Shiv (Hindi Article)

शिव

Shiv

सारणी –


१. शिवपूजाकी विशेषताएं

हालाहल प्राशन कर विश्वको विनाशसे बचानेवाले, देव व दानव दानोंद्वारा उपास्य, सहज प्रसन्न होनेवाले, भूतोंके स्वामी, नृत्य व नाट्य कलाओंके प्रवर्तक, योगमार्गके प्रणेता इत्यादि विशेषताओंसे युक्त महादेव अर्थात् भगवान शिव जगत्पिताके गौरान्विवित किए जाते हैं । वेद, शास्त्र, पुराण तथा तंत्रग्रंथोंमें शिवजीके गौरवगान, लीला व उपदेशका वर्णन है । फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । इस व्रतके प्रधान देवता हैं, शिव । इस दिन संपूर्ण भारतवर्षमें शिवजीकी उपासना की जाती है । अधिकांश लोगोंको शिवजीसे संबंधित जो थोडी-बहुत जानकारी है, वह बचपनमें पढी या सुनी गई कहानियोंद्वारा होती है । किसी भी देवता व उनके पूजनसे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त होनेपर विश्वास बढता है । शिवभक्तोंके लिए शिवजीसे संबंधित जानकारी यहां दे रहे हैं । यदि देवतासे संबंधित जानकारीके साथ-साथ अध्यात्मशास्त्रकी जानकारी भी हो, तो साधना अधिक योग्य ढंगसे हो सकती है । इसके लिए जिज्ञासु अध्यात्मशास्त्र विषयक ग्रंथों व सत्संगोंका लाभ ले सकते हैं ।

२. महाशिवरात्रि व्रतकी पद्धति व विधि

फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको महाशिवरात्रिका व्रत रखा जाता है । इस तिथिपर एकभुक्त रहें । चतुर्दशीके दिन प्रात:काल व्रतका संकल्प करें । सायंकाल शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । शिवजीका ध्यान करें । तदुपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ (यहां भव यानी शिव) तर्पण करें । नाममंत्र जपते हुए शिवजीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर चढाए गए फूल लेकर अपने मस्तकपर रखें और शिवजीसे क्षमायाचना करें । चतुर्दशीपर रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रत्येक पूजाके मंत्र भिन्न होते हैं; मंत्रों सहित अर्घ्य दें । नृत्य, गीत, कथाश्रवण आदि करते हुए जागरण करें । प्रात:काल स्नान कर, पुन: शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए ब्राह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें ।

३. महाशिवरात्रिपर शिवजीका नामजप करनेका महत्त्व

अनेक संतोंने कहा है, कलियुगमें नामजप ही सर्वोत्तम साधना है । नामजप हम उठते-बैठते, जागते-सोते, आते-जाते भी कर सकते हैं । विश्वमें बढे हुए तमोगुणसे रक्षा होने हेतु तथा शिवरात्रिपर वातावरणमें प्रक्षेपित शिवतत्त्व आकर्षित करनेके लिए महाशिवरात्रिपर शिवजीका `ॐ नम: शिवाय’ यह नामजप अधिकाधिक करें ।

४. शिवपूजाकी विशेषताएं

पूजाके लिए कहां बैठें ?: आम तौरपर शिवमंदिरमें पूजा एवं साधना करनेवाले श्रद्धालुगण शिवजीकी तरंगोंको सीधे अपने शरीरपर नहीं लेते; क्योंकि इससे कष्ट होता है । शिवजीके मंदिरमें अरघाके स्रोतके ठीक सामने न बैठकर, एक ओर बैठते हैं; क्योंकि शिवकी तरंगें सामनेकी ओरसे न निकलकर, अरघाके स्रोतसे बाहर निकलती हैं ।

  • शिवपिंडीको ठंडे जल, दूध अथवा पंचामृतसे स्नान करवाते हैं ।
  • शिवपूजामें हलदी-कुमकुमका प्रयोग नहीं करते; भस्म तथा श्वेत अक्षतका प्रयोग करते हैं ।
  • पिंडीके दर्शनीय भागपर भस्मकी तीन समांतर धारियां बनाते हैं या फिर समांतर धारियां खींचकर उनके मध्य एक वर्तुल बनाते हैं । उसे शिवाक्ष अथवा योगाक्ष भी कहते हैं । शिवाक्षपर चावल, क्वचित गेहूं एवं श्वेत पुष्प चढाते हैं ।
  • शिवपिंडीकी पूर्ण प्रदक्षिणा न कर, अर्धचंद्राकृति प्रदक्षिणा करते हैं । अरघेके स्रोतको लांघते नहीं, क्योंकि वहां शक्तिस्रोत होता है । उसे लांघते समय पैर फैलते हैं, जिससे वीर्यनिर्मिति व पांच अंतस्थ वायुओंपर विपरीत परिणाम होता है ।

रुद्राक्ष: भगवान शिव निरंतर समाधिमें होते हैं, इस कारण उनका कार्य सदैव सूक्ष्मसे ही जारी रहता है । यह कार्य अधिक सुव्यवस्थित हो, इसके लिए भगवान शिवने भी रुद्राक्षकी माला शरीरपर धारण की है । इसी कारण शिव-उपासनामें रुद्राक्षका असाधारण महत्त्व है ।’ किसी भी देवताका जप करने हेतु रुद्राक्षमालाका प्रयोग किया जा सकता है । रुद्राक्षमालाको गलेमें या अन्यत्र धारण कर किया गया जप, बिना रुद्राक्षमाला धारण किए गए जपसे हजार गुना लाभदायक होता है । इसी प्रकार अन्य किसी मालासे जप करनेकी तुलनामें रुद्राक्षकी मालासे जप करनेपर दस हजार गुना अधिक लाभ होता है ।

५. असली रुद्राक्ष कैसे पहचानें ?

  असली रुद्राक्ष नकली रुद्राक्ष
१. आकार मछली समान चपटा गोल
२. रंग (आकाशकी लालिमा समान) पक्‍का पानीमें धुल जाता है
३. पानीमें डालनेपर सीधे नीचे जाता है तैरता है अथवा हिलते-
डुलते नीचे जाता है
४. आर-पार छिद्र होता है सुईसे करना पडता है
५. तांबेके बर्तनमें अथवा पानीमें
     डालनेपर गोल-गोल घूमना
होता है नहीं
६. कुछ समय बाद कीट लगना नहीं लगते लगते हैं
७. मूल्‍य (सन्‌ १९९७ में) रु. ४,००० से
४०,०००
रु. २० से २००
८. कौनसी तरंगें ग्रहण करता है? सम (सत्त्‍व)       –

 

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Shriramraksha stotra ke nitya pathan se kya labh hota hai? (Hindi Article)

श्रीरामरक्षास्तोत्रके नित्‍य पठन से क्‍या लाभ होता है?

