदेशके अनुसार सभी हिंदुओंको धर्मकार्यके रूपमें अधिकाधिक धर्मप्रसार करनेकी प्रेरणा मिले । सभी दर्शकोंको तथा हिंदु बंधु-भगिनियों को दशहरेकी शुभकामनाएं देकर इस विषयको यहीं विराम देते हैं ।

 

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Navratri : Ghat Sthapana, Akhanda Deep tatha Devata Sthapana (Hindi)

सारणी –

१.घट – स्थापना विधि
२. अखंडदीप – स्थापनाकी विधि
३. देवताओंकी स्थापनाविधि
४. श्री दुर्गादेवी आवाहन विधि
५. श्री दुर्गादेवीका षोडशोपचार पूजन
६. श्री दुर्गादेवीकी अंगपूजा


।। श्री दुर्गादेव्यै नम: ।।

नवरात्री: घट स्थापना, अखंडदीप तथा देवता स्थापना (हिंदी)

               नवरात्री: घट स्थापना

१. घट – स्थापना विधि :     

पूजास्थलपर खेतकी मिट्टी लाकर चौकोर स्थान बनाते हैं । उसे वेदी कहते हैं । 

  • वेदी पर गेहूं डालकर उसपर कलश रखते हैं ।
  • कलशमें पवित्र नदियोंका आवाहन कर जल भरते हैं ।
  • चंदन, दूर्वा, अक्षत, सुपारी एवं स्वर्णमुद्रा अथवा सिक्के इत्यादि वस्तुएं कलशमें डालते हैं ।
  • इनके साथ ही हीरा, नीलमणि, पन्ना, माणिक एवं मोती ये पंचरत्न भी कलशमें रखते हैं ।
  • पल, बरगद, आम, जामुन तथा औैदुंबर ऐसे पांच पवित्र वृक्षोंके पत्ते भी कलशमें रखते हैं ।
  • कलशपर पूर्णपात्र अर्थात चावलसे भरा ताम्रपात्र रखते हैं ।
  • वरुणपूजनके उपरांत वेदीपर कलशके चारों ओर मिट्टी फैलाते हैं ।
  • इसके उपरांत मिट्टीपर विविध प्रकारके अनाज डालते हैं ।
  • उसपर पर्जन्यके प्रतीकस्वरूप जलका छिडकाव करते हैं । अनाजसे  प्रार्थना करते हैं ।
  • तदुपरांत देवी आवाहनके लिए कुंभ अर्थात कलशसे प्रार्थना करते हैं, `देव-दानवोंद्वारा किए समुद्रमंथनसे उत्पन्न हे कुंभ, आपके जलमें स्वयं श्रीविष्णु, शंकर, सर्व देवता, पितरोंसहित विश्वेदेव सर्व वास करते हैं । श्री देवीमांके आवाहनके लिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं ।’

घट स्थापना करनेके पश्चात नवरात्रि व्रतका और एक महत्त्वपूर्ण अंग है ।

२. अखंडदीप – स्थापनाकी विधि :

  • जिस स्थानपर दीपकी स्थापना करनी है, उस भूमिपर वास्तुपुरुषका आवाहन करते हैं ।
  • जिस स्थानपर दीपकी स्थापना करनी है, उस भूमिपर जलका त्रिकोण बनाते हैं । उस त्रिकोणपर चंदन, फूल एवं अक्षत अर्पण कर
  • दीपके लिए आधारयंत्र बनाते हैं ।
  • तदुपरांत उसपर दीपकी स्थापना करते हैं ।
  • दीप प्रज्वलित करते हैं ।
  • इस प्रज्वलित दीपका पंचोपचार पूजन करते हैं ।
  • नवरात्रि कात निर्विघ्न रूपसे संपन्न होनेके लिए दीपसे प्रार्थना करते हैं ।   

कुलकी परंपराके अनुसार इस दीपमें घी अथवा तेलका उपयोग करते हैं । कुछ परिवारोंमें घीके एवं तेलके दोनोंही प्रकारके दीप जलाए रखनेकी परंपरा है ।

३. देवताओंकी स्थापनाविधि :

कलशसे प्रार्थना करनेके उपरांत पूर्णपात्रमें सर्व देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन करते हैं । तदुपरांत आवाहनमें कोई त्रुटि रह गई हो, तो क्षमा मांगते हैं । क्षमायाचना करनेसे पूजकका अहं घटता है तथा देवताओंकी कृपा भी अधिक होती है ।

