Shantividhi (Hindi Article)

शांतिविधी

सारणी –


१. शांति करना

वृद्धावस्थामें इंद्रियां अकार्यक्षम होने लगती हैं, उदा. कम सुनाई देना, कम दिखाई देना, विविध रोग निर्माण होना इत्यादि । देवताओंकी कृपासे इन व्याधियोंका परिहार हो एवं शेष आयु सुखपूर्वक बीते, इस हेतु शास्त्रके अनुसार ५० वर्षसे १०० वर्षकी आयुतक प्रत्येक ५ वर्षोपरांत शांतिविधि करनी चाहिए ।

शांति करनेका दिन: प्रत्येक शांति उस वर्षके प्रारंभदिनपर करें । वह दिन शुभ न हो, तो जन्मनक्षत्र-दिन अथवा उसके पश्चात् किसी भी शुभदिन करें ।

२. आयुके अनुसार शांतिके प्रकार, शांतिके प्रमुख देवता व हवनीय द्रव्य

शांतिका प्रकार कितनी आयु
होनेपर करते हैं?
 प्रमुख देवता हवनीय द्रव्‍य
१. वैष्‍णवी शांति ५० श्रीविष्‍णु समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
२. वारुणी शांति ५५ वरुण समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
३. उग्ररथ शांति ६० मार्कंडेय समिधा, आज्‍य,
चरु, दूर्वा व पायस
४. मृत्‍युंजय महारथी
     शांति
६५ मृत्‍युंजयमहारथ समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
५. भैमरथी शांति ७० भीमरथमृत्‍युंजयरुद्र घृताक्‍त तिल
६. ऐंद्री शांति ७५ इंद्रकौशिक समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
७. सहस्त्रचंद्रदर्शन
     शांति
८० चंद्र आज्‍य
८. रौद्री शांति ८५ रुद्र समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
९. सौरी शांति ९० कालस्‍वरूपसूर्य समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
१०. त्रैयंबक मृत्‍युंजय
      शांति
९५ मृत्‍युंजयरुद्र समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस
११. महामृत्‍युंजय
      शांति
१०० महामृत्‍युंजय समिधा, आज्‍य,
चरु व पायस

टीप १: आज्‍य अर्थात्‌ घी, चरु अर्थात्‌ पकाए गए चावल एवं पायस अर्थात्‌ पानीके प्रयोग बिना मात्र दूधमें पकाए गए चावल ।

टीप २: घीमें भिगोए गए तिल

२.१ सहस्रचंद्रदर्शन शांतिविधिका महत्त्व

शिव समाधिस्थ रहकर अधिकतर अप्रकट रहते हैं । शिवका तारक रूप यदाकदा प्रकट होता है । इससे तारक रूपसे चंद्रके समान चैतन्य एवं आनंद प्राप्त कर, जीवनमें शिवके आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिए सहस्रचंद्रदर्शन विधि की जाती है । शिवके आशीर्वाद प्राप्त होनेसे व्यक्तिकी ऐहिक व पारमार्थिक पीडा और क्लेश दूर होते हैं और उसकी आयुमें वृद्धि होती है । इस विधिमें केवल एक चंद्रका (सोमका) दर्शन न कर, सहस्र चंद्रोंकी शीतलता एवं चैतन्य प्रदान करनेकी क्षमतावाले सूक्ष्ममें चंद्रदेवताके दर्शन पाने हेतु यह विधि की जाती है । इस विधिसे प्राप्त चैतन्यसे व्यक्तिके लिंगदेहको केवल इस जन्ममें ही नहीं, अपितु आगामी जन्ममें भी चैतन्यका लाभ प्राप्त होता है ।

२.२ मृत्युके पश्चात् व्यक्तिकी लिंगदेहकी चारों ओर संरक्षक-कवच निर्माण होना

चैतन्यका स्वरूप चंदेरी जलके समान है । उसमें जडत्व नहीं है । इसलिए वह हलका है और लिंगदेह उसे ग्रहण कर सकती है । मृत्युके पश्चात् यह चैतन्य लिंगदेहके साथ जाता है एवं इस चैतन्यकी शीतलताका सूक्ष्म-वायुसे संपर्क होकर जलका घनीकरण होता है और उसका रूपांतर चैतन्यमय संरक्षक-कवचमें होता है । इसीको `तारक रूपसे मारक रूपमें चैतन्यका रूपांतर’ कहते हैं ।

२.३ विधिके मंत्रोंसे संभावित लाभ

  • विधिके मंत्रोंमें साधना एवं जीवनका उद्देश्य बताया गया है । इस कारण लिंगदेहपर चैतन्यके साथ साधनाका संस्कार भी होता है ।
  • मृत्युतक एवं मृत्युके समय इस ज्ञानके स्मरणके कारण जीवका अहं कम होनेमें सहायता मिलती है ।
  • जीवके मनमें सत्के विचारोंकी एवं उसकी सात्त्विकताकी वृद्धिमें सहायता होती है ।
  • इस कारण पुन: जन्म लेते समय, जीवमें अनिष्ट शक्तियोंके प्रतिकारकी क्षमता जन्मत: निर्माण होती है ।
  • इस प्रकारके जीवको गर्भमें धारण करनेवाली माताको भी प्रसूतिसे पूर्व एवं प्रसूतिके समय शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तरके कष्ट कम होते हैं । इसके विपरीत, गर्भस्थ जीवकी सूक्ष्मदेहपर चैतन्य एवं साधनाके संस्कारके कारण माताको गर्भस्थ जीवके सत्संगका लाभ मिलता है तथा आनंद एवं चैतन्यकी अनुभूति होती है ।

 

Advertisements

Pitrurun se mukta karnewali vidhi: Shraddha (Hindi Article)

पितृऋणसे मुक्त करनेवाली विधि: श्राद्ध

सारणी –


१. सर्वसामान्यत: श्राद्धप्रयोग कैसे होता है ?

  • १. अपसव्य करना: देशकालका उच्चारण कर अपसव्य करें, यानी जनेऊ बाएं कंधेपर नहीं, अपितु दाएं कंधेपर लें ।
  • २. श्राद्धसंकल्प करना: श्राद्धके लिए योग्य पितरोंकी षष्ठी विभक्तिका विचार कर (उनका उल्लेख करते समय, षष्ठी-विभक्तिका प्रयोग करना, प्रत्यय लगाना, उदा. रमेशस्य), श्राद्धकर्ता आगे दिए अनुसार संकल्प करे – `अमुकश्राद्धं सदैवं सपिण्डं पार्वणविधीना एकोद्दिष्टेन वा अन्नेन वा आमेन वा हिरण्येन सद्य: करिष्ये’ ।
  • ३. यवोदक (जौ) व तिलोदक तैयार करें ।
  • ४. प्रायिश्चितके लिए पुरुषसूक्त, वैश्वदेवसूक्त आदि सूक्त बोलें ।
  • ५. ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करें व उन्हें नमस्कार करें । तदुपरांत श्राद्धकर्ता ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करें – `हम सब यह कर्म सावधानीसे, शांतचित्त, दक्ष व ब्रह्मचारी रहकर करेंगे ।’
  • ६. देवस्थानपर पूर्वकी ओर व पितृस्थानपर उत्तरकी ओर मुख कर ब्राह्मणोंको बिठाएं । ब्राह्मणोंको आसनके लिए दर्भ दें, देवताओंको सीधे दर्भ अर्पित करें व पितरोंको अग्रसे मोड़कर दें ।
  • ७. आवाहन, अर्घ्य, संकल्प, पिंडदान, पिंडाभ्यंजन (पिंडोंको दर्भसे घी लगाना), अन्नदान, अक्षय्योदक, आसन तथा पाद्यके उपचारोंमें पितरोंके नाम-गोत्रका उच्चारण करें । गोत्र ज्ञात न हो तो कश्यप गोत्रका उच्चारण करें; क्योंकि श्रुति बताती है कि, `समस्त प्रजा कश्यपसे उत्पन्न हुई है’ । पितरोंके नामके अंतमें `शर्मन्’ उच्चारण करें । स्त्रियोंके नामके अंतमें `दां’ उपपद लगाएं ।
  • ८. `उदीरतामवर’ मंत्रसे सर्वत्र तिल बिखेरें तथा गायत्री मंत्रसे अन्नप्रोक्षण करें (अन्नपर पानी छिड़कें) ।
  • ९. देवतापूजनमें भूमिपर नित्य दाहिना घुटना टिकाएं । पितरोंकी पूजामें भूमिपर बायां घुटना टिकाएं ।
  • १०. देवकर्म प्रदक्षिण व पितृकर्म अप्रदक्षिण करें । देवताओंको उपचार समर्पित करते समय `स्वाहा नम:’ व पितरोंको उपचार समर्पित करते समय `स्वधा नम:’ उच्चारण करें । 
  • ११. देव-ब्राह्मणके सामने यवोदकसे चौकोर मंडल व पितर-ब्राह्मणके सामने तिलोदकसे (घड़ीकी सुईकी दिशामें) गोलाकार मंडल बनाकर, उनपर भोजनपात्र रखें । उसी प्रकार कुलदेवता व गोग्रास (गायके लिए नैवेद्य)के लिए पूजाघरके सामने पानीका मंडल बनाकर उनपर भोजनपात्र रखें ।

