Janmadin tithi anusar hi kyon manaye? (Hindi Article)

जन्मदिन तिथिके अनुसार ही क्‍यों मनाए?

janmadin

सारणी –


१. भारतीय संस्कृति अनुसार जनमदिन मनाएं !

आजकल हिंदू पश्चिमी संस्कृतिके समक्ष घुटने टेक रहे हैं । परिणामस्वरूप हमारी धार्मिक कृतियोंपर पश्चिमी संस्कृतिका अत्यधिक प्रभाव पडा है । ऐसी कृतियोंसे ईश्वरीय चैतन्य तो प्राप्त होता नहीं; साथ ही ये कृतियां आध्यात्मिक दृष्टिसे हानिकारक होती हैं । धार्मिक कृतियोंमें निश्चितरूपसे सूक्ष्ममें क्या प्रक्रिया होती है, यह समझनेसे उन कृतियोंकी सत्यतापर विश्वास होता है व स्वाभाविक ही धर्माचरणके प्रति श्रद्धाके दृढ़ होनेमें सहायता मिलती है ।

२. तिथिके अनुसार जन्मदिन मनानेका महत्त्व

जिस तिथिपर हमारा जन्म होता है, उस तिथिके स्पंदन हमारे स्पंदनोंसे सर्वाधिक मेल खाते हैं । इसलिए उस तिथिपर परिजनों एवं हितचिंतकोंद्वारा हमें दी गई शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद सर्वाधिक फलित होते हैं । इसलिए जन्मदिन तिथिनुसार मनाना चाहिए ।

२.१. अभ्यंगस्नान करना

जन्मदिनपर अभ्यंगस्नान वस्त्र पहने हुए ही करें । स्नान करते समय ऐसा भाव रखें कि, `स्नानका जल निर्मल व शुद्ध गंगाके रूपमें हमारे शरीरपर प्रवाहित हो रहा है और उससे हमारे देह एवं अंत:करणकी शुद्धि हो रही है ऐसा भाव रखें ।

  • स्नानके पश्चात् नए वस्त्र परिधान करें । नए वसन (वस्त्र) परिधान करना, अर्थात् अभ्यंगस्नानके माध्यमसे अपनी देहकी चारों ओर ईश्वरीय चैतन्यका प्रभामंडल (चैतन्यमय संरक्षककवच) तैयार करना ।
  • माता-पिता एवं अन्य ज्येष्ठ व्यक्तियोंको प्रणाम करें । ज्येष्ठोंके प्रति आदरभाव उत्पन्न होनेसे उसके मनकी मलिनता नष्ट होती है ।
  • कुलदेवताका अभिषेक करें अथवा उनकी भावपूर्ण पूजा करें ।

२.२. औक्षण (आरती उतारना)

  • जिसका जन्मदिन है, उसका औक्षण करें । `औक्षण’ की कृतिसे जीवकी सूक्ष्मदेहकी शुद्धिमें सहायता मिलती है । औक्षण करवानेवाला एवं करनेवाला, दोनोंमें यह भाव रहे कि, `एक दूसरेके माध्यमसे प्रत्यक्ष ईश्वर ही यह कृतिस्वरूप कार्यद्वारा हमें आशीर्वाद दे रहे हैं’ । कुलदेवता अथवा उपास्यदेवताका स्मरण कर अक्षत तीन बार जीवके सिरपर डालनेसे आशीर्वादात्मक तरंगोंका स्रोत जीवकी संपूर्ण देहमें संक्रमित होता है । इस प्रक्रियासे दोनों जीवोंकी देहसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगोंके कारण वायुमंडलकी शुद्धि होती है और जन्मदिवसपर पधारे अन्य जीवोंको भी इस सात्त्विकताका लाभ मिलता है ।
  • जिसका जन्मदिन है, उसे कुछ भेंटवस्तु देनी चाहिए । इस विषयमें आगे दिए अनुसार दृष्टिकोण रखें । छोटे बालकको प्रोत्साहित करनेके लिए भेंट दें, बडोंको भेंट देनेमें कर्त्तापन न रखें । अपेक्षारहित दान करनेसे हम कुछ कालोपरांत उसके बारेमें भूल भी जाते हैं । दानके विषयमें कर्त्तापन अथवा अपेक्षा रखनेसे लेन-देनका हिसाब निर्माण होता है । दान अथवा भेंट स्वीकारनेवाला व्यक्ति यदि ऐसा भाव रखे कि, `यह ईश्वरकृपासे मिला प्रसाद है’, तो लेन-देनका हिसाब निर्माण नहीं होता ।
  • जन्मदिनपर जिन वस्त्रोंको धारण कर स्नान किया जाता है, उन वस्त्रोंका स्वयं उपयोग न कर अपेक्षारहित किसीको दान देना चाहिए । दान सदैव `सत्पात्रे दानम्’ हो, इस हेतु भिखारी इत्यादिको देनेकी अपेक्षा ईश्वरके उपासक अथवा राष्ट्र व धर्महितके लिए कार्य करनेवालोंको देना पुण्यदायी होता है ।