Shri Ram

सारणी –


१. श्रीरामनवमी

श्री विष्णुके सातवें अवतार श्रीरामके जन्म प्रीत्यर्थ श्री रामनवमी मनाते हैं । चैत्र शुक्ल नवमीको रामनवमी कहते हैं । इस वर्ष रामनवमी ३ अप्रैलको है । अनेक राममंदिरोंमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर नौ दिनतक यह उत्सव मनाया जाता है । रामायणके पारायण, कथाकीर्तन तथा राममूर्तिको विविध शृंगार कर, यह उत्सव मनाया जाता है । नवमीकी दोपहरको रामजन्मका कीर्तन होता है । मध्यान्हकालमें, कुंची (छोटे बच्चेके सिरपर बांधा जानेवाला एक वस्त्र । यह वस्त्र पीठतक होता है ।) धारण किया हुआ एक नारियल पालनेमें रखकर उस पालनेको हिलाते हैं व भक्तगण उसपर गुलाल तथा फूलोंका वर्षाव करते हैं । कुछ स्थानोंपर पालनेमें नारियलकी अपेक्षा श्रीरामकी मूर्ति रखी जाती है । इस प्रसंगपर श्रीरामजन्मके गीत गाए जाते हैं । उसके उपरांत प्रभु श्रीरामके मूर्तिकी पूजा करते हैं व प्रसादके रूपमें सोंठ देते हैं । कुछ स्थानोंपर महाप्रसाद भी देते हैं । इस दिन प्रभु श्रीरामका व्रत करनेसे सर्व व्रतोंका फल प्राप्त होता है तथा सर्व पापोंका क्षालन होकर अंतमें उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।

२. श्रीरामरक्षास्तोत्रका पाठ

जिस स्तोत्रका पाठ करनेवालोंका श्रीरामद्वारा रक्षण होता है, वह स्तोत्र है श्रीरामरक्षास्तोत्र । भगवान शंकरने बुधकौशिक ऋषिको स्वप्नमें दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षा सुनाई और प्रात:काल उठनेपर उन्होंने वह लिख ली । यह स्तोत्र संस्कृत भाषामें है । इस स्तोत्रके नित्य पाठसे घरकी सर्व पीडा व भूतबाधा भी दूर होती है । जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होगा’, ऐसी फलश्रुति इस स्तोत्रमें बताई गई है ।

इसके अतिरिक्त इस स्तोत्रमें श्रीरामचंद्रका यथार्थ वर्णन, रामायणकी रूपरेखा, रामवंदन, रामभक्त स्तुति, पूर्वजोंको वंदन व उनकी स्तुति, रामनामकी महिमा इत्यादि विषय समाविष्ट हैं ।

३. श्रीरामनवमीका आध्यात्मिक महत्त्व

किसी भी देवता व अवतारों की जयंतीपर उनका तत्त्व पृथ्वीपर अधिक मात्रामें कार्यरत होता है । श्रीरामनवमीको श्रीरामतत्त्व अन्य दिनोंकी अपेक्षा १००० गुना कार्यरत होता है । श्रीराम नवमीपर `श्रीराम जय राम जय जय राम ।’  नामजप व श्रीरामकी भावपूर्ण उपासनासे श्रीरामतत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है ।

४. रामायण

`समस्य अयनं रामायणम् ।’ अयनका अर्थ है जाना, गति, मार्ग इत्यादि । जो परब्रह्म परमात्मारूप श्रीरामकी ओर ले जाती है, उसतक पहुंचनेके लिए जो प्रोत्साहित करती है अर्थात् गति देती है, जीवनका सच्चा मार्ग दर्शाती है, वही `रामायण’ है ।

४.१ कैकेयीने एक वरसे रामके लिए चौदह वर्षका वनवास व दूसरे वरसे भरतके लिए राज्य क्यों मांगा ?

भावार्थ : श्रावणकुमारके दादा धौम्य ऋषि थे व उसके माता-पिता रत्नावली व रत्नऋषि थे । रत्नऋषि नंदिग्रामके राजा अश्वपतिके राजपुरोहित थे । अश्वपति राजाकी कन्याका नाम कैकेयी था । रत्नऋषिने कैकेयीको सभी शास्त्र सिखाए और यह बताया कि यदि दशरथकी संतान हुई, तो वह संतान राजगद्दीपर नहीं बैठ पाएगी अथवा दशरथकी मृत्युके पश्चात् यदि चौदह वर्षके दौरान राजसिंहासनपर कोई संतान बैठ भी गई, तो रघुवंश नष्ट हो जाएगा । ऐसी होनीको टालने हेतु, आगे चलकर वसिष्ठ ऋषिने कैकेयीको दशरथसे दो वर मांगनेके लिए कहा । उनमेंसे एक वरसे उन्होंने रामको चौदह वर्षतक ही वनवास भेजा व दूसरे वरसे भरतको राज्य देनेके लिए कहा । उन्हें ज्ञात था कि रामके रहते भरत राजा बनना स्वीकार नहीं करेंगे यानी राजसिंहासनपर नहीं बैठेंगे । वसिष्ठ ऋषिके कहनेपर ही भरतने सिंहासनपर रामकी प्रतिमाकी अपेक्षा उनकी चरणपादुका स्थापित की । यदि प्रतिमा स्थापित की होती, तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध एकत्रित होनेके नियमसे जो परिणाम रामके सिंहासनपर बैठनेसे होता, वही उनकी प्रतिमा स्थापित करनेसे भी होता ।

५. रामराज्य

ऐसा नहीं कि, केवल श्रीराम ही सात्त्विक थे, अपितु प्रजा भी सात्त्विक थी; इसीलिए रामराज्यमें श्रीरामके दरबारमें एक भी शिकायत नहीं आई ।

पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, मन, चित्त, बुद्धि व अहंकारपर रामका (आत्मारामका) राज्य होना ही खरा रामराज्य है ।

६. प्रभु श्रीरामकी उपासनाके कुछ महत्त्‍वपूर्ण चरण

उपासनाकी कृति कृति कैसे करें?
१. श्रीरामपूजनसे पूर्व उपासक स्‍वयंको
    कौनसा तिलक कैसे लगाए?
विष्‍णु समान खडी दो रेखाओंका अथवा भरा
हुआ खडा तिलक मध्‍यमासे लगाए ।
२. श्रीरामको चंदन किस उंगलीसे लगाए? अनामिकासे
३. फूल चढाना  
    अ. फूल कौनसे चढाएं? जाही
    आ. संख्‍या कितनी हो? चार अथवा चार गुना
    इ. फूल चढानेकी पद्घति क्‍या हो? फूलोंका डंठल देवताकी ओर कर चढाएं ।
    ई. फूल कौनसे आकारमें चढाएं ? लंबगोलाकार (भरा हुआ अथवा खोखला)
४. उदबत्तीसे आरती उतारना  
    अ. तारक उपासनाके लिए
         किस गंधकी उदबत्ती?
चंदन, केवडा, चंपा, चमेली,
जाही व अंबर
    आ. मारक उपासनाके लिए
         किस गंधकी उदबत्ती?
हीना व दरबार
    इ. संख्‍या कितनी हो? दो
    ई. उतारनेकी पद्धति
         क्‍या हो?
दाहिने हाथकी तर्जनी व अंगूठेमें पकडकर
घडीकी सुईयोंकी दिशामें पूर्ण गोलाकार
पद्घतिसे तीन बार घुमाकर उतारें ।
५. इत्र किस गंधका अर्पण करें? जाही
६. श्रीरामकी कितनी परिक्रमा करें? कमसे कम तीन अथवा तीन गुना

 

Hanuman ko tel, sindur, ruike patte arpan kyon kiya jata hai? (Hindi Article)

हनुमानको तेल, सिंदूर, रुईके पत्ते इत्यादि अर्पण क्‍यों किया जाता है?