           पितृस्थानपर बैठे ब्राह्मणोंके भोजनपात्रके चारों ओर भस्मका उलटा (घडीकी सुईकी विपरीत दिशामें) वर्तुल बनाएं । देवस्थानपर बैठे ब्राह्मणोंके भोजनपात्रोंके चारों ओर नित्य पद्धतिसे (घड़ीकी सुईकी दिशामें)भस्मकीरंगोलीबनाएं।

  • १२. पितर व देवताओंको विधिवत् संबोधित कर अन्न-निवेदन करें ।
  • १३. पितरोंको संबोधित कर पिंडदान व विकिर करें । पिंडदान दर्भबर्ही (अग्रयुक्त एक बित्ता लंबा दर्भ)पर करें । पिंडोंकी पूजा करें । इन पिंडोंको जलाशयमें विसर्जित करें या गायको दें ।
  • १४. महालय श्राद्धके समय सबको संबोधित कर पिंडदान होनेके पश्चात् चार दिशाओंको धर्मपिंड दें ।

           आगे दिए अनुसार सबको संबोधित कर यह धर्मपिंड दें – सृष्टिकी निर्मिति करनेवाले ब्रह्मदेवसे लेकर जिन्होंने हमारे माता-पिताके कुलमें जन्म लिया है; साथ ही गुरु, आप्त, हमारे इस जन्ममें सेवक, दास, दासी, मित्र, घरके पालतू प्राणि, लगाए गए वृक्ष, हमपर उपकृत (हमारे प्रति कृतज्ञ) व्यक्ति, जिनका पिंडदान करनेके लिए कोई न हो तथा अन्य ज्ञात व अज्ञात व्यक्ति ।

  • १५. पिंडदानके उपरांत ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वादके अक्षत लें । स्वधावाचन कर सर्व कर्म ईश्वरार्पण करें ।

घरमें मंगलकार्य हुआ हो, तो एक वर्षतक श्राद्धमें पिंडदान निषिद्ध है ।

२. वर्षश्राद्ध करनेके उपरांत पितृपक्षमें भी श्राद्ध क्यों करें ?

`वर्ष श्राद्ध करनेसे उस विशिष्ट लिंगदेहको गति प्राप्त होनेमें सहायता मिलनेसे उसका प्रत्यक्ष व्यष्टिस्तरका ऋण लौटानेमें सहायता होती है । यह हिंदू धर्म द्वारा व्यक्तिगतस्तरपर प्रदत्त, ऋणमोचनकी  एक उपासना ही है, तो पितृपक्षकें निमित्तसे पितरोंका ऋण समष्टिस्तरपर लौटानेका, श्राद्ध यह एक समष्टि उपासना ही है । व्यष्टि ऋणमोचन उस लिंगदेहकेप्रति प्रत्यक्ष कर्तव्यपालनकी सीख देता है, तो समष्टि ऋण एक साथ व्यापक स्तरपर लेन-देनका हिसाब पूरा करता है ।

एक दो पीढियां पूर्वके पितरोंका हम श्राद्ध करते हैं; कारण उनके साथ हमारा प्रत्यक्ष लेन-देनका हिसाब रहता है। अन्य पीढीयोंकी अपेक्षा इन पितरोंमें कौटंबिक आसक्तिविषयक विचारोंकी मात्रा अधिक होनेसे उनका यह प्रत्यक्ष बंधन अधिक तीका होनेके कारण उससे मुक्त होनेकेलिए उनकेलिए पितृपक्ष विधि सामयिक स्वरूपमें करना इष्ट होता है; इसीलिए वर्षश्राद्ध तथा पितृपक्ष ये दोंनों विधि करना आवशयक है ।

३. श्राद्ध करनेके विषयमें महत्त्वपूर्ण सूचनाएं !  

श्राद्धमें शुभ्र अक्षताका प्रयोग किया जाता है ।   श्राद्धकर्ममें लाल रंगके पुष्प, लौह एवं स्टील धातुओंके बर्तन वर्जित हैं ।   श्राद्धमें रंगोलीके चूर्णसे रंगोली नही निकालते हैं ।   श्राद्धमें `ॐ’ का उच्चारण नहीं करना चहिए ।   श्राद्धमें जनेऊ दांएं कंधेपर (अपसव्य) रखना चाहिए   श्राद्धमें अर्घ्य देते समय जनेऊ बांएं कंधेपर (सव्य), तो तिलोदक अर्पण करते समय दांएं कंधेपर (अपसव्य) करना चाहिए ।   श्राद्धमें तर्पण करते समय अनामिका व अंगूठेके बीचसे पानी छोडना चाहिए ।   श्राद्धके समय ब्राह्मणोंके लिए लगाए गए भोजनपात्रोंके चारों ओर भस्मका वृत्त बनाएं ।   मंगलकार्यके उपरांत पिंडदान वर्ज्य माना जाता है ।   श्राद्धमें भातके पिंडका दान करना चाहिए ।

४. ब्राह्मणने प्राप्त किया हुआ भोजन अन्न पितरोंको कैसे पहुंचता है ?

  • `श्राद्धादि कर्ममें मंत्रोच्चारके नादके परिणामस्वरूप ब्राह्मणके देहका ब्राह्मतेज जागृत होता है । उसी प्रकार पितरोंका आवाहन कर विश्वेदेवके अधिष्ठानसे उस विशिष्ट अन्नोदकापर मंत्रसे भारित पानी का सिंचन करनेसे हिविर्भाग के रूपमें अर्पण किए हुए अन्नसे प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्म-वायु पितरतरंगोंको प्राप्त होनेमें सहायक होती है ।
  • पितरोंके नामसे ब्राह्मतेज जागृत हुए ब्राह्मणको भोजन अर्पण करनेका पुण्य भी श्राद्धकर्ताको उसी प्रकार  पितरोंको मिलता है । इससे ब्राह्मणके आशीर्वाद भी पितरोंकी गतिको  वेग प्राप्त करनेमें कारणीभूत होते हैं ।
  • बाह्यत: पितरोंके नामसे ब्राह्मण भोजन करना, इस `कर्तव्यपूर्तिके लिए कृति’ ऐसे  दृष्टिकोणकी अपेेक्षा `ब्राह्मणके माध्यमसे प्रत्यक्ष पितर ही भोजन प्राप्त कर रहे हैं ‘, ऐसा भाव रखना अधिक महत्त्वपूर्ण होनेके कारण संतुष्टियुक्त ब्राह्मणके देहेसे प्रक्षेपित होनेवाली आशीर्वादात्मक सात्त्विक तरंगोंका बल पितरोंको प्राप्त होता है । इसी अर्थमें `ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त किया गया भोजन अन्न पितरोंको मिलता है ‘, ऐसा कहा है ।
  • कभी कभी इस प्रक्रियामें अन्नाकी तीका वासना रखनेवाले पितरोंके लिंगदेह ब्राह्मणके देहमें आकर भी प्रत्यक्ष अन्न ग्रहण करते हैं ।

 

Nariyal phodkar udghatan kyon kiya jata hai? (Hindi Article)

नारियल फोडकर उद्‌घाटन क्‍यों किया जाता है?