    पूर्वकालमें सर्व जीव साधनारत थे; इसलिए उनकी वृत्ति सात्त्विक थी । उनके द्वारा दान किए गए वस्त्र परिधान करनेवाले जीवको उपरोक्तानुसार लाभ होता था । त्रेतायुगमें गुरुकुलमें अपने गुरुके जन्मदिनपर उन्हें स्नान करवाकर, उनके द्वारा दिए गए वस्त्रोंका उपयोग करने योग्य बनना, शिष्य-धर्मका प्रतीक माना जाता था ।

३. जन्मदिनपर कुछ निषिद्ध कृतियां व उनका आधारभूत शास्त्र

शास्त्रके अनुसार कुछ निषिद्ध कृतियां: जन्मदिनपर नाखून एवं बाल काटना, वाहनसे यात्रा करना, कलह, हिंसाकर्म, अभक्ष्यभक्षण (न खाने योग्य पदार्थ खाना), अपेयपान (न पीने योग्य पदार्थ पीना), स्त्रीसंपर्क (स्त्रीके साथ शारीरिक संबंध) इत्यादि कृतियोंसे प्रयत्नपूर्वक बचें ।

जन्मदिनपर प्रज्वलित किए गए दीपकको न बुझाएं: दीपककी ज्योतिकी तुलना जीवके शरीरके पंचप्राणोंकी ऊर्जापर आधारित स्थूल कार्यसे की गई है । जीवकी देहके पंचप्राणोंका कार्य समाप्त होकर जीवकी प्राणशक्तिके पतन व उसकी जीवनज्योत शांत होनेका प्रतीक है दीपकका बुझना ।’ प्रज्वलित दीपकका बुझना आकस्मिक मृत्यु, अर्थात् अपमृत्युसे संबंधित है; इस लिए इसे अशुभ माना गया है ।

जन्मदिनकी शुभकामनाएं रात्रिके १२ बजे न देकर सूर्योदय उपरांत देना:  पश्चिमी संस्कृतिका अनुकरण कर अनेक लोग जन्मदिनकी शुभकामनाएं रात्रि १२ बजे देते हैं । रात्रिके १२ बजे वातावरणमें रज-तम कणोंकी मात्रा अधिक होती है, इसीलिए उस समय दी गई शुभकामनाएं फलदायी नहीं होती हैंण। हिंदू संस्कृतिके अनुसार दिन सूर्योदयसे आरंभ होता है । यह समय ऋषि-मुनियोंकी साधनाका समय है, इसलिए वातावरणमें सात्त्विकता अधिक होती है और सूर्योदयके पश्चात् दी गई शुभकामनाएं फलदायी सिद्ध होती हैं । अत: जन्मदिनकी शुभकामनाएं सूर्योदयके पश्चात् ही दें ।

मोमबत्ती जलाकर जन्मदिन न मनाना:  पश्चिमी संस्कृतिका अंधानुकरण कर अनेक लोग मोमबत्तियां जलाकर एवं केक काटकर जन्मदिन मनाते हैं । मोमबत्ती तमोगुणी होती है; उसे जलानेसे कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं । उसी प्रकार हिंदू धर्ममें `ज्योत बुझाने’ की कृति अशुभ एवं त्यागने योग्य मानी गई है । इसीलिए जन्मदिनपर मोमबत्ती जलानेके उपरांत उसे जानबूझकर न बुझाएं ।