सारणी –


१. हनुमान जयंती

जब भी दास्यभक्तिका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देना हो, तो आज भी हनुमानकी रामभक्तिका स्मरण होता है । वे अपने प्रभुपर प्राण अर्पण करनेके लिए सदैव तैयार रहते । प्रभु रामकी सेवाकी तुलनामें शिवत्व व ब्रह्मत्वकी इच्छा भी उन्हें कौडीके मोलकी लगतीं । हनुमान सेवक व सैनिकका एक सुंदर सम्मिश्रण हैं ! हनुमान अर्थात शक्ति व भक्तिका संगम । अंजनीको भी दशरथकी रानियोंके समान तपश्चर्याद्वारा पायस (चावलकी खीर, जो यज्ञ-प्रसादके तौरपर बांटी जाती है) प्राप्त हुई थी व उसे खानेके उपरांत ही हनुमानका जन्म हुआ था । उस दिन चैत्रपूर्णिमा थी, जो `हनुमान जयंती’ के तौरपर मनाई जाती है ।

२. भक्तोंकी मन्नत पूर्ण करनेवाले

हनुमानको मन्नत पूर्ण करनेवाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत या मन्नत माननेवाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमानकी मूर्तिकी श्रद्धापूर्वक निर्धारित प्रदक्षिणा करते हैं । कई लोगोंको आश्चर्य होता है कि, जब किसी कन्याका विवाह न तय हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानकी उपासना करनेको कहा जाता है । मानसशास्त्रके आधारपर कुछ लोगोंकी यह गलतधारणा होती है कि सुंदर, बलवान पुरुषके साथ विवाह हो, इस कामनासे कन्याएं हनुमानकी उपासना करती हैं । वास्तविक कारण आगे दिए अनुसार है ।

३. अनिष्ट शक्तियोंका नियंत्रण करनेवाले हनुमान

हनुमान भूतोंके स्वामी माने जाते हैं । इसलिए यदि किसीको भूतबाधा हो, तो उस व्यक्तिको हनुमानमंदिर ले जाते हैं या हनुमानस्तोत्र बोलनेके लिए कहते हैं । जागृत कुंडलिनीके मार्गमें यदि कोई बाधा आ जाए, तो उसे दूर कर कुंडलिनीको योग्य दिशा देना । लगभग ३० %  व्यक्तियोंका विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियोंके प्रभावके कारण नहीं हो पाता । हनुमानकी उपासना करनेसे ये कष्ट दूर हो जाते हैं व विवाह संभव हो जाता है । (१० % व्यक्तियोंके विवाह, भावी वधू या वरके एक-दूसरेसे अवास्तविक अपेक्षाओंके कारण नहीं हो पाते । अपेक्षाओंको कम करनेपर विवाह संभव हो जाता है । ५० %  व्यक्तियोंका विवाह प्रारब्धके कारण नहीं हो पाता । यदि प्रारब्ध मंद या मध्यम हो, तो कुलदेवताकी उपासनाद्वारा प्रारब्धजनक अडचनें नष्ट हो जाती हैं व विवाह संभव हो जाता है । यदि प्रारब्ध तीव्र हो, तो केवल किसी संतकी कृपासे ही विवाह हो सकता है । शेष १० % व्यक्तियोंका विवाह अन्य आध्यात्मिक कारणोंसे नहीं हो पाता । ऐसी परिस्थितिमें कारणानुसार उपाय करने पडते हैं ।)

४. मानसशास्त्रमें निपुण व राजनीतिमें कुशल हनुमान

अनेक प्रसंगोंमें सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, बल्कि राम भी हनुमानकी सलाह लेते थे । जब विभीषण रावणको छोडकर रामकी शरण आया, तो अन्य सेनानियोंका मत था कि उसे अपने पक्षमें नहीं लिया जाए; परंतु हनुमानकी बात मानकर रामने उसे अपने पक्षमें ले लिया । लंकामें प्रथम ही भेंटमें सीताके मनमें अपने प्रति विश्वास निर्माण करना, शत्रुपक्षके पराभवके लिए लंकादहन करना, रामके आगमनसंबंधी भरतकी भावनाएं जानने हेतु रामद्वारा उन्हींको भेजा जाना, इन सभी प्रसंगोंसे हनुमानकी बुद्धिमत्ता व मानसशास्त्रमें निपुणता स्पष्ट होती है । लंकादहन कर उन्होंने रावणकी प्रजाका, रावणके सामर्थ्यपरसे विश्वास उठा दिया ।

५. जितेंद्रिय हनुमान

सीताको ढूढने जब हनुमान रावणके अंत:पुरमें गए, तो उस समय उनकी जो मन:स्थिति थी, वह उनके उच्च चरित्रका सूचक है । इस संदर्भमें वे स्वयं कहते हैं – `सर्व रावणपत्नियोंको नि:शंक लेटे हुए मैंने देखा तो सही, परंतु देखनेसे मेरे मनमें विकार उत्पन्न नहीं हुआ ।’  अनेक संतोंने ऐसे जितेंद्रिय हनुमानकी पूजा निश्चित कर, उनका आदर्श समाजके समाने रखा ।

६. प्रचलित पूजा

चैत्रपूर्णिमाके दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है । प्राय: शनिवार व मंगलवार हनुमानके दिन माने जाते हैं । इस दिन हनुमानको सिंदूर व तेल अर्पण करनेकी प्रथा है । कुछ जगह तो नारियल चढानेकी भी रूढि है । आध्यात्मिक उन्नतिके लिए वाममुखी (जिसका मुख बाईं ओर हो) हनुमान या दासहनुमानकी मूर्तिको पूजामें रखते हैं ।

दासहनुमान व वीरहनुमान: ये हनुमानके दो रूप हैं । दासहनुमान रामके आगे हाथ जोडे खडे रहते हैं । उनकी पूंछ जमीनपर रहती है । वीरहनुमान योद्धा मुद्रामें होते हैं । उनकी पूंछ उत्थित रहती है व दाहिना हाथ माथेकी ओर मुडा रहता है । कभी-कभी उनके पैरों तले राक्षसकी मूर्ति भी होती है । भूतावेश, जादू-टोना इत्यादि द्वारा कष्ट दूर करनेके लिए वीरहनुमानकी उपासना करते हैं ।

दक्षिणमुखी हनुमान: इस मूर्तिका मुख दक्षिणकी ओर होता है इसलिए इसे दक्षिणमुखी हनुमान कहते हैं । जादू-टोना, मंत्र-तंत्र इत्यादि प्रयोग प्रमुखत: ऐसी मूर्तिके सम्मुख ही किए जाते हैं । ऐसी मूर्तियां महाराष्ट्रमें मुंबई, पुणे, औरंगाबाद इत्यादि क्षेत्रोंमें व कर्नाटकमें बसवगुडी क्षेत्रमें पाई जाती हैं ।