सारणी –


१. उद्‌घाटन

 `उद्’ अर्थात् प्रकट करना । देवतातरंगोंको प्रकट करना अथवा कार्यस्थलपर उन्हें स्थान ग्रहण करने हेतु प्रार्थना कर कार्यारंभ करना अर्थात् उद्‌घाटन करना । हिंदू धर्ममें प्रत्येक कृति अध्यात्मशास्त्रपर आधारित है । किसी भी समारोह अथवा कार्यको पूर्ण करनेके लिए देवताके आशीर्वाद आवश्यक हैं । शास्त्रीय पद्धति अनुसार उद्‌घाटन करनेसे दैविक तरंगोंका कार्यस्थलपर आगमन सुरक्षाकवचकी निर्मितिमें सहायक होता है । इससे वहांकी कष्टदायक / अनिष्ट स्पंदनोंके संचारपर अंकुश लगता है । इसलिए उद्‌घाटन विधिवत्, अर्थात् अध्यात्मशास्त्रपर आधारित विधियोंके अनुसार ही करना चाहिए ।

उद्‌घाटनकी पद्धतियां: नारियल फोडना और दीपप्रज्वलन, ये विधियां वास्तुशुद्धिकी यानी उद्‌घाटनकी महत्त्वपूर्ण विधियां हैं ।

व्यासपीठके कार्यक्रमोंका उद्‌घाटन: परिसंवाद, साहित्य सम्मेलन, संगीत महोत्सव इत्यादिका उद्‌घाटन दीपप्रज्वलनसे किया जाता है । व्यासपीठकी स्थापनासे पूर्व नारियल फोडें और उद्‌घाटनके समय दीप प्रज्वलित करें । नारियल फोडनेके पीछे प्रमुख उद्देश्य है, कार्यस्थलकी शुद्धि । व्यासपीठ ज्ञानदानके कार्यसे संबंधित है, अर्थात् वह ज्ञानपीठ है । इसलिए वहां दीपकका महत्त्व है ।

दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादिका उद्‌घाटन: दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि अधिकांशत: व्यावहारिक कर्मसे संबंधित होते हैं । इसलिए उनके उद्‌घाटन अंतर्गत दीपप्रज्वलनकी आवश्यकता नहीं होती । इसलिए केवल नारियल फोडें ।

२. संतोंके कर-कमलोंद्वारा उद्‌घाटन व दीपप्रज्वलन करवानेका महत्त्व

संतोंके अस्तित्वमात्रसे ब्रह्मांडसे आवश्यक देवताकी सूक्ष्मतर तरंगें कार्यस्थलकी ओर आकृष्ट व कार्यरत होती हैं । इससे वातावरण चैतन्यमय व शुद्ध बनता है और कार्यस्थलके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति होती है व जीवोंकी सूक्ष्मदेहकी शुद्धिमें सहायता मिलती है । इसलिए संतोंके करकमलोंद्वारा उद्‌घाटन अंतर्गत नारियल फोडनेकी आवश्यकता नहीं होती । (उद्‌घाटनके लिए संतोंको आमंत्रित करनेका महत्त्व इससे ज्ञात होता है । दुर्भाग्यकी बात यह है कि आजकल राज्यकर्ताओं, चित्रपट-अभिनेताओं, क्रिकेटके खिलाडियोंको उद्‌घाटनके लिए आमंत्रित किया जाता है ।)

३. पश्चिमी संस्कृतिके अनुसार फीता काटकर उद्‌घाटन क्यों न करें ?

किसी वस्तुको काटना विध्वंसक वृत्तिका दर्शक है । फीता काटनेकी तामसी कृतिद्वारा उद्‌घाटन करनेसे वास्तुकी कष्टदायी स्पंदनोंपर कोई प्रभाव नहीं पडता । जिस कृतिसे कष्टदायी तरंगोंकी निर्मिति होती है, वह हिंदू धर्ममें त्याज्य (त्यागने योग्य) है; इसलिए फीता काटकर उद्‌घाटन न करें ।

नारियल फोडना:

Nariyal phodna

व्यासपीठकी स्थापनासे पूर्व भूमिपूजनके समय नारियल फोडा जाता है । जिस भूभागपर व्यासपीठकी स्थापना करनी होती है, उसके शुद्धिकरणसे वहांकी कष्टदायी स्पंदनोंका निराकरण किया जाता है । जहां व्यासपीठ पहले ही स्थापित हो, वहां उसके सामने धरतीपर एक पत्थर रखकर, स्थानदेवतासे प्रार्थना कर नारियल फोडें । व्यासपीठपर किसी भी समारोहकी तैयारी आरंभ करनेसे पूर्व स्थानकी शुद्धि आवश्यक है, अन्यथा अनिष्ट शक्तियोंकी बाधासे कार्यक्रमका आरंभ निर्धारित समयपर न हो पाना, कार्यक्रम-स्थलपर अस्वस्थता, तैयारी करनेमें थकान इत्यादि कष्टोंकी आशंका रहती है । प्रार्थनाद्वारा स्थानदेवताके आवाहनसे उनकी कृपास्वरूप नारियल-जलके माध्यमसे स्थानदेवताकी तरंगें सर्व दिशाओंमें फैलती हैं । इससे कार्यस्थलमें प्रवेश करनेवाली कष्टदायी स्पंदनोंकी गतिपर अंकुश लगाना संभव होता है । उस परिसरमें स्थान-देवताकी सूक्ष्म-तरंगोंका मंडल तैयार होता है व समारोह निर्विघ्न संपन्न होता है ।

नारियल फोडनेके पश्चात् दीपप्रज्वलन:

Deep prajvalan

नारियल फोडना अर्थात् अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश लगाना व दीपप्रज्वलन अर्थात् ज्ञानपीठपर कार्यरत दैवी तरंगोंका स्वागत कर, उन्हें प्रसन्न करना । इसलिए प्रथम नारियल फोडकर स्थानदेवताका आवाहन कर वहांकी स्थानीय अनिष्ट शक्तियोंको नियंत्रित करने हेतु उनसे प्रार्थना की जाती है; तदुपरांत दीप प्रज्वलित कर दीपद्वारा प्रक्षेपित तरंगोंके कारण वरिष्ठ (अधिक क्षमतावाली) अनिष्ट शक्तियोंके संचारपर अंकुश लगाकर व्यासपीठसे ज्ञानदानका कार्य किया जाता है ।

दीपप्रज्वलनका महत्त्व:

  • ईश्वरीय संकल्पशक्तिका कार्यरत होना व मनोवांछित कार्य सिद्ध होना
  • कार्यस्थलके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति

४. दीपप्रज्वलनके लिए प्रयुक्त दीपस्तंभमें घीकी अपेक्षा तेल डालना अधिक योग्य क्यों है ?

दीपप्रज्वलनके लिए प्रयुक्त दीपस्तंभमें तेलका प्रयोग करें । तेल रजोगुणी तरंगोंके तथा घी सात्त्विक तरंगोंके प्रक्षेपणका प्रतीक है । किसी भी कार्यको गति प्रदान करने हेतु रजोगुणी क्रियातरंगें आवश्यक होती हैं । तेलकी ज्योति ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताओंकी क्रियातरंगोंको जागृत कर उन्हें कार्यरत रखती है; इसलिए दीपप्रज्वलन हेतु प्रयुक्त दीपस्तंभमें तेलका प्रयोग श्रेयस्कर है ।

५. दीपप्रज्वलन मोमबत्तीसे नहीं, अपितु तेलके दीप (सकर्ण दीप) से क्यों करें ?