केक काटकर जन्मदिन न मनाना: `केकपर छुरी चलाना’ अशुभ क्रियाका प्रतीक है । इसलिए जन्मदिनके शुभ अवसरपर ऐसी कृतिसे आगेकी पीढीपर कुसंस्कार होते हैं । आरतीके पश्चात् आकृष्ट ईश्वरीय चैतन्यको ग्रहण करते समय ऐसे विधिकर्म करना, उस चैतन्यमें कष्टदायक स्पंदनोंद्वारा बाधा उत्पन्न करनेके समान है । किसी भी शुभावसरपर जानबूझकर इस प्रकारकी लयकारी विधि करना धर्मविघातक प्रवृत्तिका लक्षण है ।


 

Devatapujan (Hindi Article)

Devpujan

सारणी –


१. देवतापूजन

 `आजकलके तनावपूर्ण जीवनमें प्रतिदिन देवतापूजनके लिए समय कैसे निकालें ?’, ऐसी नकारात्मक मानसिकता अनेक लोगोंमें दिखाई देती है । जैसे हम घर आए अतिथिका स्वागत आदरपूर्वक करते हैं, उसी प्रकार भगवानका करें । देवताका आवाहन करना, उन्हें बैठनेके लिए आसन देना, उन्हें पैर धोनेके लिए जल देना, इस प्रकार क्रमानुसार सोलह उपचारोंके माध्यमसे विधिवत भावपूर्ण धर्माचरण धर्मशास्त्रमें सिखाया गया है । षोडशोपचार पूजनके सोलह उपचारोंमेंसे – गंध लगाना, पुष्प चढाना, धूप दिखाना, दीपसे आरती उतारना व नैवेद्य (भोग) निवेदित करना, इन पांच उपचारोंको `पंचोपचार’ कहते हैं । सोलह उपचारोंद्वारा देवताका पूजन करना संभव न हो, तो पांच उपचारोंसे करना भी उपयुक्त है । षोडशोपचार पूजनमें आवाहनात्मक उपचार अर्थात् पूर्वार्ध तथा समापनात्मक बिदाई अर्थात् उत्तरार्ध ।

२. देवतापूजनकी पद्धति

आवाहन (पुकारना): देवताका ध्यान करें । `ध्यान’ अर्थात् देवताका वर्णन व स्तुति । `देवता अपने अंग, परिवार, आयुध और शक्तिसहित पधारें व मूर्तिमें प्रतिष्ठित होकर हमारी पूजा ग्रहण करें’, इस हेतु संपूर्ण शरणागतभावसे देवतासे प्रार्थना करना, यानी `आवाहन’ करना । आवाहनके समय हाथमें गंध, अक्षत एवं तुलसीदल अथवा पुष्प लें । तदुपरांत देवताका नाम लेकर अंतमें `नम:’ बोलते हुए उन्हें गंध, अक्षत, तुलसीदल अथवा पुष्प अर्पित कर हाथ जोडें । उदा. श्री गणपतिके लिए `श्री गणपतये नम:’ । श्री दुर्गादेवीके लिए `श्री दुर्गादेव्यै नम: ।

आसन देना: आसनके रूपमें विशिष्ट देवताको प्रिय पुष्प-पत्र आदि (उदा. श्रीगणेशजीको दूर्वा, शिवजीको बेल, श्रीविष्णुको तुलसी) अथवा अक्षत अर्पित करें ।

चरण धोनेके लिए जल देना: देवताको ताम्रपात्र (तामडी) में रखकर उनपर आचमनीसे जल चढाएं ।

हाथ धोनेके लिए जल देना: आचमनीमें जल लेकर उसमें गंध, अक्षत व पुष्प डालकर, उसे देवतापर चढाएं ।

आचमन (कुल्ला करनेके लिए जल देना): आचमनीमें कर्पूर-मिश्रित जल लेकर, उसे देवताको अर्पित करने के लिए ताम्रपात्र में छोडें ।

स्नान (देवतापर जल चढाना): धातुकी मूर्ति, यंत्र, शालग्राम इत्यादि हों, तो उनपर जल चढाएं । मिट्टीकी मूर्ति हो, तो पुष्प अथवा तुलसीदलसे केवल जल छिडकें । चित्र हो, तो पहले उसे सूखे वस्त्रसे पोंछ लें । तदुपरांत गीले कपडेसे, पुन: सूखे कपडेसे पोंछें ।