७. हनुमानको तेल, सिंदूर, रुईके पत्ते इत्यादि अर्पण करनेका कारण

पूजाके दौरान देवताओंको जो वस्तु अर्पित की जाती है, वह वस्तु उन देवताओंको प्रिय है, ऐसा बालबोध भाषामें बताया जाता है, उदा. गणपतिको लाल फूल, शिवको बेल व विष्णुको तुलसी इत्यादि । उसके पश्चात् उस वस्तुके प्रिय होनेके संदर्भमें कथा सुनाई जाती है । प्रत्यक्षमें शिव, विष्णु, गणपति जैसे उच्च देवताओंकी कोई पसंद-नापसंद नहीं होती । देवताको विशेष वस्तु अर्पित करनेका तात्पर्य आगे दिए अनुसार है ।

पूजाका एक उद्देश्य यह है कि, पूजी जानेवाली मूर्तिमें चैतन्य निर्माण हो व उसका उपयोग हमारी आध्यात्मिक उन्नतिके लिए हो । यह चैतन्य निर्माण करने हेतु देवताको जो विशेष वस्तु अर्पित की जाती है, उस वस्तुमें देवताओंके महालोकतक फैले हुए पवित्रक (उस देवताके सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण) आकर्षित करनेकी क्षमता अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा अधिक होती है । तेल, सिंदूर, रुईके पत्तोंमें हनुमानके पवित्रक आकर्षित करनेकी क्षमता सर्वाधिक है; इसी करण हनुमानको यह सामग्री अर्पित करते हैं ।

८. शनिकी साढेसाती व हनुमानकी पूजा

यदि शनिकी साढेसाती हो, तो उस प्रभावको कम करने हेतु हनुमानकी पूजा करते हैं । यह विधि इस प्रकार है – एक कटोरीमें तेल लें व उसमें काली उडदके चौदह दाने डालकर, उस तेलमें अपना चेहरा देखें । उसके उपरांत यह तेल हनुमानको चढाएं । जो व्यक्ति बीमारीके कारण हनुमान मंदिर नहीं जा सकता, वह भी इस पद्धतिनुसार हनुमानकी पूजा कर सकता है ।  खरा तेली शनिवारके दिन तेल नहीं बेचता, क्योंकि जिस शक्तिके कष्टसे छुटकारा पानेके लिए कोई मनुष्य हनुमानपर तेल चढाता है, संभवत: वह शक्ति तेलीको भी कष्ट दे सकती है । इसलिए हनुमान मंदिरके बाहर बैठे तेल बेचनेवालोंसे तेल न खरीदकर घरसे ही तेल ले जाकर चढाएं ।


 

Shantividhi (Hindi Article)

शांतिविधी

सारणी –


१. शांति करना

वृद्धावस्थामें इंद्रियां अकार्यक्षम होने लगती हैं, उदा. कम सुनाई देना, कम दिखाई देना, विविध रोग निर्माण होना इत्यादि । देवताओंकी कृपासे इन व्याधियोंका परिहार हो एवं शेष आयु सुखपूर्वक बीते, इस हेतु शास्त्रके अनुसार ५० वर्षसे १०० वर्षकी आयुतक प्रत्येक ५ वर्षोपरांत शांतिविधि करनी चाहिए ।

शांति करनेका दिन: प्रत्येक शांति उस वर्षके प्रारंभदिनपर करें । वह दिन शुभ न हो, तो जन्मनक्षत्र-दिन अथवा उसके पश्चात् किसी भी शुभदिन करें ।

२. आयुके अनुसार शांतिके प्रकार, शांतिके प्रमुख देवता व हवनीय द्रव्य

शांतिका प्रकार कितनी आयु
होनेपर करते हैं?
 प्रमुख देवता हवनीय द्रव्‍य
१. वैष्‍णवी शांति ५० श्रीविष्‍णु समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
२. वारुणी शांति ५५ वरुण समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
३. उग्ररथ शांति ६० मार्कंडेय समिधा, आज्‍य,
चरु, दूर्वा व पायस
४. मृत्‍युंजय महारथी
     शांति
६५ मृत्‍युंजयमहारथ समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
५. भैमरथी शांति ७० भीमरथमृत्‍युंजयरुद्र घृताक्‍त तिल
६. ऐंद्री शांति ७५ इंद्रकौशिक समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
७. सहस्त्रचंद्रदर्शन
     शांति
८० चंद्र आज्‍य
८. रौद्री शांति ८५ रुद्र समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
९. सौरी शांति ९० कालस्‍वरूपसूर्य समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
१०. त्रैयंबक मृत्‍युंजय
      शांति
९५ मृत्‍युंजयरुद्र समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
११. महामृत्‍युंजय
      शांति
१०० महामृत्‍युंजय समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस

टीप १: आज्‍य अर्थात्‌ घी, चरु अर्थात्‌ पकाए गए चावल एवं पायस अर्थात्‌ पानीके प्रयोग बिना मात्र दूधमें पकाए गए चावल ।

टीप २: घीमें भिगोए गए तिल

२.१ सहस्रचंद्रदर्शन शांतिविधिका महत्त्व

शिव समाधिस्थ रहकर अधिकतर अप्रकट रहते हैं । शिवका तारक रूप यदाकदा प्रकट होता है । इससे तारक रूपसे चंद्रके समान चैतन्य एवं आनंद प्राप्त कर, जीवनमें शिवके आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिए सहस्रचंद्रदर्शन विधि की जाती है । शिवके आशीर्वाद प्राप्त होनेसे व्यक्तिकी ऐहिक व पारमार्थिक पीडा और क्लेश दूर होते हैं और उसकी आयुमें वृद्धि होती है । इस विधिमें केवल एक चंद्रका (सोमका) दर्शन न कर, सहस्र चंद्रोंकी शीतलता एवं चैतन्य प्रदान करनेकी क्षमतावाले सूक्ष्ममें चंद्रदेवताके दर्शन पाने हेतु यह विधि की जाती है । इस विधिसे प्राप्त चैतन्यसे व्यक्तिके लिंगदेहको केवल इस जन्ममें ही नहीं, अपितु आगामी जन्ममें भी चैतन्यका लाभ प्राप्त होता है ।

२.२ मृत्युके पश्चात् व्यक्तिकी लिंगदेहकी चारों ओर संरक्षक-कवच निर्माण होना

चैतन्यका स्वरूप चंदेरी जलके समान है । उसमें जडत्व नहीं है । इसलिए वह हलका है और लिंगदेह उसे ग्रहण कर सकती है । मृत्युके पश्चात् यह चैतन्य लिंगदेहके साथ जाता है एवं इस चैतन्यकी शीतलताका सूक्ष्म-वायुसे संपर्क होकर जलका घनीकरण होता है और उसका रूपांतर चैतन्यमय संरक्षक-कवचमें होता है । इसीको `तारक रूपसे मारक रूपमें चैतन्यका रूपांतर’ कहते हैं ।

२.३ विधिके मंत्रोंसे संभावित लाभ

  • विधिके मंत्रोंमें साधना एवं जीवनका उद्देश्य बताया गया है । इस कारण लिंगदेहपर चैतन्यके साथ साधनाका संस्कार भी होता है ।
  • मृत्युतक एवं मृत्युके समय इस ज्ञानके स्मरणके कारण जीवका अहं कम होनेमें सहायता मिलती है ।
  • जीवके मनमें सत्के विचारोंकी एवं उसकी सात्त्विकताकी वृद्धिमें सहायता होती है ।
  • इस कारण पुन: जन्म लेते समय, जीवमें अनिष्ट शक्तियोंके प्रतिकारकी क्षमता जन्मत: निर्माण होती है ।
  • इस प्रकारके जीवको गर्भमें धारण करनेवाली माताको भी प्रसूतिसे पूर्व एवं प्रसूतिके समय शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तरके कष्ट कम होते हैं । इसके विपरीत, गर्भस्थ जीवकी सूक्ष्मदेहपर चैतन्य एवं साधनाके संस्कारके कारण माताको गर्भस्थ जीवके सत्संगका लाभ मिलता है तथा आनंद एवं चैतन्यकी अनुभूति होती है ।

 

Pitrurun se mukta karnewali vidhi: Shraddha (Hindi Article)

पितृऋणसे मुक्त करनेवाली विधि: श्राद्ध

सारणी –


१. सर्वसामान्यत: श्राद्धप्रयोग कैसे होता है ?