मोमबत्तीद्वारा प्रक्षेपित तरंगें तम-रजयुक्त होती हैं । इन तरंगोंके कारण वातावरण तामसी बनता है व सात्त्विकता नष्ट हो जाती है । मोमबत्तीद्वारा दीप प्रज्वलित करनेपर दीपस्तंभके चारों ओर तमकणोंका मंडल तैयार होता है । इस कारण दीपस्तंभकी ज्योतिकी ओर आकृष्ट ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताकी क्रियातरंगें बाधित होती हैं । इसके विपरीत, तेल रजोगुणका प्रतीक है । तेलकी ज्योति ब्रह्मांडमें विद्यमान देवताओंकी क्रियातरंगोंको जागृत कर कार्यरत करनेमें सहायक होती है; इसलिए दीपप्रज्वलन हेतु प्रयुक्त तेलके दीप (सकर्ण दीप)का प्रयोग श्रेयस्कर है ।


 

Puja mein upyukta vividha ghatakon ka mahatva (Hindi Article)

पूजामें उपयुक्त विविध घटकोंका महत्त्‍व

Puja samagri

सारणी –


१. पूजासामग्रीका महत्त्व

देवतापूजनमें पूजासामग्री होना आवश्यक ही है । यह घटक ईश्वरीय कृपा प्राप्त होनेमें महत्त्वपूर्ण कडी है । प्रत्येक घटकका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व समझ लेनेसे, इन घटकोंके प्रति मनमें भाव निर्माण होता है और धार्मिक व सामाजिक कृति अधिक भावपूर्ण हो पाती है । इसी उद्देश्यको ध्यानमें रखते हुए यहां हलदी, कुमकुम, तिलक, पुष्प, अक्षत, बाती, श्रीफल, उदबत्ती, कर्पूर आदिका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व व उसकी विशेषताएं बताई गई हैं ।

२. पूजाकी थालीमें विविध घटकोंकी रचना किस प्रकार करें ?

  • `थालीमें जीवकी दाहिनी ओर हलदी-कुमकुम व बाईं ओर बुक्का (अभ्रक धातुका चूर्ण), गुलाल और सिंदूर रखें ।
  • थालीमें सामने इत्रकी डिब्बी, तिलक (चंदन)की छोटी थाली और पुष्प, दूर्वा व पत्री रखें । इत्र, तिलक व पुष्पके गंध-कणोंके कारण तथा दूर्वा व पत्रीके रंग-कणोंके कारण देवताओंकी सूक्ष्म-तरंगें कार्यरत होती हैं ।
  • थालीमें नीचेकी दिशामें पान-सुपारी व दक्षिणा रखें; क्योंकि पान-सुपारी देवताओंकी तरंगें प्रक्षेपित करनेका एक प्रभावी माध्यम है ।
  • मध्य भागमें सर्वसमावेशक अक्षत रखें । अक्षतके थालीका केंद्रबिंदु बननेसे उसकी ओर शिव, श्री दुर्गादेवी, श्रीराम, श्रीकृष्ण व गणपति, इन पांच उच्च देवताओंकी तत्त्व-तरंगें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें आवश्यकतानुसार उसकी चारों ओर गोलाकारमें रखे कुमकुम, हलदी इत्यादि घटकोंकी ओर प्रक्षेपित होती हैं ।

३. पूजासामग्रीके घटकोंका महत्त्व व विशेषताएं

  • सप्तनदियोंका जल: गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी व नर्मदाके जल अर्थात् सप्तनदियोंके एकत्रित जलको पूजाके कलशमें डालते हैं । वर्तमान कालमें सप्तनदियोंका जल सरलतासे उपलब्ध नहीं होता । पूजा हेतु कलशमें डालनेके लिए सप्तनदियोंका जल उपलब्ध न हो, तो सामान्य जलका प्रयोग करते हैं । यह जल डालते समय `गंगे च यमुनेचैव ।’ इस मंत्रका उच्चारण कर सप्तनदियोंका आवाहन किया जाता है ।
  • रुईके वस्त्र: रुईके वस्त्र जीवके शरीरकी सुषुम्नानाडीका प्रतिनिधित्व करते हैं । रुईका धागा बनाते समय दूधकी अपेक्षा चंदनका प्रयोग करें । चंदनके अनुलेपनसे देवताओंकी तरंगें शीघ्र कार्यरत होकर, रुईके वस्त्रकी ओर आकर्षित होती हैं । ये सात्त्विक वसन (वस्त्र) देवताके गलेमें पहनानेसे देवता अपना सगुण रूप शीघ्र साकार कर, जीवके लिए कम कालावधिमें कार्य करते हैं ।
  • जनेऊ: `देवताओंको जनेऊ अर्पण करना (पहनाना), अर्थात् देवताओंके व्याप्त प्रकाशको जनेऊके धागेके वलयमें मर्यादित कर, उन्हें द्वैतके कार्य हेतु आवाहन करना । जनेऊ धागोंसे बनाया जाता है तथा मंत्रशक्तिसे लैस होता है । जनेऊ अर्पण करना, पूजाविधिमें द्वैत-अद्वैत अनुसंधान साधनेकी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है । पूजा के उपरांत जब जीव जनेऊ धारण करता है, तो उसे देवताके सात्त्विक चैतन्यका लाभ मिलता है ।
  • गुलाल, शुद्ध कुमकुम और हल्दी: गुलालके कारण वायुमंडलकी चैतन्ययुक्त सुप्त-तरंगें प्रवाही बन जाती हैं । शुद्ध हलदीकी सुगंधका बोध उसे सूंघनेपर होता है । शुद्ध कुमकुमका स्पर्श बर्फ समान ठंडा होता है । इस कुमकुमको माथेपर लगानेसे अनिष्ट शक्तियां भ्रूमध्यसे प्रवेश नहीं कर सकतीं ।
  • पुष्प: तुलसी (मंजिरी), गेंदा, गुलाब, केवडा इत्यादि पुष्पोंकी सुगंध मंद होती है और उनमें गुरुतत्त्वको आकर्षित करनेकी क्षमता अधिक रहती है । सूर्योदयके उपरांत भी खिलनेवाले पुष्प चढाना, कागजके पुष्प चढाने समान ही है ।
  • अक्षत: पूजाविधिके प्रत्येक घटकपर तथा देवताकी मूर्तिपर पंचोपचार अथवा षोडशोपचारके उपरांत, अक्षत छिडककर सबमें विद्यमान देवत्वको जागृत कर, उन्हें कार्यके लिए आवाहन करते हैं । पंचोपचार-पूजामें कोई घटक अनुपलब्ध हो, तो अक्षतका उपयोग किया जाता है । इसलिए अक्षत सर्व देवताओंके तत्त्वोंको समा लेनेवाला अर्थात् पूजाविधिमें महत्त्वपूर्ण सर्वसमावेशक माध्यम है ।
  • नारियल: नारियलमें शिव, दुर्गा, गणपति, श्रीराम व श्रीकृष्ण, इन पांच देवताओंकी तरंगें आकृष्ट करनेकी व उन्हें आवश्यकताके अनुसार प्रक्षेपित करनेकी क्षमता होती है । इसलिए नारियलको सर्वाधिक शुभ फल अर्थात् श्रीफल, सर्वाधिक सात्त्विकता प्रदान करनेवाला फल कहते हैं ।
  • उदबत्ती: उदबत्तीमें देवताओंसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-गंध ग्रहण करनेकी क्षमता है । इसलिए उदबत्ती लगानेपर उससे उसकी सुगंधके साथ-साथ उक्त सूक्ष्म-गंध भी प्रक्षेपित होती है । उदा. जब चंदनकी उदबत्ती लगाई जाती है तब देवताओंसे आकृष्ट चंदनकी सूक्ष्म-गंध भी उदबत्तीकी सुगंधके साथ प्रक्षेपित होती है ।
  • धूप: धूपकी सुगंध तीव्र होती है । इस सुगंधसे विशिष्ट देवताका तत्त्व कार्यरत होकर, वह धूपके धुएंके माध्यमसे सूक्ष्म-शस्त्रोंका रूप लेकर वातावरणके रज-तमसे लडती है, जिससे वातावरणमें सत्त्वगुणकी प्रबलता बढ जाती है और स्वाभाविक ही वातावरण तथा वास्तुकी शुद्धि होती है । इस हेतु पूजा अथवा आरतीसे पहले धूप दिखाना योग्य होता है ।
  • कर्पूर: कर्पूर जलानेसे उत्पन्न सूक्ष्म वायुकी उग्र गंधमें शिवगणोंको आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । कर्पूरकी सुगंधके कारण श्वासद्वारा शरीरमें शिवतत्त्व प्रवेश करता है ।
  • नैवेद्य (भोग): प्रत्येक देवताका नैवेद्य निर्धारित होता है । उस देवताको वह नैवेद्य प्रिय होता है, उदा. श्रीविष्णुको खीर अथवा सूजीका हलवा, गणेशजीको मोदक, देवीको पायस । उस विशिष्ट नैवेद्यमें उस विशिष्ट देवताकी शक्ति अधिक आकृष्ट होती है । तदुपरांत वह नैवेद्य, अर्थात् प्रसाद हमारे द्वारा ग्रहण किए जानेपर उसमें विद्यमान शक्ति हमें प्राप्त होती है ।
  • दक्षिणा: दक्षिणा रखनेसे जीवमें त्यागकी भावना निर्माण होती है । हिंदू धर्मका मूल त्यागमें छुपा है । दक्षिणा देकर त्याग सीखना कर्मकांडकी पहली सीढ़ी है । इसीलिए दक्षिणा देनेका महत्त्व अनन्यसाधारण है । दक्षिणा कभी भी अकेले नहीं दी जाती । सुपारी अथवा नारियलको पानके पत्तोंपर रखकर देना महत्त्वपूर्ण है ।