४. श्री दुर्गादेवी आवाहन विधि :

  • कलशपर रखे पूर्णपात्र पर पीला वस्त्र बिछाते हैं ।
  • उसपर कुमकुमसे नवार्णव यंत्रकी आकृति बनाते हैं ।

मूर्ति, यंत्र और मंत्र ये किसी भी देवताके तीन स्वरूप होते हैं। ये अनुक्रमानुसार अधिक सूक्ष्म होते हैं । नवरात्रिमें किए जानेवाले देवीपूजनकी यही विशेषता है कि, इसमें मूर्ति, यंत्र और मंत्र इन तीनोंका उपयोग किया जाता है ।

  • सर्वप्रथम पूर्णपात्रमें बनाए नवार्णव यंत्रकी आकृतिके मध्यमें देवीकी मूर्ति रखते हैं ।
  • मूर्तिकी दार्इं ओर श्री महाकालीके तथा बार्इं ओर श्री महासरस्वतीके प्रतीकस्वरूप एक-एक सुपारी रखते हैं ।
  • मूर्तिके चारों ओर देवीके नौ रूपोंके प्रतीकस्वरूप नौ सुपारियां रखते हैं ।
  • अब देवीकी मूर्तिमें श्री महालक्ष्मीका आवाहन करनेके लिए मंत्रोच्चारणके साथ अक्षत अर्पित करते हैं ।
  • मूर्तिकी दार्इं  और बार्इं ओर रखी सुपारियोंपर अक्षत अर्पण कर क्रमके अनुसार श्री महाकाली और श्री महासरस्वतीका आवाहन करते हैं ।
  • मूर्तिकी दार्इं ओर रखी सुपारिपर अक्षत अर्पण कर श्री महाकाली और बार्इं ओर रखी सुपारिपर श्री महासरस्वतीका आवाहन करते हैं
  • तत्पश्चात नौ सुपारियोंपर अक्षत अर्पण कर नवदुर्गाके नौ रूपोंका आवाहन करते हैं तथा इनका वंदन करते हैं ।

५. श्री दुर्गादेवीका षोडशोपचार पूजन :

अब देवीका षोडशोपचार पूजन किया जाता है । इसमें सर्वप्रथम देवीको अर्घ्य, पाद्य, आचमन आदि उपचार अर्पण करते हैं । इसके उपरांत देवीको पंचामृत स्नान कराते हैं । तदुपरांत शुद्ध जल, चंदनमिश्रित जल, सुगंधित द्रव्यमिश्रित जलसे स्नान कराते हैं और अंतमें श्री देवीमांको शुद्ध जलसे महाभिषेक कराते   हैं । उसकेउपरांत देवीको कपासके वस्त्र, चंदन, सुहागद्रव्य अर्थात हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध अर्पण करते हैं । काजल लगाते हैं । मंगलसूत्र, हरी चूडियां इत्यादि सुहागके अलंकार, फूल, दूर्वा, बिल्वपत्र एवं फूलोंकी माला अर्पण करते हैं ।

६. श्री दुर्गादेवीकी अंगपूजा :

श्री दुर्गादेवीके शरीरका प्रत्येक अंग शक्तिका स्रोत है, इसीलिए श्री दुर्गादेवीके प्रत्येक अंगपर अक्षत अर्पित कर अंगपूजा की जाती है ।

  • श्री दुर्गादेवीकी पूजा चरणोंकी ओरसे आरंभ की जाती है। घुटनेकी अर्थात् श्री देवीमंगलाकी । कमरकी अर्थात् श्री देवी भद्रकालीकी, दाइंर् बाहूकी अर्थात् श्री महागौरीकी पूजा । बाएं बाहूकी अर्थात् श्री वैष्णवीकी पूजा । कंठकी अर्थात् श्री स्कंधमाताकी, मुखकी अर्थात् श्री सिंहवाहिनीकी पूजा ।

किसी व्यक्तिद्वारा धारण किया वस्त्र यद्यपि उस व्यक्तिका स्वरूप नहीं होता; फिर भी उन वस्त्रोंका व्यवहारमें कुछ तो महत्त्व होता ही है । उसी प्रकार दिशा, राशि, ऋतु जैसे ९ आवरण यद्यपि शक्तिका पूर्ण अथवा सत्य स्वरूप नहीं हैं; परंतु शक्तिके कार्यमें मानवी जीवनसे संबंधित इन सबका एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; परंतु मानवी जीवनसे संबंधित शक्तिके कार्यमें  इन सबका एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । इन्ही आवरणोंकी पूजा की जाती है ।