  • १. अपसव्य करना: देशकालका उच्चारण कर अपसव्य करें, यानी जनेऊ बाएं कंधेपर नहीं, अपितु दाएं कंधेपर लें ।
  • २. श्राद्धसंकल्प करना: श्राद्धके लिए योग्य पितरोंकी षष्ठी विभक्तिका विचार कर (उनका उल्लेख करते समय, षष्ठी-विभक्तिका प्रयोग करना, प्रत्यय लगाना, उदा. रमेशस्य), श्राद्धकर्ता आगे दिए अनुसार संकल्प करे – `अमुकश्राद्धं सदैवं सपिण्डं पार्वणविधीना एकोद्दिष्टेन वा अन्नेन वा आमेन वा हिरण्येन सद्य: करिष्ये’ ।
  • ३. यवोदक (जौ) व तिलोदक तैयार करें ।
  • ४. प्रायिश्चितके लिए पुरुषसूक्त, वैश्वदेवसूक्त आदि सूक्त बोलें ।
  • ५. ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करें व उन्हें नमस्कार करें । तदुपरांत श्राद्धकर्ता ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करें – `हम सब यह कर्म सावधानीसे, शांतचित्त, दक्ष व ब्रह्मचारी रहकर करेंगे ।’
  • ६. देवस्थानपर पूर्वकी ओर व पितृस्थानपर उत्तरकी ओर मुख कर ब्राह्मणोंको बिठाएं । ब्राह्मणोंको आसनके लिए दर्भ दें, देवताओंको सीधे दर्भ अर्पित करें व पितरोंको अग्रसे मोड़कर दें ।
  • ७. आवाहन, अर्घ्य, संकल्प, पिंडदान, पिंडाभ्यंजन (पिंडोंको दर्भसे घी लगाना), अन्नदान, अक्षय्योदक, आसन तथा पाद्यके उपचारोंमें पितरोंके नाम-गोत्रका उच्चारण करें । गोत्र ज्ञात न हो तो कश्यप गोत्रका उच्चारण करें; क्योंकि श्रुति बताती है कि, `समस्त प्रजा कश्यपसे उत्पन्न हुई है’ । पितरोंके नामके अंतमें `शर्मन्’ उच्चारण करें । स्त्रियोंके नामके अंतमें `दां’ उपपद लगाएं ।
  • ८. `उदीरतामवर’ मंत्रसे सर्वत्र तिल बिखेरें तथा गायत्री मंत्रसे अन्नप्रोक्षण करें (अन्नपर पानी छिड़कें) ।
  • ९. देवतापूजनमें भूमिपर नित्य दाहिना घुटना टिकाएं । पितरोंकी पूजामें भूमिपर बायां घुटना टिकाएं ।
  • १०. देवकर्म प्रदक्षिण व पितृकर्म अप्रदक्षिण करें । देवताओंको उपचार समर्पित करते समय `स्वाहा नम:’ व पितरोंको उपचार समर्पित करते समय `स्वधा नम:’ उच्चारण करें । 
  • ११. देव-ब्राह्मणके सामने यवोदकसे चौकोर मंडल व पितर-ब्राह्मणके सामने तिलोदकसे (घड़ीकी सुईकी दिशामें) गोलाकार मंडल बनाकर, उनपर भोजनपात्र रखें । उसी प्रकार कुलदेवता व गोग्रास (गायके लिए नैवेद्य)के लिए पूजाघरके सामने पानीका मंडल बनाकर उनपर भोजनपात्र रखें ।

           पितृस्थानपर बैठे ब्राह्मणोंके भोजनपात्रके चारों ओर भस्मका उलटा (घडीकी सुईकी विपरीत दिशामें) वर्तुल बनाएं । देवस्थानपर बैठे ब्राह्मणोंके भोजनपात्रोंके चारों ओर नित्य पद्धतिसे (घड़ीकी सुईकी दिशामें)भस्मकीरंगोलीबनाएं।

  • १२. पितर व देवताओंको विधिवत् संबोधित कर अन्न-निवेदन करें ।
  • १३. पितरोंको संबोधित कर पिंडदान व विकिर करें । पिंडदान दर्भबर्ही (अग्रयुक्त एक बित्ता लंबा दर्भ)पर करें । पिंडोंकी पूजा करें । इन पिंडोंको जलाशयमें विसर्जित करें या गायको दें ।
  • १४. महालय श्राद्धके समय सबको संबोधित कर पिंडदान होनेके पश्चात् चार दिशाओंको धर्मपिंड दें ।

           आगे दिए अनुसार सबको संबोधित कर यह धर्मपिंड दें – सृष्टिकी निर्मिति करनेवाले ब्रह्मदेवसे लेकर जिन्होंने हमारे माता-पिताके कुलमें जन्म लिया है; साथ ही गुरु, आप्त, हमारे इस जन्ममें सेवक, दास, दासी, मित्र, घरके पालतू प्राणि, लगाए गए वृक्ष, हमपर उपकृत (हमारे प्रति कृतज्ञ) व्यक्ति, जिनका पिंडदान करनेके लिए कोई न हो तथा अन्य ज्ञात व अज्ञात व्यक्ति ।

  • १५. पिंडदानके उपरांत ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वादके अक्षत लें । स्वधावाचन कर सर्व कर्म ईश्वरार्पण करें ।

घरमें मंगलकार्य हुआ हो, तो एक वर्षतक श्राद्धमें पिंडदान निषिद्ध है ।

२. वर्षश्राद्ध करनेके उपरांत पितृपक्षमें भी श्राद्ध क्यों करें ?