 

Pujaki purvatayari (Hindi Article)

पूजाकी पूर्वतैयारी

Puja ghar

सारणी –


१. पूजाकी पूर्वतैयारी कैसे करें ?

पूजाके माध्यमसे निर्मित चैतन्यको ग्रहण करनेकी क्षमता पूजकमें निर्माण हो, इस हेतु हिंदू धर्ममें सगुणसे निर्गुणकी ओर ले जानेवाली देवतापूजनकी पूर्वतैयारी जैसी कृतियां बताई गई हैं, उदा. पूजास्थलकी शुद्धि, रंगोली बनाना, शंखनादके लाभ, पूजामें बैठने हेतु आसन लेना, देवताओंपर चढाएं फूल, निर्माल्य उतारनेकी योग्य पद्धति इत्यादि कृतियां आती हैं ।

देवतापूजनकी तैयारी करनेसे संभावित लाभ: जीवके देहकी सात्त्विकता बढने लगती है और जीवके देहकी शुद्धि होती है । वास्तुशुद्धि होकर वायुमंडल प्रसन्न होता है । ब्राह्मणोंद्वारा पूजाविधिमें विधिवत किया जानेवाला संकल्प पूजास्थलपर देवताओंके आगमन तथा यजमानोंको आशीर्वाद प्रदान कराता है ।

१.१ पूजककी अपनी तैयारी

पुरुष

  • स्नानके उपरांत पुरुष यथासंभव रेशमी धोती, पीतांबर अथवा धुले हुए वस्त्र (धोती, पंचा, आदि) परिधान करें व कंधेपर उपवस्त्र ले ।
  • स्वयंकी शुद्धिहेतु पुरुष अपने शरीरपर भस्म लगाएं ।
  • पुरुष माथेपर तिलक या सिंदूर अथवा कुमकुम लगाएं । नाकके मूलके ऊपर तिलक व कुमकुम लगाएं । यदि सिंदूर लगाना हो, तो नाकके मूलके पास लगाएं । तिलक व सिंदूर अनामिकासे लगाएं; जबकि कुमकुम मध्यमासे लगाएं । जहांतक संभव हो पुरुष खडा तिलक लगाएं ।

स्त्री

  • स्नानके उपरांत स्त्रियां यथासंभव नौ गजकी साडी परिधान करें । यह संभव न हो, तो छह गजकी साडी परिधान करें ।
  • स्त्रियां माथेपर हलदी-कुमकुम लगाएं । हलदी अनामिकासे व कुमकुम मध्यमासे लगाएं । जहांतक संभव हो स्त्रियां गोल तिलक लगाएं ।

१.२ स्तोत्रपाठ अथवा नामजप करना

स्तोत्रपाठ अथवा नामजप पूजाकी तैयारी करते समय कभी भी कर सकते हैं । नामजपकी तुलनामें स्तोत्रमें सगुण तत्त्व अधिक होता है; इसलिए स्तोत्र ऊंची आवाजमें कहें तथा नामजप मनमें करें । नामजप मन ही मन न हो रहा हो तो ऊंची आवाजमें करनेमें कोई आपत्ती नहीं । नामजपकी तुलनामें स्तोत्रमें सगुण तत्त्व अधिक होता है; इसलिए स्तोत्र ऊंची आवाजमें कहें तथा नामजप मनमें करें ।

१.३ पूजास्थलकी शुद्धि व उपकरणोंकी जागृति करना

पूजाघर स्थित कक्षमें झाडू लगाएं । कमरा गोबरसे लीपें अथवा साफ पानीसे पोछें । आम या तुलसीके पत्तेसे गोमूत्र या विभूतिका जल छिडककर व धूप दिखाकर पूजाघरकी शुद्धि करें । यह वायुमंडलमें स्थित विषैली वायु व काली शक्ति नष्ट करनेमें सहायक है । देवतापूजनके उपकरण भलीभांति साफ कर लें । उनपर तुलसीदल अथवा दूर्वासे जलप्रोक्षण करें ।

१.४ रंगोली बनाना

संभव हो, तो पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां रंगोली बनाएं । भूमिपर झाडू फेरते समय व बुहारते समय भूमिपर सूक्ष्म, अनियमित स्पंदनोंवाली रेखाएं निर्माण होती हैं । ये स्पंदन शरीर, आंखों व मनके लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं । इन अनिष्ट स्पंदनोंसे बचनेके लिए बुहारी गई भूमिपर रंगोली बनानेपर उससे नियमित स्पंदन निर्माण होते हैं । यथासंभव रंगोली मुख्य देवताका तत्त्व आकृष्ट करनेवाली हो । उसी प्रकार किसी विशेष देवताकी पूजा करते समय उस तत्त्वसे संबंधित रंगोली बनाएं । रंगोली बनाते समय वह देवताके नाम या रूपकी न बनाकर स्वस्तिक अथवा बिंदुयुक्त बनाएं । रंगोली बनानेके उपरांत उसपर हलदी-कुमकुम डालें । रंगोलीमें देवताके तत्त्व हेतु पूरक रंगोंका प्रयोग करें, उदा. श्री गणपतिकी रंगोलीमें लाल रंग व मारुतिकी रंगोलीमें सिंदूरी रंगका प्रयोग करें ।

१.५ शंखनाद करना

Shankhanad

खडे होकर, गर्दन ऊर्ध्व दिशाकी ओर (ऊपर) कर मनकी एकाग्रता साध्य कर शंखध्वनि करें । श्वास पूर्णत: छातीमें भर लें । ध्वनिकी तीव्रता बढाते जाएं व अंतमें तीका नाद करें । जहांतक संभव हो, शंख एक श्वासमें बजाएं । शंखिणीका नाद न करें ।

१.६ देवतापूजनके लिए बैठने हेतु आसन लेना

पूजक आसनके लिए पीढा लें । पीढा दो पटि्टयोंको जोडकर न बनाया गया हो, अर्थात् वह अखंड हो । पीढेमें लोहेकी कीलें न हो । यथा संभव  पीढेपर रंग न किया गया हो ।

१.७ देवताओंपर चढाया निर्माल्य निकालें

निर्माल्य निकालते समय वह अंगुठा व अनामिकासे उठाएं । इससे निर्माल्यमें विद्यमान गंधतरंगें ग्रहणयोग्य बनकर देहपरसे रज-तमात्मक आवरण नष्ट होनेमें सहायता होती है ।

उपकरणोंकी जागृति: देवतापूजनके उपकरण भलीभांति साफ कर लें । उनपर तुलसीदल अथवा दूर्वासे जलप्रोक्षण करें ।

२. पूजाघर किससे बना हो?