वस्त्र: देवताओंको कपासके दो वस्त्र अर्पित करें । एक वस्त्र देवताके गलेमें अलंकारके समान पहनाएं, तो दूसरा देवताके चरणोंमें रखें ।

उपवस्त्र अथवा यज्ञोपवीत (जनेऊ) देना: पुरुषदेवताओंको यज्ञोपवीत (उपवस्त्र) अर्पित करें ।

गंध (चंदन) लगाना: प्रथम देवताको अनामिकासे गंध लगाएं । इसके उपरांत दाहिने हाथके अंगूठे व अनामिकाके बीच चुटकीभर लेकर, पहले हलदी, फिर कुमकुम देवताके चरणोंमें चढाएं ।

पुष्प-पत्र (पल्लव) चढाना: विशिष्ट देवताको उनका तत्त्व अधिक मात्रामें आकृष्ट करनेवाले विशिष्ट पुष्प-पत्र चढाएं, उदा. शिवजीको बेल व गणेशजीको लाल पुष्प आदि । पुष्प देवताके सिरपर चढानेकी अपेक्षा चरणोंमें अर्पित करें, पुष्पका डंठल देवताकी ओर और मुख अपनी दिशामें रहे ।

धूप दिखाना: देवताको धूप दिखाते समय उसे हाथसे न फैलाएं । विशिष्ट देवताका तत्त्व अधिक मात्रामें आकृष्ट कर पाने हेतु, उनके सम्मुख विशिष्ट सुगंधकी उदबत्तियां जलाएं, उदा. शिवजीको हिना व श्री लक्ष्मीदेवीको गुलाब । साधारणत: दो उदबत्तीसे आरती उतारें ।

दीपसे आरती उतारना: घडीके कांटोंकी दिशामें देवताकी दीप-आरती तीन बार धीमी गतिसे उतारें । साथ ही, बाएं हाथसे घंटी बजाएं ।

२.१ नैवेद्य निवेदित करना

  • देवताको नैवेद्यके रूपमें दूध-शक्कर (दुग्ध-शर्करा), मिश्री, शक्कर-नारियल, गुड-नारियल, फल, खीर, भोजन इत्यादि पदार्थोंमेंसे अपने लिए जो संभव हो, वह समर्पित करें । नैवेद्य केलेके पत्तेपर परोसें । नमक न परोसें ।
  • मिर्च, नमक और तेलका प्रयोग कम करें और घी जैसे सात्त्विक पदार्थोंका प्रयोग अधिक करें ।
  • देवतासे प्रार्थना कर देवताके सामने धरतीपर जलसे चौकोर मंडल बनाएं व उसपर नैवेद्यका पत्ता (या थाली) रखें । नैवेद्यके पत्तेका डंठल देवताकी ओर व अग्रभाग अपनी ओर हो ।
  • नैवेद्यके पत्तेके चारों ओर तुलसीके दो पत्तोंसे जलसे गोलाकार मंडल बनाएं । तदुपरांत तुलसीदलसे पत्तोंसे नैवेद्यपर जल प्रोक्षण कर उसमेंसे एक पत्ता नैवेद्यपर (अन्नपर) रखें व दूसरा देवताके चरणोंमें चढाएं ।
  • कर्मकांडके स्तरकी पद्धति : बाएं हाथका अंगूठा बाईं आंखपर व बाएं हाथकी अनामिका दाईं आंखपर रखकर आंखें मूंद लें और `ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ।।’, पंचप्राणोंसे संबंधित इस मंत्रका उच्चारण करते हुए नैवेद्यकी सुगंधको दाहिने हाथकी पांचों उंगलियोंके सिरोंसे देवताकी ओर दिशा दें ।
  • उसके उपरांत `नैवेद्यमध्येपानीयं समर्पयामि ।’ बोलते हुए दाहिने हाथसे ताम्रपात्रमें थोडा जल छोडें व पुन: `ॐ प्राणाय…’, पंचप्राणोंसे संबंधित इस मंत्रका उच्चारण करें । उसके उपरांत `नैवेद्यम् समर्पयामि, उत्तरापोशनम् समर्पयामि, हस्तप्रक्षालनम् समर्पयामि, मुखप्रक्षालनम् समर्पयामि’ बोलते हुए दाहिने हाथसे ताम्रपात्रमें जल छोडें ।
  • नैवेद्य अर्पित करनेके उपरांत अंतमें देवताके सामने नारियल, दक्षिणा, तांबूल व सुपारी रखें । देवताकी दीप-आरती करें । तदुपरांत देवताकी कर्पूर आरती करें ।  देवताको मन:पूर्वक नमस्कार करें ।