`वर्ष श्राद्ध करनेसे उस विशिष्ट लिंगदेहको गति प्राप्त होनेमें सहायता मिलनेसे उसका प्रत्यक्ष व्यष्टिस्तरका ऋण लौटानेमें सहायता होती है । यह हिंदू धर्म द्वारा व्यक्तिगतस्तरपर प्रदत्त, ऋणमोचनकी  एक उपासना ही है, तो पितृपक्षकें निमित्तसे पितरोंका ऋण समष्टिस्तरपर लौटानेका, श्राद्ध यह एक समष्टि उपासना ही है । व्यष्टि ऋणमोचन उस लिंगदेहकेप्रति प्रत्यक्ष कर्तव्यपालनकी सीख देता है, तो समष्टि ऋण एक साथ व्यापक स्तरपर लेन-देनका हिसाब पूरा करता है ।

एक दो पीढियां पूर्वके पितरोंका हम श्राद्ध करते हैं; कारण उनके साथ हमारा प्रत्यक्ष लेन-देनका हिसाब रहता है। अन्य पीढीयोंकी अपेक्षा इन पितरोंमें कौटंबिक आसक्तिविषयक विचारोंकी मात्रा अधिक होनेसे उनका यह प्रत्यक्ष बंधन अधिक तीका होनेके कारण उससे मुक्त होनेकेलिए उनकेलिए पितृपक्ष विधि सामयिक स्वरूपमें करना इष्ट होता है; इसीलिए वर्षश्राद्ध तथा पितृपक्ष ये दोंनों विधि करना आवशयक है ।

३. श्राद्ध करनेके विषयमें महत्त्वपूर्ण सूचनाएं !  

श्राद्धमें शुभ्र अक्षताका प्रयोग किया जाता है ।   श्राद्धकर्ममें लाल रंगके पुष्प, लौह एवं स्टील धातुओंके बर्तन वर्जित हैं ।   श्राद्धमें रंगोलीके चूर्णसे रंगोली नही निकालते हैं ।   श्राद्धमें `ॐ’ का उच्चारण नहीं करना चहिए ।   श्राद्धमें जनेऊ दांएं कंधेपर (अपसव्य) रखना चाहिए   श्राद्धमें अर्घ्य देते समय जनेऊ बांएं कंधेपर (सव्य), तो तिलोदक अर्पण करते समय दांएं कंधेपर (अपसव्य) करना चाहिए ।   श्राद्धमें तर्पण करते समय अनामिका व अंगूठेके बीचसे पानी छोडना चाहिए ।   श्राद्धके समय ब्राह्मणोंके लिए लगाए गए भोजनपात्रोंके चारों ओर भस्मका वृत्त बनाएं ।   मंगलकार्यके उपरांत पिंडदान वर्ज्य माना जाता है ।   श्राद्धमें भातके पिंडका दान करना चाहिए ।

४. ब्राह्मणने प्राप्त किया हुआ भोजन अन्न पितरोंको कैसे पहुंचता है ?

  • `श्राद्धादि कर्ममें मंत्रोच्चारके नादके परिणामस्वरूप ब्राह्मणके देहका ब्राह्मतेज जागृत होता है । उसी प्रकार पितरोंका आवाहन कर विश्वेदेवके अधिष्ठानसे उस विशिष्ट अन्नोदकापर मंत्रसे भारित पानी का सिंचन करनेसे हिविर्भाग के रूपमें अर्पण किए हुए अन्नसे प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्म-वायु पितरतरंगोंको प्राप्त होनेमें सहायक होती है ।
  • पितरोंके नामसे ब्राह्मतेज जागृत हुए ब्राह्मणको भोजन अर्पण करनेका पुण्य भी श्राद्धकर्ताको उसी प्रकार  पितरोंको मिलता है । इससे ब्राह्मणके आशीर्वाद भी पितरोंकी गतिको  वेग प्राप्त करनेमें कारणीभूत होते हैं ।
  • बाह्यत: पितरोंके नामसे ब्राह्मण भोजन करना, इस `कर्तव्यपूर्तिके लिए कृति’ ऐसे  दृष्टिकोणकी अपेेक्षा `ब्राह्मणके माध्यमसे प्रत्यक्ष पितर ही भोजन प्राप्त कर रहे हैं ‘, ऐसा भाव रखना अधिक महत्त्वपूर्ण होनेके कारण संतुष्टियुक्त ब्राह्मणके देहेसे प्रक्षेपित होनेवाली आशीर्वादात्मक सात्त्विक तरंगोंका बल पितरोंको प्राप्त होता है । इसी अर्थमें `ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त किया गया भोजन अन्न पितरोंको मिलता है ‘, ऐसा कहा है ।
  • कभी कभी इस प्रक्रियामें अन्नाकी तीका वासना रखनेवाले पितरोंके लिंगदेह ब्राह्मणके देहमें आकर भी प्रत्यक्ष अन्न ग्रहण करते हैं ।

 

Nariyal phodkar udghatan kyon kiya jata hai? (Hindi Article)

नारियल फोडकर उद्‌घाटन क्‍यों किया जाता है?

सारणी –


१. उद्‌घाटन

 `उद्’ अर्थात् प्रकट करना । देवतातरंगोंको प्रकट करना अथवा कार्यस्थलपर उन्हें स्थान ग्रहण करने हेतु प्रार्थना कर कार्यारंभ करना अर्थात् उद्‌घाटन करना । हिंदू धर्ममें प्रत्येक कृति अध्यात्मशास्त्रपर आधारित है । किसी भी समारोह अथवा कार्यको पूर्ण करनेके लिए देवताके आशीर्वाद आवश्यक हैं । शास्त्रीय पद्धति अनुसार उद्‌घाटन करनेसे दैविक तरंगोंका कार्यस्थलपर आगमन सुरक्षाकवचकी निर्मितिमें सहायक होता है । इससे वहांकी कष्टदायक / अनिष्ट स्पंदनोंके संचारपर अंकुश लगता है । इसलिए उद्‌घाटन विधिवत्, अर्थात् अध्यात्मशास्त्रपर आधारित विधियोंके अनुसार ही करना चाहिए ।

उद्‌घाटनकी पद्धतियां: नारियल फोडना और दीपप्रज्वलन, ये विधियां वास्तुशुद्धिकी यानी उद्‌घाटनकी महत्त्वपूर्ण विधियां हैं ।

व्यासपीठके कार्यक्रमोंका उद्‌घाटन: परिसंवाद, साहित्य सम्मेलन, संगीत महोत्सव इत्यादिका उद्‌घाटन दीपप्रज्वलनसे किया जाता है । व्यासपीठकी स्थापनासे पूर्व नारियल फोडें और उद्‌घाटनके समय दीप प्रज्वलित करें । नारियल फोडनेके पीछे प्रमुख उद्देश्य है, कार्यस्थलकी शुद्धि । व्यासपीठ ज्ञानदानके कार्यसे संबंधित है, अर्थात् वह ज्ञानपीठ है । इसलिए वहां दीपकका महत्त्व है ।

दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादिका उद्‌घाटन: दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि अधिकांशत: व्यावहारिक कर्मसे संबंधित होते हैं । इसलिए उनके उद्‌घाटन अंतर्गत दीपप्रज्वलनकी आवश्यकता नहीं होती । इसलिए केवल नारियल फोडें ।

२. संतोंके कर-कमलोंद्वारा उद्‌घाटन व दीपप्रज्वलन करवानेका महत्त्व

संतोंके अस्तित्वमात्रसे ब्रह्मांडसे आवश्यक देवताकी सूक्ष्मतर तरंगें कार्यस्थलकी ओर आकृष्ट व कार्यरत होती हैं । इससे वातावरण चैतन्यमय व शुद्ध बनता है और कार्यस्थलके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति होती है व जीवोंकी सूक्ष्मदेहकी शुद्धिमें सहायता मिलती है । इसलिए संतोंके करकमलोंद्वारा उद्‌घाटन अंतर्गत नारियल फोडनेकी आवश्यकता नहीं होती । (उद्‌घाटनके लिए संतोंको आमंत्रित करनेका महत्त्व इससे ज्ञात होता है । दुर्भाग्यकी बात यह है कि आजकल राज्यकर्ताओं, चित्रपट-अभिनेताओं, क्रिकेटके खिलाडियोंको उद्‌घाटनके लिए आमंत्रित किया जाता है ।)

३. पश्चिमी संस्कृतिके अनुसार फीता काटकर उद्‌घाटन क्यों न करें ?