  • देवीको महानैवेद्य निवेदित करते हैं ।
  • देवीकी आरती करते हैं ।
  • प्रार्थना करते हैं ।
  • कलशपर प्रतिदिन एक अथवा कुलपरंपराके अनुसार प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो इस प्रकार माला बांधते हैं । माला इस प्रकार बांधें, कि वह कलशमें पहुंच सके । नई माला चढाते समय पहले दिनकी माला नहीं उतारी जाती ।

 

Navratri kise kehate hai ? (Hindi)


।। ॐ श्री दुर्गादेव्यै नमः ।।

Sri Durga Devi

Sri Durga Devi

 

आश्विन मास कहते ही स्मरण होता है, हिंदुओंद्वारा मनाया जानेवाला एक महत्त्वपूर्ण एवं सबका उत्साह वर्धित करनेवाले व्रत एवं उत्सव, त्यौहार दुर्गापूजाका अर्थात नवरात्रिका, महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गाका । जिनकी स्तुति एवं नमन कुछ इस प्रकार किया गया है……   

          सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

          शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।

अर्थात सर्व मंगलवस्तुओंमें मंगलरूप, कल्याणदायिनी, सर्व पुरुषार्थ साध्य करानेवाली, शरणागतोंका रक्षण करनेवाली हे त्रिनयने, गौरी, नारायणी ! आपको मेरा नमस्कार है ।
 
मंगलरूप त्रिनयना नारायणी अर्थात मां जगदंबा ! जिन्हें आदिशक्ति, पराशक्ति, महामाया, काली, त्रिपुरसुंदरी इत्यादि विविध नामोंसे सभी जानते हैं । इनमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती ये शक्तिके प्रमुख तीन रूप हैं । हम सब जानते हैं कि, कालके उदरमें सर्व पदार्थमात्रका विनाश होता ही है । जहांपर गति नहीं वहां निर्मितिकी प्रक्रियाही थम जाती है । ऐसा होते हुए भी अष्टदिशाओंके अंतर्गत जगत् की उत्पत्ति, लालन-पालन एवं संवर्धनके लिए एक प्रकारकी शक्ति कार्यरत होती है । इसीको आद्याशक्ति कहते हैं । उत्पत्ति-स्थिति-लय यह शक्तिका गुणधर्म ही है । शक्तिका उद्गम स्पंदनोंके रूपमें होता है । उत्पत्ति-स्थिति-लयका चक्र निरंतर चलता ही रहता है ।   

१. श्री दुर्गासप्तशतिके अनुसार श्री दुर्गादेवीके तीन प्रमुख तीन रूप हैं । 

१. महासरस्वती, जो ‘गति’ तत्त्वकी प्रतीक है ।
२. महालक्ष्मी, जो ‘दिक्’ अर्थात ‘दिशा’ तत्त्वकी प्रतीक है ।
३. महाकाली जो ‘काल’ तत्त्वका प्रतीक है ।

ऐसी जगत्का पालन करनेवाली जगत्पालिनी, जगदोद्धारिणी मां शक्तिकी उपासना हिंदु धर्ममें वर्ष में दो बार नवरात्रिके रूपमें, विशेष रूपसे की जाती है ।
१. वासंतिक नवरात्रि : यह उत्सव चैत्र शुद्ध शुक्ल प्रतिपदासे चैत्र शुक्ल शुद्ध नवमी तक मनाया जाता है ।
२. शारदीय नवरात्रि : यह उत्सव आश्विन शुक्ल शुद्धप्रतिपदासे आश्विन शुक्ल शुद्ध नवमी तक मनाया जाता है ।

२. ‘नवरात्रि’ किसे कहते हैं ?