नमस्कारके उपरांत देवताके चारों ओर परिक्रमा करें । परिक्रमाके लिए स्थान न हो तो अपने आसनपर ही तीन बार घूम जाएं ।

मंत्रपुष्पका उच्चारण कर, देवताको अक्षत अर्पित करें । पूजामें हमसे जाने-अनजानमें हुई गलतियों व कमियोंके लिए अंतमें देवतासे क्षमा मांगें और पूजाकी समाप्ति करें ।


 

Devalay mein darshan ki yogya paddhati (Hindi Article)

देवालयमें दर्शनकी योग्‍य पद्धति

सारणी –


१. देवालयमें दर्शन कैसे करें ?

 `देवालय’ अर्थात् जहां भगवानका साक्षात् वास है । दर्शनार्थी देवालयमें इस श्रद्धासे जाते हैं कि, वहां उनकी प्रार्थना भगवानके चरणोंमें अर्पित होती है और उन्हें मन:शांति अनुभव होती है ।

२. देवालयमें दर्शनकी योग्य पद्धति

२.१ देवालयमें प्रवेशेसे पहले आवश्यक कृतियां

  • शरीरपर धारण की हुई चर्मकी वस्तुएं उतार दें ।देवालयके प्रांगणमें जूते-चप्पल पहनकर न जाएं; उन्हें देवालयक्षेत्रके बाहर ही उतारें । देवालयके प्रांगण अथवा देवालयके बाहर जूते-चप्पल उतारने ही पडें, तो देवताकी दाहिनी ओर उतारें ।
  • देवालयमें व्यवस्था हो, तो पैर धो लें । हाथमें जल लेकर `अपवित्र: पवित्रो वा’, ऐसा तीन बार बोलते हुए अपने संपूर्ण शरीरपर तीन बार जल छिडकें ।
  • किसी देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व पुरुषोंद्वारा अंगरखा (शर्ट) उतारकर रखनेकी पद्धति हो, तो उस पद्धतिका पालन करें । (यद्यपि यह व्यावहारिक रूपसे उचित न लगे, तब भी देवालयकी सात्त्विकता बनाए रखने हेतु कुछ स्थानोंपर ऐसी पद्धति है ।)
  • देवालयमें दर्शन हेतु जाते समय पुरुष भक्तजनोंको टोपी तथा स्त्रीभक्तोंको पल्लूसे अपने सिरको ढकना चाहिए ।
  • देवालयके प्रवेशद्वार व गरुडध्वजको नमस्कार करें । प्रांगणसे देवालयके कलशका दर्शन करें एवं कलशको नमस्कार करें ।

२.२ देवालयके प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाना

प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाते समय हाथ नमस्कारकी मुद्रामें हों । (दोनों हाथ अनाहतचक्रके स्थानपर जुडे हुए व शरीरसे कुछ अंतरपर हों ।) भाव ऐसा हो कि, `अपने परमश्रद्धेय श्री गुरुदेव या आराध्य देवतासे प्रत्यक्ष भेंट करने जा रहे हैं’ ।

२.३ देवालयकी सीढियां चढना

देवालयकी सीढियां चढते समय दाहिने हाथकी उंगलियोंसे सीढीको स्पर्श कर हाथ अपने आज्ञाचक्रपर रखें ।

२.४ सभामंडपमें प्रवेश करना

  • सभामंडपमें प्रवेश करनेसे पूर्व सर्वप्रथम सभामंडपके द्वारको दूरसे नमस्कार करें ।
  • सभामंडपकी सीढियां चढते समय दाहिने हाथकी उंगलियोंसे सीढीको स्पर्श कर हाथ आज्ञाचक्रपर रखें ।
  • सभामंडपमें पदार्पण करते समय प्रार्थना करें, `हे प्रभु, आपकी मूर्तिसे प्रक्षेपित चैतन्यका मुझे अधिकाधिक लाभ होने दें’ ।