यदि संभव हो, तो पूजाघर चंदनका अथवा सागौनका बनाएं । सबके
लिए चंदनका पूजाघर बनाना संभव नहीं होता । अन्य लकडियोंकी तुलनामें सागौनमें सात्त्विक तरंगें संजोए रखने व प्रक्षेपित करनेकी क्षमता अधिक होती है । ईश्वरके प्रति जीवके भावके कारण, पूजाघरके ऊपरी नुकीले भागकी ओर देवताओंकी तरंगें आकर्षित होती हैं व आवश्यकतानुसार वास्तुमें प्रक्षेपित की जाती हैं ।

३. पूजाघरका रंग कैसा होना चाहिए ?

आजकल अधिकांश घरोंमें सजावटके लिए पूजाघर विभिन्न रंगके बनाए जाते हैं । वास्तवमें पूजाघर लकडीके रंगका, अर्थात् भूरे रंगका होना श्रेष्ठ है । इसका कारण आगे दिए अनुसार है । ईश्वरके दो तत्त्व हैं – सगुण तत्त्व व निर्गुण तत्त्व । भूरा रंग सगुण तत्त्व व निर्गुण तत्त्वकी सीमारेखाका, अर्थात् सगुणसे निर्गुणकी ओर जानेके स्थित्यंतरका दर्शक है । पंचतत्त्वोंसे बना मनुष्य जीव `सगुण’ है, तो निराकार ईश्वर `निर्गुण’ हैं । देवतापूजन जैसी धार्मिक कृतिद्वारा ईश्वरोपासनासे जीवको सगुणसे निर्गुणकी ओर, अर्थात् द्वैतसे अद्वैतकी ओर बढनेमें सहायता मिलती है । स्वाभाविक ही पूजाघर का भूरा रंग, इस यात्राके लिए पूरक होता है ।

४. पूजाघरकी रचना कैसे करें ?

`पूजाघरमें देवताओंकी रचना शंकुके आकारमें करें । पूजकके सामने शंकुकी नोक पर, यानी बीचमें श्रीगणेशकी मूर्ति रखें । पूजककी दाईं ओर स्त्रीदेवताओंकी रचना करें । उसमें कुलदेवीका रूप प्रथम व उपरांत उच्च देवताओंके उपरूप हों, तो रखें । उसके उपरांत उच्च देवताकी स्थापना करें । इसी क्रमके अनुसार पूजककी बाईं ओर पुरुषदेवता, यानी प्रथम कुलदेव, तदुपरांत उच्च देवताओंके उपरूप व उसके उपरांत उच्च देवता रखें । पूजाघरमें देवताओंकी संख्या कम हो । जिनके गुरु हैं, ऐसे व्यक्ति यदि अकेले रहते हों, तो वे केवल अपने गुरुका चित्र अथवा छायाचित्र पूजाघर में रखें ।


 

Pitrupaksha mein Dattatray devata ka naamjap kyon karte hai? (Hindi Article)

पितृपक्षमें दत्तात्रेय देवताका नामजप क्‍यों करते है?

Dattatray

सारणी –


१. पितृपक्ष (महालयपक्ष)

आश्विनके कृष्णपक्षको `पितृपक्ष’ कहते हैं । यह पक्ष पितरोंको प्रिय है । पितृपक्षकी कालावधिमें पितर पृथ्वीके निकट आते हैं । इन अतृप्त आत्माओंको (पितरोंको) शांत करनेके लिए इस कालमें श्राद्धविधि की जाती है । इस पक्षमें पितरोंका महालय श्राद्ध करनेसे वे वर्षभर तृप्त रहते हैं ।

२. पितृपक्षमें श्राद्ध क्यों करना चाहिए ?

पितृपक्षमें वातावरणमें कष्टदायक तरंगोंकी प्रबलता होती है । पितृपक्षमें श्राद्ध करनेसे पितरोंके लिए पृथ्वीकी वातावरण कक्षामें आना सरल होता है । इसीलिए हिंदू धर्ममें बताए गए विधिकर्म विशिष्ट कालावधिमें करना अधिक श्रेयस्कर है । पूर्वजोंकी अतृप्त वासनाओंके परिणामस्वरूप उनके परिवारजनोंको कष्ट होनेकी संभावना होती है । उदा. दारू-सिगरेटका व्यसन लगना । पितृपक्षमें महालय श्राद्ध करनेसे मृत्युलोकमें अटके हुए पूर्वजोंको गति प्राप्त होती है तथा उनके कारण हमारे कष्टोंका निवारण होता है ।

३. पितृपक्षमें की जानेवाली आध्यात्मिक व धार्मिक कृतियोंका आधारभूत शास्त्र

  • पूर्वज अतृप्त होते हैं, इस कारण उनकी इच्छा तृप्त करने हेतु `पक्ष’ किया जाता है ।
  • पूर्वजोंके वंशज व उनके किसी न किसी रूपमें अटके हुए वंशजके ऋणानुबंधसे मुक्त होनेके लिए श्राद्धपक्ष करना पड़ता है ।
  • इन पंद्रह दिनोंमें अतृप्त आत्माओंको शांति न देनेपर, वे २१० दिन वंशको किसी न किसी माध्यमसे कष्ट देकर हानि पहुंचाती हैं । अत: श्राद्धपक्ष करना आवश्यक है ।
  • जबतक प्रत्येक आत्माको शांति नहीं मिलती, तबतक उसे आगेकी गति नहीं प्राप्त होती । इस कारण वह भटकती रहती है । अत: उन्हें भोजन देनेके माध्यमसे, वर्षमें एक बार शांति देनेके रूपमें कृति इस कालावधिमें की जाती है ।

३.१ शास्त्रीय पद्धतिसे की जानेवाली विधि

  • अतृप्त आत्माको प्रथम दही-चावलका नैवेद्य दिखाएं
  • पांच ब्राह्मणोंके हाथोंसे पूजाविधि करें
  • पांच ब्राह्मणोंको भोजन करवाएं
  • घरका प्रत्येक व्यक्ति `श्री गुरुदेव दत्त ।’  नामजप सामूहिक रूपसे एक घंटा करे ।
  • जहांतक संभव हो, पूजाके समय रखे गए पूर्वजोंके छायाचित्र नामजपके उपरांत तुरंत हटा दें । (आत्मा छायाचित्रमें स्वयंका स्थान निर्माण करती है । अत: छायाचित्र तुरतं हटा दें ।)

३.२ भोजनका महत्त्व

  • इस दिन सर्व सब्जियां एकत्रित कर सब्जी बनाई जाती है । इसके पीछे कारण निम्न प्रकारसे हैं ।

    १. पितरोंकी किसी भी बातकी इच्छा शेष न रहे

    २. जब अनेक घटक एकत्रित आते हैं, तब उनके मिश्रणसे बाहर निकलनेवाली तरंगें वातावरणमें प्रक्षेपित होती हैं, अस्थिर आत्मा स्थिर होती है व कुछ क्षणोंमें वह आसक्ति विरहित होकर वहांसे चली जाती है ।

  • इस दिन पितरोंको नैवेद्य दिखाकर व ब्राह्मणोंको भोजन देनेके पश्चात् ही घरके अन्य सदस्य भोजन करें ।

३.३ पितृपक्षके लिए धार्मिक विधि करते समय निम्न बातें ध्यानमें रखें !