किसी वस्तुको काटना विध्वंसक वृत्तिका दर्शक है । फीता काटनेकी तामसी कृतिद्वारा उद्‌घाटन करनेसे वास्तुकी कष्टदायी स्पंदनोंपर कोई प्रभाव नहीं पडता । जिस कृतिसे कष्टदायी तरंगोंकी निर्मिति होती है, वह हिंदू धर्ममें त्याज्य (त्यागने योग्य) है; इसलिए फीता काटकर उद्‌घाटन न करें ।

नारियल फोडना:

Nariyal phodna

व्यासपीठकी स्थापनासे पूर्व भूमिपूजनके समय नारियल फोडा जाता है । जिस भूभागपर व्यासपीठकी स्थापना करनी होती है, उसके शुद्धिकरणसे वहांकी कष्टदायी स्पंदनोंका निराकरण किया जाता है । जहां व्यासपीठ पहले ही स्थापित हो, वहां उसके सामने धरतीपर एक पत्थर रखकर, स्थानदेवतासे प्रार्थना कर नारियल फोडें । व्यासपीठपर किसी भी समारोहकी तैयारी आरंभ करनेसे पूर्व स्थानकी शुद्धि आवश्यक है, अन्यथा अनिष्ट शक्तियोंकी बाधासे कार्यक्रमका आरंभ निर्धारित समयपर न हो पाना, कार्यक्रम-स्थलपर अस्वस्थता, तैयारी करनेमें थकान इत्यादि कष्टोंकी आशंका रहती है । प्रार्थनाद्वारा स्थानदेवताके आवाहनसे उनकी कृपास्वरूप नारियल-जलके माध्यमसे स्थानदेवताकी तरंगें सर्व दिशाओंमें फैलती हैं । इससे कार्यस्थलमें प्रवेश करनेवाली कष्टदायी स्पंदनोंकी गतिपर अंकुश लगाना संभव होता है । उस परिसरमें स्थान-देवताकी सूक्ष्म-तरंगोंका मंडल तैयार होता है व समारोह निर्विघ्न संपन्न होता है ।

नारियल फोडनेके पश्चात् दीपप्रज्वलन:

Deep prajvalan

नारियल फोडना अर्थात् अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश लगाना व दीपप्रज्वलन अर्थात् ज्ञानपीठपर कार्यरत दैवी तरंगोंका स्वागत कर, उन्हें प्रसन्न करना । इसलिए प्रथम नारियल फोडकर स्थानदेवताका आवाहन कर वहांकी स्थानीय अनिष्ट शक्तियोंको नियंत्रित करने हेतु उनसे प्रार्थना की जाती है; तदुपरांत दीप प्रज्वलित कर दीपद्वारा प्रक्षेपित तरंगोंके कारण वरिष्ठ (अधिक क्षमतावाली) अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश लगाकर व्यासपीठसे ज्ञानदानका कार्य किया जाता है ।

दीपप्रज्वलनका महत्त्व:

  • ईश्वरीय संकल्पशक्तिका कार्यरत होना व मनोवांछित कार्य सिद्ध होना
  • कार्यस्थलके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति

४. दीपप्रज्वलनके लिए प्रयुक्त दीपस्तंभमें घीकी अपेक्षा तेल डालना अधिक योग्य क्यों है ?

दीपप्रज्वलनके लिए प्रयुक्त दीपस्तंभमें तेलका प्रयोग करें । तेल रजोगुणी तरंगोंके तथा घी सात्त्विक तरंगोंके प्रक्षेपणका प्रतीक है । किसी भी कार्यको गति प्रदान करने हेतु रजोगुणी क्रियातरंगें आवश्यक होती हैं । तेलकी ज्योति ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताओंकी क्रियातरंगोंको जागृत कर उन्हें कार्यरत रखती है; इसलिए दीपप्रज्वलन हेतु प्रयुक्त दीपस्तंभमें तेलका प्रयोग श्रेयस्कर है ।

५. दीपप्रज्वलन मोमबत्तीसे नहीं, अपितु तेलके दीप (सकर्ण दीप) से क्यों करें ?

मोमबत्तीद्वारा प्रक्षेपित तरंगें तम-रजयुक्त होती हैं । इन तरंगोंके कारण वातावरण तामसी बनता है व सात्त्विकता नष्ट हो जाती है । मोमबत्तीद्वारा दीप प्रज्वलित करनेपर दीपस्तंभके चारों ओर तमकणोंका मंडल तैयार होता है । इस कारण दीपस्तंभकी ज्योतिकी ओर आकृष्ट ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताकी क्रियातरंगें बाधित होती हैं । इसके विपरीत, तेल रजोगुणका प्रतीक है । तेलकी ज्योति ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताओंकी क्रियातरंगोंको जागृत कर कार्यरत करनेमें सहायक होती है; इसलिए दीपप्रज्वलन हेतु प्रयुक्त तेलके दीप (सकर्ण दीप)का प्रयोग श्रेयस्कर है ।


 

Puja mein upyukta vividha ghatakon ka mahatva (Hindi Article)

पूजामें उपयुक्त विविध घटकोंका महत्त्‍व

Puja samagri

सारणी –


१. पूजासामग्रीका महत्त्व

देवतापूजनमें पूजासामग्री होना आवश्यक ही है । यह घटक ईश्वरीय कृपा प्राप्त होनेमें महत्त्वपूर्ण कडी है । प्रत्येक घटकका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व समझ लेनेसे, इन घटकोंके प्रति मनमें भाव निर्माण होता है और धार्मिक व सामाजिक कृति अधिक भावपूर्ण हो पाती है । इसी उद्देश्यको ध्यानमें रखते हुए यहां हलदी, कुमकुम, तिलक, पुष्प, अक्षत, बाती, श्रीफल, उदबत्ती, कर्पूर आदिका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व व उसकी विशेषताएं बताई गई हैं ।

२. पूजाकी थालीमें विविध घटकोंकी रचना किस प्रकार करें ?