२.५ सभामंडपसे गर्भगृहकी ओर जानेकी पद्धति

सभामंडपकी बाईं ओरसे चलते हुए गर्भगृहतक जाएं । (देवताके दर्शनके उपरांत लौटते समय सभामंडपकी दाहिनी ओरसे आएं ।)

२.६ देवता-दर्शनसे पूर्व आवश्यक कृति

  • जहांतक संभव हो घंटानाद न करें । यदि नाद करना ही हो तो, अति मंदस्वर में ऐसे भावसे करें मानो `घंटानादसे अपने आराध्य देवताको जगा रहे हों ।
  • शिवालयमें पिंडीके दर्शन करनेसे पूर्व नंदीके दोनों सींगोंको हाथ लगाकर नंदीके दर्शन करें ।
  • साधारणत: गर्भगृहमें जानेकी मनाही होती है; परंतु कुछ देवालयोंके गर्भगृहमें प्रवेशकी सुविधा है । ऐसेमें गर्भगृहके प्रवेशद्वारपर श्री गणपति हों, तो उन्हें नमस्कार करनेके उपरांत ही गर्भगृहमें प्रवेश करें ।

३. देवताकी मूर्तिके दर्शन करते समय आवश्यक कृतियां

  • देवताके दर्शन करते समय, देवताकी मूर्ति व उनके सामने प्रतिष्ठित कच्छपकी प्रतिमाके बीच तथा शिवालयमें पिंडी व उसके सामने प्रतिष्ठित नंदीकी प्रतिमाके बीच खडे न रहें और न ही बैठें । कच्छप अथवा नंदीकी प्रतिमा तथा देवताकी मूर्ति अथवा पिंडीको जोडनेवाली रेखाकी एक ओर खडे रहें ।
  • देवताके दर्शन करते समय पहले चरणमें देवताके चरणोंपर दृष्टि टिकाए, नतमस्तक होकर प्रार्थना करें । दूसरे चरणमें देवताके वक्षपर, अर्थात् अनाहतचक्रपर मन एकाग्र कर देवताको आर्त्तभावसे पुकारें । दर्शनके तीसरे अर्थात् अंतिम चरणमें देवताके नेत्रोंकी ओर देखें व उनके रूपको अपने नेत्रोंमें बसाएं ।
  • नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढकें (सिरसे टोपी हटाएं); परंतु स्त्रियां सिर ढकें ।
  • देवताको जो वस्तु अर्पित करनी हो, वह देवताके ऊपर न डालें; अपितु उनके चरणोंमें अर्पित करें । यदि मूर्ति दूर हो, तो `मूर्तिके चरणोंमें अर्पित कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर उसे देवताके सामने रखी थालीमें रखें ।

४. देवताकी परिक्रमा लगाना

  • परिक्रमा आरंभ करनेसे पूर्व गर्भगृहके बाह्य भागमें बाईं ओर खडे रहें । (परिक्रमा पूर्ण करनेपर दाहिनी ओर खडे होकर देवताके दर्शन करें ।)
  • देवताकी परिक्रमा करनेसे पहले देवतासे प्रार्थना करें, `हे ….. (देवताका नाम) परिक्रमामें प्रत्येक पगके साथ आपकी कृपासे मेरे पूर्वजन्मोंके पापोंका शमन हो व आपसे प्रक्षेपित चैतन्यको मैं अधिकाधिक ग्रहण कर सकूं ।’
  • परिक्रमा मध्यम गतिसे एवं नामजप करते हुए लगाएं ।
  • परिक्रमाके दौरान गर्भगृहको बाहरसे स्पर्श न करें । देवताकी मूर्तिके पीछे रुककर नमस्कार करें ।
  • साधारणत: देवताओंकी परिक्रमा सम संख्यामें (उदा. २, ४, ६) एवं देवीकी परिक्रमा विषम संख्यामें (उदा. १, ३, ५) करनी चाहिए । यदि अधिक परिक्रमाएं करनी हों, तो न्यूनतम परिक्रमाकी गुणाकार संख्यामें करें (उदा. न्यूनतम संख्या २ है, तो ४, ६, ८, १० परिक्रमाएं कर सकते हैं) ।
  • प्रत्येक परिक्रमाके उपरांत देवताको नमन करके ही अगली परिक्रमा लगाएं ।
  • परिक्रमा पूर्ण होनेपर शरणागतभावसे देवताको नमस्कार करें व तदुपरांत मानसप्रार्थना करें ।