श्राद्ध जैसी विधियोंमें दत्तात्रेय देवताका विशेष महत्त्व है । श्राद्धकी विधि भावपूर्ण व सात्त्विक करनेके लिए निम्न बातें ध्यानमें रखें ।

  • जिस कमरेमें विधि कर रहे हों, वहां दत्तात्रेयकी नामजप-पटि्टयां लगाएं ।
  • दत्तात्रेयका नामजप ध्वनिमुद्रित कैसेट, विधिके आरंभसे लेकर अंततक धीमी आवाज़में बजाएं ।
  • श्राद्धसे पहले सनातन संस्थाद्वारा प्रकाशित दत्तात्रेयके सात्त्विक चित्रका पूजन व आरती करें ।

उक्त बातोंके कारण श्राद्धकी विधिमें अनिष्ट शक्तियोंकी अड़चनें कम मात्रामें आती हैं । दत्तात्रेयकी शक्ति व उनका चैतन्य विधिके स्थलपर प्रक्षेपित होता है, साधकोंको शक्ति व चैतन्यका लाभ मिलता है और उनका अनिष्ट शक्तिसे संरक्षण होता है ।

४. पितृपक्षमें दत्तात्रेय देवताका नाम जपनेका महत्त्व

पितृपक्षमें श्राद्ध विधिके साथ-साथ दत्तात्रेयका नामजप करनेसे पूर्वजोंके कष्टसे रक्षण होनेमें सहायता मिलती है । इसलिए पितृपक्षमें दत्तात्रेयका नामजप कमसे कम ९ माला करें ।

५. दत्तात्रेयके नामजपद्वारा पूर्वजोंके कष्टोंसे रक्षण कैसे होता है ?

पूर्वजोंको गति मिलना: कलियुगमें अधिकांश लोग साधना नहीं करते, अत: वे मायामें फंसे रहते हैं । इसलिए मृत्युके उपरांत ऐसे लोगोंकी लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसी अतृप्त लिंगदेह मर्त्यलोक (मृत्युलोक) में फंस जाती है । (मृत्युलोक, भूलोक व भुवलोकके बीचमें है ।) मृत्युलोकमें फंसे पूर्वजोंको दत्तात्रेयके नामजपसे गति मिलती है; वे अपने कर्मानुसार आगेके लोककी ओर अग्रसर होते हैं । अत: स्वाभाविक ही उनसे संभावित कष्ट कम हो जाते हैं ।

घरके मृत व्यक्तियोंकी यादमें घरमें उनके छायाचित्र लगाना, पूजाघरमें सिक्के रखना अथवा घरके सामने स्थान बनाना तथा उसपर नियमितरूपसे फूल चढाकर पूजा करना, ऐसी कृतियोंके कारण पूर्वज अटके रहते हैं । उन्हें गति नहीं मिल पाती व उन्हें यातनाएं भी सहनी पडती हैं । भगीरथने पूर्वजोंकी मुक्तिके लिए तपस्या कर गंगाको पृथ्वीपर लाया, यह पितृऋण उतारनेका आदर्श उदाहरण है । यदि हम पूर्वजोंको उपरोक्त अनुसार अटकाए रखेंगे व उनकी गति हेतु नामजपादि साधना भी नहीं करेंगे तो हम पितृऋण चुका नहीं पाएंगे । परिणामस्वरूप पूर्वजोंको कष्ट होगा व वे हमारी साधनामें अडचनें निर्माण होंगी । पितृऋण चुकानेके लिए व पूर्वजोंको गति प्रदान करने हेतु दत्तात्रेय देवताका `श्री गुरुदेव दत्त ।’  नामजप व श्राद्धविधि करें ।

दत्तात्रेयके नामजपसे निर्मित शक्तिद्वारा नामजप करनेवालेके आसपास सुरक्षाकवच निर्माण होता है ।

६. सर्वपित्री अमावस्या

पितृपक्षकी अमावस्याको सर्वपित्री अमावस्या कहते हैं । इस तिथिपर कुलके सर्व पितरोंको उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं । वर्षभरमें सदैव व पितृपक्षकी अन्य तिथियोंपर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथिपर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृपक्षकी यह अंतिम तिथि है । उसी प्रकार, शास्त्रमें बताया गया है कि, श्राद्धके लिए अमावस्याकी तिथि अधिक योग्य है, जबकि पितृपक्षकी अमावस्या सर्वाधिक योग्य तिथि है ।


 

Mrut vyaktike mukh me tulsidal kyon rakhte hai? (Hindi Article)

मृत व्यक्तिके मुखमें तुलसीदल क्यों रखते हैं ?

सारणी –


१. मृत्योपरांत कृतियोंका शास्त्रीय महत्त्व

मृत्योत्तर क्रियाकर्मको श्रद्धापूर्वक व विधिवत् करनेपर मृत व्यक्तिको सद्गति प्राप्त होती है । पूर्वजोंकी अतृप्तिके कारण, परिजनोंको होनेवाले कष्टों तथा अनिष्ट शक्तियोंद्वारा लिंगदेहके वशीकरणकी संभावना भी कम हो जाती है । मृत्योत्तर क्रियाकर्मके प्रति शुष्क भाव समाप्त हो, इस दृष्टिसे यहां मृत्योपरांतकी कुछ विधियोंका अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण दे रहे हैं । इससे स्पष्ट होगा कि, मनुष्यजीवनमें साधनाका महत्त्व अनन्यसाधारण है ।

२. किसीकी मृत्यु हो जानेपर क्या करें ?

मृतकका सिर दक्षिणमें तथा पैर उत्तर दिशामें हों, इस प्रकार लिटाएं । उसके मुखमें गंगाजल / विभूति-जल डालें और तुलसीदल रखें । तुलसीदलके गुच्छेसे मृत व्यक्तिके कानों और नासिकाओंको बंद करें । परिवारका विधिकर्ता पुरुष अपना सिर मुडवाए । (केश कष्टदायक तरंगोंको आकर्षित करते हैं । मृत्योपरांत कुछ समयके लिए जीवकी सूक्ष्म देह परिजनोंके आस-पास ही घूमती रहती है । उससे प्रक्षेपित रज-तम तरंगें परिजनोंके केशके काले रंगकी ओर आकर्षित होते हैं । इस कारण सिरदर्द, सिरमें भारीपन, अस्वस्थता, चक्कर आना जैसे कष्ट होते हैं । मृत्योत्तर क्रियाकर्ममें पुरुष प्रत्यक्ष सहभागी होते हैं, इसलिए उन्हें ऐसे कष्ट होनेकी आशंका अधिक रहती है । इसलिए वे अपना सिर पूरा मुडवाएं ।) `श्री गुरुदेव दत्त ।’ का जाप ऊंचे स्वरमें करते हुए, मृत व्यक्तिको नहलाएं । गोमूत्र अथवा तीर्थ छिडककर, यदि संभव हो तो धूप दिखाकर, शुद्ध किए गए नए वस्त्र मृत व्यक्तिको पहनाएं । घरमें गेहूंके आटेका गोला बनाकर उसपर मिट्टीका दीप जलाएं । दीपकी ज्योति दक्षिण दिशाकी ओर हो ।

३. अंत्ययात्राकी तैयारी व दहनविधि कैसे करें ?

मृत व्यक्तिको बांसकी अर्थीपर लिटाकर उसके पैरोंके अंगूठोंको एक साथ बांधें । अंत्ययात्रामें विधिकर्ता एक मटका साथ ले, जिसमें अग्नि प्रज्वलित की गई हो । अंत्ययात्रामें उपस्थित सर्व लोग ऊंचे स्वरमें `श्री गुरुदेव दत्त ।’ का जाप करें । श्मशानमें विधिकर्ता चिताको अग्नि दे । मृतदेहके पूर्ण दहन हो जानेपर विधिकर्ता कंधेपर जलका मटका लेकर उसमें पत्थरसे (अश्मसे) छिद्र कर, घडीकी सुइयोंकी विपरीत दिशामें जलका घेरा बनाते हुए चिताकी तीन परिक्रमाएं करे । उसके उपरांत मटकेको कंधेसे पीछेकी ओर गिराकर तोड दे ।

४. मृत व्यक्तिके मुखमें गंगाजल डालकर तुलसीदल क्यों रखते हैं ?