  • `थालीमें जीवकी दाहिनी ओर हलदी-कुमकुम व बाईं ओर बुक्का (अभ्रक धातुका चूर्ण), गुलाल और सिंदूर रखें ।
  • थालीमें सामने इत्रकी डिब्बी, तिलक (चंदन)की छोटी थाली और पुष्प, दूर्वा व पत्री रखें । इत्र, तिलक व पुष्पके गंध-कणोंके कारण तथा दूर्वा व पत्रीके रंग-कणोंके कारण देवताओंकी सूक्ष्म-तरंगें कार्यरत होती हैं ।
  • थालीमें नीचेकी दिशामें पान-सुपारी व दक्षिणा रखें; क्योंकि पान-सुपारी देवताओंकी तरंगें प्रक्षेपित करनेका एक प्रभावी माध्यम है ।
  • मध्य भागमें सर्वसमावेशक अक्षत रखें । अक्षतके थालीका केंद्रबिंदु बननेसे उसकी ओर शिव, श्री दुर्गादेवी, श्रीराम, श्रीकृष्ण व गणपति, इन पांच उच्च देवताओंकी तत्त्व-तरंगें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें आवश्यकतानुसार उसकी चारों ओर गोलाकारमें रखे कुमकुम, हलदी इत्यादि घटकोंकी ओर प्रक्षेपित होती हैं ।

३. पूजासामग्रीके घटकोंका महत्त्व व विशेषताएं

  • सप्तनदियोंका जल: गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी व नर्मदाके जल अर्थात् सप्तनदियोंके एकत्रित जलको पूजाके कलशमें डालते हैं । वर्तमान कालमें सप्तनदियोंका जल सरलतासे उपलब्ध नहीं होता । पूजा हेतु कलशमें डालनेके लिए सप्तनदियोंका जल उपलब्ध न हो, तो सामान्य जलका प्रयोग करते हैं । यह जल डालते समय `गंगे च यमुनेचैव ।’ इस मंत्रका उच्चारण कर सप्तनदियोंका आवाहन किया जाता है ।
  • रुईके वस्त्र: रुईके वस्त्र जीवके शरीरकी सुषुम्नानाडीका प्रतिनिधित्व करते हैं । रुईका धागा बनाते समय दूधकी अपेक्षा चंदनका प्रयोग करें । चंदनके अनुलेपनसे देवताओंकी तरंगें शीघ्र कार्यरत होकर, रुईके वस्त्रकी ओर आकर्षित होती हैं । ये सात्त्विक वसन (वस्त्र) देवताके गलेमें पहनानेसे देवता अपना सगुण रूप शीघ्र साकार कर, जीवके लिए कम कालावधिमें कार्य करते हैं ।
  • जनेऊ: `देवताओंको जनेऊ अर्पण करना (पहनाना), अर्थात् देवताओंके व्याप्त प्रकाशको जनेऊके धागेके वलयमें मर्यादित कर, उन्हें द्वैतके कार्य हेतु आवाहन करना । जनेऊ धागोंसे बनाया जाता है तथा मंत्रशक्तिसे लैस होता है । जनेऊ अर्पण करना, पूजाविधिमें द्वैत-अद्वैत अनुसंधान साधनेकी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है । पूजा के उपरांत जब जीव जनेऊ धारण करता है, तो उसे देवताके सात्त्विक चैतन्यका लाभ मिलता है ।
  • गुलाल, शुद्ध कुमकुम और हल्दी: गुलालके कारण वायुमंडलकी चैतन्ययुक्त सुप्त-तरंगें प्रवाही बन जाती हैं । शुद्ध हलदीकी सुगंधका बोध उसे सूंघनेपर होता है । शुद्ध कुमकुमका स्पर्श बर्फ समान ठंडा होता है । इस कुमकुमको माथेपर लगानेसे अनिष्ट शक्तियां भ्रूमध्यसे प्रवेश नहीं कर सकतीं ।
  • पुष्प: तुलसी (मंजिरी), गेंदा, गुलाब, केवडा इत्यादि पुष्पोंकी सुगंध मंद होती है और उनमें गुरुतत्त्वको आकर्षित करनेकी क्षमता अधिक रहती है । सूर्योदयके उपरांत भी खिलनेवाले पुष्प चढाना, कागजके पुष्प चढाने समान ही है ।
  • अक्षत: पूजाविधिके प्रत्येक घटकपर तथा देवताकी मूर्तिपर पंचोपचार अथवा षोडशोपचारके उपरांत, अक्षत छिडककर सबमें विद्यमान देवत्वको जागृत कर, उन्हें कार्यके लिए आवाहन करते हैं । पंचोपचार-पूजामें कोई घटक अनुपलब्ध हो, तो अक्षतका उपयोग किया जाता है । इसलिए अक्षत सर्व देवताओंके तत्त्वोंको समा लेनेवाला अर्थात् पूजाविधिमें महत्त्वपूर्ण सर्वसमावेशक माध्यम है ।
  • नारियल: नारियलमें शिव, दुर्गा, गणपति, श्रीराम व श्रीकृष्ण, इन पांच देवताओंकी तरंगें आकृष्ट करनेकी व उन्हें आवश्यकताके अनुसार प्रक्षेपित करनेकी क्षमता होती है । इसलिए नारियलको सर्वाधिक शुभ फल अर्थात् श्रीफल, सर्वाधिक सात्त्विकता प्रदान करनेवाला फल कहते हैं ।
  • उदबत्ती: उदबत्तीमें देवताओंसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-गंध ग्रहण करनेकी क्षमता है । इसलिए उदबत्ती लगानेपर उससे उसकी सुगंधके साथ-साथ उक्त सूक्ष्म-गंध भी प्रक्षेपित होती है । उदा. जब चंदनकी उदबत्ती लगाई जाती है तब देवताओंसे आकृष्ट चंदनकी सूक्ष्म-गंध भी उदबत्तीकी सुगंधके साथ प्रक्षेपित होती है ।
  • धूप: धूपकी सुगंध तीव्र होती है । इस सुगंधसे विशिष्ट देवताका तत्त्व कार्यरत होकर, वह धूपके धुएंके माध्यमसे सूक्ष्म-शस्त्रोंका रूप लेकर वातावरणके रज-तमसे लडती है, जिससे वातावरणमें सत्त्वगुणकी प्रबलता बढ जाती है और स्वाभाविक ही वातावरण तथा वास्तुकी शुद्धि होती है । इस हेतु पूजा अथवा आरतीसे पहले धूप दिखाना योग्य होता है ।
  • कर्पूर: कर्पूर जलानेसे उत्पन्न सूक्ष्म वायुकी उग्र गंधमें शिवगणोंको आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । कर्पूरकी सुगंधके कारण श्वासद्वारा शरीरमें शिवतत्त्व प्रवेश करता है ।
  • नैवेद्य (भोग): प्रत्येक देवताका नैवेद्य निर्धारित होता है । उस देवताको वह नैवेद्य प्रिय होता है, उदा. श्रीविष्णुको खीर अथवा सूजीका हलवा, गणेशजीको मोदक, देवीको पायस । उस विशिष्ट नैवेद्यमें उस विशिष्ट देवताकी शक्ति अधिक आकृष्ट होती है । तदुपरांत वह नैवेद्य, अर्थात् प्रसाद हमारे द्वारा ग्रहण किए जानेपर उसमें विद्यमान शक्ति हमें प्राप्त होती है ।
  • दक्षिणा: दक्षिणा रखनेसे जीवमें त्यागकी भावना निर्माण होती है । हिंदू धर्मका मूल त्यागमें छुपा है । दक्षिणा देकर त्याग सीखना कर्मकांडकी पहली सीढ़ी है । इसीलिए दक्षिणा देनेका महत्त्व अनन्यसाधारण है । दक्षिणा कभी भी अकेले नहीं दी जाती । सुपारी अथवा नारियलको पानके पत्तोंपर रखकर देना महत्त्वपूर्ण है ।