५. तीर्थ व प्रसाद ग्रहण करना

  • परिक्रमाके उपरांत दाहिने हाथसे तीर्थ प्राशन कर, वही हाथ आंखों, ब्रह्मरंध्र, मस्तक व गर्दनपर लगाएं ।
  • प्रसादको दाहिने हाथमें लेते हुए नम्रतासे झुकें ।
  • देवालयमें ही बैठकर कुछ समय नामजप करें व तदुपरांत प्रसाद ग्रहण करें ।
  • खडे होकर देवताको मानस नमस्कार करें ।
  • स्वच्छ वस्त्रमें लपेटकर प्रसाद घर ले जाएं ।

 

Devataki purna golakar arati hi kyon utari jati hai? (Hindi Article)

देवताकी पूर्ण गोलाकार आरती ही क्यों उतारी जाती है?

सारणी –


१. देवताके प्रति भक्तिभाव जगानेका सरल मार्ग है ‘आरती’

उपासकके हृदयमें भक्तिदीपको तेजोमय बनानेका व देवतासे कृपाशीर्वाद ग्रहण करनेका सुलभ शुभावसर है `आरती’ । संतोंद्वारा रचित आरतियोंको गानेसे ये उद्देश्य नि:संशय सफल होते हैं । कोई कृति हमारे अंत:करणसे तब तब होती है, जब उसका महत्त्व हमारे मनपर अंकित हो । इसी उद्देश्यसे आरतीके अंतर्गत विविध कृतियोंका आधारभूत अध्यात्मशास्त्र यहां दे रहे ।

२. प्रात: व सायंकाल, दोनों समय आरती क्यों करनी चाहिए ?

`सूर्योदयके समय ब्रह्मांडमें देवताओंकी  तरंगोंका आगमन होता है । जीवको इनका स्वागत आरतीके माध्यमसे करना चाहिए । सूर्यास्तके समय राजसी-तामसी तरंगोंके उच्चाटन हेतु जीवको आरतीके माध्यमसे देवताओंकी आराधना करनी चाहिए । इससे जीवकी देहके आस पास सुरक्षाकवच निर्माण होता है।

३. आरतीकी संपूर्ण कृति

१. आरतीके पूर्व तीन बार शंख बजाएं ।

  • शंख बजाना प्रारंभ करते समय गर्दन उठाकर, ऊर्ध्व दिशाकी ओर मन एकाग्र कर शंख बजाएं ।
  • शंख बजाते समय ऐसा भाव रखें कि, `ईश्वरीय तरंगोंको जागृत कर रहे हैं’ ।
  • हो सके तो पहले श्वाससे छाती भरकर, एक ही श्वासमें शंख बजाएं ।
  • शंखको धीमे स्वरमें आरंभ कर, स्वर बढाते जाएं व उसे वहींपर छोड दें ।

२. शंखनाद हो जानेपर आरतीगायन आरंभ करें ।

  • इस भावसे आरती करें कि, `ईश्वर प्रत्यक्ष मेरे समक्ष हैं व मैं उन्हें पुकार रहा हूं’ ।
  • अर्थको ध्यानमें रखते हुए आरती करें ।
  • अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे शब्दका योग्य उच्चारण करें ।

३. आरती गाते समय ताली बजाएं । घंटी मधुर स्वरमें बजाएं व उसका नाद एक लयमें हो । साथमें मंजीरा, झांझ, हारमोनियम व तबला जैसे वाद्योंका भी तालबद्ध प्रयोग करें ।

४. आरती गाते हुए देवताकी आरती उतारें ।

  • आरतीकी थालीको देवताके सामने घडीकी सइयोंकी दिशामें पूर्ण गोलाकार घुमाएं ।
  • देवताके सिरके ऊपरसे आरती उतारनेकी अपेक्षा, उनके अनाहतचक्रसे आज्ञाचक्रतक उतारें ।