मृत व्यक्तिके मुखसे दूषित तरंगें निकलती हैं, जिनके कारण अनिष्ट शक्तियां मृतदेहकी ओर आकर्षित होती हैं और उसे अपने वशमें कर लेती हैं । मृत व्यक्तिके मुखमें गंगाजल डालकर तुलसीदल रखनेसे उनकी ओर आकर्षित सात्त्विक तरंगें दूषित तरंगोंको नष्ट करती हैं । मृत व्यक्तिके कान व नाकको कपासके गोलोंसे बंद करनेकी अपेक्षा, उन्हें तुलसीदलसे बंद करें ।

५. मृत व्यक्तिको अर्थीपर आडे लिटाकर, उसके पैरोंके अंगूठेको अंगूठेसे क्‍यो बांधते है?

दहनविधि हेतु ले जानेसे पूर्व मृत व्यक्तिको अर्थीपर आडे लिटाकर उसके पैरोंके अंगूठेको अंगूठेसे बांधनेके कारण, उसके शरीरकी दाहिनी व बाईं नाडीके संयोगसे मृतदेह सूक्ष्म कष्टदायक वायुओंसे मुक्त हो जाती है तथा अनिष्ट शक्तियां उसपर सहज नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकतीं ।

६. गेहूंके (गूंदे हुए) आटेपर दीप क्यों व किस दिशामें जलाएं ?

व्यक्तिकी मृत्यु हो जानेपर उसमें कष्टदायक तरंगोंका भ्रमण जारी रहता है । अन्योंको इससे कष्ट न हो, इस हेतु वहां  दीप जलाएं । ज्योतिका मुख दक्षिण दिशाकी ओर हो । दक्षिण दिशाके (मृत्युके) देवता `यम’ से प्रक्षेपित तेजतरंगें कष्टदायक तरंगोंका विघटन करती हैं । आटेके कारण ज्योतिकी ओर आकर्षित तेजतरंगें दीर्घकालतक संजोई जाती हैं ।

७. विद्युत् दाहसंस्कार न कर, विधिवत् करें

मानवनिर्मित अशुद्ध लोहेका विद्युत्दाह यंत्र व विद्युत्प्रवाह रज-तमयुक्त व चैतन्यहीन है । इसलिए विद्युत्-दहनमें मृत व्यक्तिके शरीरसे वायुमंडलमें रज-तमका प्रक्षेपण होता है और वायुमंडल दूषित होता है । इस कारण विद्युत्-दहनसे मृत व्यक्तिको आगेकी गति हेतु उतना लाभ नहीं मिलता । विधिवत् दाहसंस्कारमें प्रयुक्त नैसर्गिक वस्तुओंमें (लकडी, उद इत्यादिमें) चैतन्य होता है । इसलिए एवं विधिवत् दाहसंस्कारमें मंत्रोच्चारके कारण मृत व्यक्तिको आगेकी गति मिलती है । अत: मंत्रोच्चारसहित मृतदेहका दहन करें ।

८. दहनोपरांत चिताके आस-पास मटकीके जलको गिराते हुए परिक्रमा लगाएं

मटकीके छिद्रसे गिरनेके कारण जलकी तरंगोंको गति प्राप्त होती है । परिणामस्वरूप उत्पन्न ऊर्जाके कारण वायुमंडलकी शुद्धि होती है । तीन बार परिक्रमा लगानेसे मृतदेहके आस-पास सूक्ष्म-मंडल बनता है । इससे मृत व्यक्तिको आगेकी गति मिलती है ।

९. चिताके धुएंका स्पर्श शरीरको क्यों न होने दें ?

मृतदेहके अंत्यसंस्कारकी अग्निकी ज्वालाओंका धुआं मृत व्यक्तिकी वासनाओंसे संबंधित है । कुछ अतृप्त लिंगदेह इस धुएंकी ओर आकर्षित होती हैं और इस धुएंके साथ-साथ किसी व्यक्तिकी देहमें प्रवेश कर सकती हैं । इसलिए अपने शरीरको इस धुएंका स्पर्श न होने दें ।

१०. दहनविधि उपरांत उसी दिनकी कृतियां

श्मशानसे लौटनेपर अश्मको घरके आंगनमें तुलसी-बिरवाके पास रखें । घरमें प्रवेश करनेसे पूर्व नीमका पत्ता चबाएं । तदुपरांत आचमन कर, अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों इत्यादि मांगलिक पदार्थोंको हाथसे स्पर्श करें और अश्मपर पैर रखकर घरमें प्रवेश करें । अपने आराध्यदेवताका नामजप करते हुए स्नान करें । मंत्रोच्चारण करते हुए परिजन अश्मपर तिलांजलि दें । भोजनके लिए कढी-चावल बनाकर, प्रथम वास्तुदेवता व स्थानदेवताको वह अर्पित करें और प्रसादके रूपमें सेवन करें ।

११. १ वर्षतकके बालकोंको अग्नि न देकर मृत्योपरांत दफनाया क्यों जाता है ?

एक वर्षतकके बालकपर संस्कारोंकी संख्या अत्यल्प  होती है, इसलिए उन्हें नष्ट करने हेतु भिन्न अग्निसंस्कार करनेकी आवश्यकता नहीं रहती ।

१२. स्त्रियां श्मशानमें क्यों न जाएं ?

पुरुषोंकी तुलनामें स्त्रियोंमें मूलत: ही रजोगुणकी मात्रा अधिक रहती है । रजोगुणके कारण स्त्रियोंमें भावनाएं भी पुरुषोंकी तुलनामें अधिक होती हैं । श्मशानमें वे कष्टदायक स्पंदनोंसे पीडित अथवा बाधित हो सकती हैं । इसलिए स्त्रियां मृत्योत्तर क्रियाकर्म भी न करें ।

१३. तेरहवींतक कौनसी कृतियां आवश्यक हैं ?

तीसरे दिन: अस्थियां एकत्र कर प्रवाहित करें । (तीसरे दिन संभव न हो, तो प्रथम दिन ही करें ।)

दसवें दिन: नदीके तटपर अथवा किसी घाटपर स्थित शिवजीके अथवा कनिष्ठ देवताओंके देवालयमें पिंडदान करें ।

ग्यारहवें दिन: मृतकके लिए श्राद्ध करें ।

बारहवें दिन: वर्षके अंतमें और वर्षश्राद्धके पूर्व, सपिंडी श्राद्ध करना उचित है । यदि लगे कि, किसी कारणवश ऐसा करना संभव नहीं होगा, तो बारहवें दिन ही कर लें ।

तेरहवें दिन: शांतिविधि करें तथा मीठा भोजन बनाएं ।

काकबली (दसवे दिन किया जानेवाला श्राद्ध): दसवें दिन लिंगदेहको काक स्पर्शके माध्यमसे मंत्रोच्चारसे भारित पिंडयुक्त हविर्भाग दिया जाकर लिंगदेहके अन्नदर्शक आसक्तियुक्त रज-तमात्मरूपी संस्कारात्मक बंधनसे मुक्त करनेका प्रयत्न कर पृथ्वीमंडल भेदनेके लिए आवश्यक बल की आपूर्ति की जाती है ।

दसवें दिन काकका पिंडको स्पर्ष करना महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है ?
काकका काला रंग रज-तमदर्शक होनेसे, पिंडदानकी रज-तमात्मक कृतिसे संबंधित विधि जैसी होती है । वासनामें फंसा हुआ लिंगदेह भूलोक, मर्त्यलोक व स्वर्गलोक में अटके रहते हैं । ऐसे लिंगदेह पृथ्वीके वातावरण कक्षामें प्रवेश करनेपर काकके देहमें प्रवेश कर पिंडान्नका भक्षण करते हैं । मध्यका पिंड मुख्य लिंगदेहसे संबंधित होनेके कारण इस पिंडको काकका स्पर्ष करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।