नव अर्थात ब्रह्मांडमें विद्यमान ईश्वरके प्रत्यक्ष कार्य करनेवाले आदिशक्तिस्वरूपका तत्त्व । स्थूल जगत्की दृष्टिसे रात्रिका अर्थ है, प्रत्यक्ष तेजतत्त्वात्मक प्रकाशका अभाव । तथा ब्रह्मांडकी दृष्टिसे रात्रिका अर्थ है, संपूर्ण ब्रह्मांडमें ईश्वरीय तेजका प्रक्षेपण करनेवाले मूल पुरुषतत्त्वका अकार्यरत होनेका कालावधि । जिस कालावधिमें ब्रह्मांडमें शिवतत्त्वककी मात्रा, कार्य एवं उसकी कार्यमात्रा घटती है और उसके शिवतत्त्वके कार्यकारी स्वरूपकी अर्थात शक्तिकी मात्रा का कार्य एवं उसके कार्य की मात्रा अधिक होती है, उस कालावधिको ‘नवरात्रि’ कहते हैं ।

मातृभाव एवं वात्सल्यभावकी अनुभूति देनेवाली, प्रीति एवं व्यापकता इन गुणोंके सर्वोच्च स्तरके दर्शन करानेवाली जगदोद्धारिणी, जगतका पालन करनेवाली इस शक्तिकी उपासना, व्रत एवं उत्सवके रूपमें की जाती है ।

३. नवरात्रिका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

नवरात्रिके नौ दिनोंमें प्रत्येक दिन बढते क्रमसे आदिशक्तिका नया रूप सप्तपातालसे पृथ्वीपर आनेवाली कष्टदायक तरंगोंका समूल उच्चाटन अर्थात समूल नाश करता है । इन नौ दिनोंमें ब्रह्मांडमें अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित कष्टदायक तरंगें एवं आदिशक्तिकी मारक चैतन्यमय तरंगोंमें युद्ध होता है । इस समय ब्रह्मांडका वातावरण तप्त होता है । श्री दुर्गादेवीके शस्त्रोंके तेजकी ज्वालासमान चमक अतिवेगसे सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियोंपर आक्रमण करती है ।

इस प्रकार इस नवरात्रिके नौंवे दिनसे अगले वर्षके प्रथम दिन तक देवीका निर्गुण तारक तत्त्व कार्यरत रहता है।  ।।

अनेक परिवारोंमें नवरात्रीका व्रत कुलाचारके स्वरूपमें किया जाता है । आश्विनकी शुक्ल प्रतिपदासे इस व्रतका प्रारंभ होता है ।
१. नवरात्रिकी कालावधिमें व्यष्टि स्तरपर व्रतके रूपमें उपासना करनेसे व्यक्तिको २० प्रतिशत लाभ होता है ।
२. सामूहिक स्तरपर अर्थात समष्टि स्तरपर उत्सवके रूपमें उपासना करनेसे व्यक्तिको ३० प्रतिशत लाभ होता है ।
३. केवल उपासनाकी कृतिके समान व्रत करनेसे व्यक्तिको १० प्रतिशत लाभ होता है ।
४. लगन एवं भावसहित उपासना करनेसे ४० प्रतिशत लाभ होता है ।
नवरात्रिके प्रथम दिन घटकी स्थापना की जाती है । कुछ परिवारोंमें घटस्थापनाके साथ मालाबंधन भी करते हैं। घटस्थापनाकी पूजनविधि घटस्थापनाके लिए किया जानेवाला पूर्वायोजन पूर्वप्रबंध संभव हो, तो उपासक या पूजकने यह पूजन सपत्निक करना चाहिए । घटस्थापनाकी विधिमें देवीका षोडशोपचार पूजन किया जाता है ।

घटस्थापनाकी विधीके साथ कुछ विशेष उपचार भी किए जाते हैं । पूजाविधिके आरंभमें आचमन, प्राणायाम, देशकालकथन करते हैं । तदुपरांत व्रतका संकल्प करते हैं ।

संकल्पके उपरांत श्री महागणपतिपू्जन करते हैं । इस पूजनमें महागणपतिके प्रतीकस्वरूप पूगीफल अर्थात सुपारी अथवा नारियल रखते हैं ।

व्रतविधानमें कोई बाधा न आए और देवीतत्त्व पूजास्थलपर अधिकाधिक मात्रामें आकृष्ट हो सवेंâ, इसलिए यह पूजन किया जाता है । श्री महागणपतिपूजनके उपरांत आसनशुद्धिकरते समय भूमिपर जलसे त्रिकोण बनाकर उसपर पिढा रखते है । तदुपरांत शरिरशुद्धिके लिए षडङ्न्यास किया जाता है और तत्पश्चात पूजासामग्रीकी शुद्धि करते हैं ।