५. आरती उतारनेपर `कर्पूरगौरं करुणावतारं’ मंत्रका उच्चारण करते हुए कर्पूर-आरती करें ।

६. कर्पूर-आरतीके उपरांत देवताओंके नामका जयघोष करें ।

७. आरती ग्रहण करें, अर्थात् दोनों हथेलियोंको ज्योतिपर रखकर, तदुपरांत दाहिना हाथ सिरसे लेकर पीछे गर्दनतक घुमाएं ।

८. आरती ग्रहण करनेके उपरांत `त्वमेव माता, पिता त्वमेव’ प्रार्थना बोलें ।

९. प्रार्थनाके उपरांत मंत्रपुष्पांजलि बोलें ।

१०. मंत्रपुष्पांजलिके उपरांत देवताके चरणोंमें फूल व अक्षत अर्पण करें ।

११. तदुपरांत, देवताकी परिक्रमा लगाना सुविधाजनक न हो, तो एक जगह खडे होकर, चारों ओर घूमते हुए तीन बार परिक्रमा लगाएं ।

१२. परिक्रमाके पश्चात् देवताको शरणागत भावसे नमस्कार करें व मानस-प्रार्थना करें ।

१३. तत्पश्चात् तीर्थ प्राशन कर, भ्रूमध्यपर (उदबत्ती अर्थात् अगरबत्तीकी) विभूति लगाएं ।

३.१ देवताकी पूर्ण गोलाकार आरती ही क्यों उतारें?

 `पंचारतीके समय आरतीकी थालीको पूर्ण गोलाकार घुमाएं । इससे ज्योतिसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें गोलाकार पद्धतिसे गतिमान होती हैं । आरती गानेवाले जीवके चारों ओर इन तरंगोंका कवच निर्माण होता है । इस कवचको `तरंग कवच’ कहते हैं । जीवका ईश्वरके प्रति भाव जितना अधिक होगा, उतना ही यह कवच अधिक समयतक बना रहेगा । इससे जीवके देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है और वह ब्रह्मांडकी ईश्वरीय तरंगोंको अधिक मात्रामें ग्रहण कर सकता है ।

३.२ कर्पूर-आरतीके पश्चात् देवताओंके नाम का जयघोष क्यों करना चाहिए?

 `उद्घोष’ यानी जीवकी नाभिसे निकली आर्त्त पुकार । संपूर्ण आरतीसे जो साध्य नहीं होता, वह एक आर्त्त भावसे किए जयघोषसे साध्य हो जाता है ।

३.३ विधियुक्त आरती ग्रहण करनेका अर्थ क्या है?

 देवताओंकी आरती उतारनेके पश्चात् दोनों हथेलियोंको दीपकी ज्योतिपर कुछ क्षण रखकर उनका स्पर्श अपने मस्तक, कान, नाक, आंखें, मुख, छाती, पेट, पेटका निचला भाग, घुटने व पैरोंपर करें । इसे `विधियुक्त आरती ग्रहण करना’ कहते हैं ।’

४. आरतीके उपरांतकी कृतियां

  • आरतीके उपरांत `त्वमेव माता, पिता त्वमेव’ प्रार्थना करें इससे साधकका देवता व गुरुके प्रति शरणागतिका भाव बढता है और  मंत्रपुष्पांजलिके उच्चारण उपरांत देवताके चरणोंमें फूल व अक्षत चढाएं ।
  • आरतीके उपरांत देवताकी परिक्रमा लगाएं । सुविधाजनक न हो, तो एक ही स्थानपर खडे होकर अपने चारों ओर परिक्रमा लगाएं । आरतीके उपरांत वातावरणकी सात्त्विकता बढती है । अपने चारों ओर परिक्रमा लगानेसे वातावरणमें फैली सत्त्वतरंगें अपने चारों ओर गोल घूमने लगती हैं ।

परिक्रमा लगानेंके पश्चात् नमस्कार करनेसे क्या लाभ होता है?

 देवताको नमस्कार करनेसे देहकी चारों ओर बने कवचमें देवतासे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें दीर्घकालतक टिकी रहती हैं ।